भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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आत्माका सृजन करता हूँ। सन्मार्गस्थ साधुओंके परित्राण एवं पापकमी प्राणियोंके विनाशार्थ तथा धर्मकी सम्यक् स्थापनाके लिये मैं भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतीर्ण होता हूँ। इस विषयमें श्रीमद्रामानुजाचार्यका कहना है कि जो धर्मात्मा वैष्णवाग्रगण्य मेरे समाश्रयणमें प्रवृत्त हैं और वाक् तथा मनसे मेरे नाम, कर्म और स्वरूपोंको अतीत होनेसे मेरे दर्शनके बिना अपने धारण-पोषणके भी सुखको न प्राप्त करते हुए अणुमात्र कालको भी हजारों कल्पके समान मानते हैं, जिसके सम्पूर्ण गात्र प्रशिथिलप्राय हैं, उन्हें अपने स्वरूप, चेष्टित, अवलोकन, आलाप आदि दानसे उनके परित्राणके लिये, तद्विपरीतोंके विनाशके लिये, क्षीण वैदिक धर्मका स्वस्वरूप- प्रदर्शनद्वारा स्थापनके लिये देव, मनुष्य आदि रूपमें भगवान् अवतीर्ण होते हैं। जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ (गीता ४।९) अर्थात् मेरे दिव्य, अलौकिक मायारूप जन्म तथा साधु-परित्राणादि कर्मको जो तत्त्वतः जानता है, वह इस देहको छोड़कर मुझे प्राप्त हो जाता है, पुनः उत्पन्न नहीं होता। इस विषयमें श्रीमद्-रामानुजाचार्यका कहना है कि कर्मोंकी मूलभूत त्रिगुणात्मक प्रकृतिके संसर्गरूप जन्मसे रहित, सर्वसर्वेश्वरत्व, सर्वज्ञत्व, सत्यसंकल्पत्वादि समस्त कल्याणगुणोंसे युक्त, साधुपरित्राण और मेरा समाश्रयण ही है एक मुख्य प्रयोजन जिसका, उस मेरे दिव्य, अलौकिक जन्म- चेष्टितको जो तत्त्वतः यथावत् जानता है, वह वर्तमान देह छोड़कर पुनः जन्मग्रहण नहीं करता, मुझे ही प्राप्त हो जाता है। मेरे अलौकिक जन्म, चेष्टितके यथार्थ ज्ञानसे समस्त मेरे समाश्रयणके विरोधी पाप नष्ट हो जाते हैं, प्राणी मुझे सर्वथा प्राप्त कर लेता है। प्राकट्यके विषयमें विभिन्न अभिमतोंकी मीमांसा और निष्कर्ष इन पूर्वोक्त श्लोकों और व्याख्यानोंसे यह स्पष्ट है कि भगवान्‌का सगुण, साकार, सच्चिदानन्द स्वरूप बनता है। प्रपंच-सत्यत्ववादी लोग तो भगवान्‌का साकार विग्रह उनकी लीलाशक्तिसे मानते ही हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि दिव्य अचित् तत्त्वसे भगवान्‌का विग्रह बनता है और अनेक लोग यह मानते हैं कि चिदानन्द तत्त्व ही साकार विग्रहवान् होकर प्रकट होता है। अद्वैत वेदान्तके अनुसार एक पक्षमें विशुद्धसत्त्व ही से भगवान्‌का विग्रह बनता है, उसीको माया भी कहा जा सकता है। इसी दृष्टिसे भगवान्‌के विग्रहको मायामय भी कहा जाता है। 'भागवत' में कहा गया है कि प्रभो! आप प्राणियोंके कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वका समाश्रयण करते हैं—'सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ' (श्रीमद्भागवत १०।२।३४) यह भी कहा गया है कि यदि आप विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह न धारण करते तो अज्ञानका भेदन करनेवाला अपरोक्ष ज्ञान ही न उत्पन्न होता। सर्वेन्द्रियों तथा अन्तःकरण-वृत्तियोंके भासक रूपमें आत्माका बोध हो सकनेपर भी निष्प्रपंच, निरुपद्रव, सर्वभेदविवर्जित, स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्वका अपरोक्ष साक्षात्कार होना दुर्लभ होता, परंतु आपके सगुण, साकार विग्रहका ध्यान करनेसे चित्तकी एकाग्रता, निर्वृत्तिकता होनेसे द्रष्टा-दर्शन-दृश्य-भेदशून्य, सर्वाभावभासक, अखण्ड, अद्वैततत्त्वका बोध हो जाता है— सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३५) भगवान्‌का विग्रह भगवदिच्छामय है, इस पक्षमें भी विशुद्ध सत्त्व ही भगवान्‌की इच्छा है— अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। नेशे महि त्ववसितुं मनसान्तरेण साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२)