भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८४ भक्तिसुधा फल ही नारायणका सर्वभूतातिक्रमणलक्षण ईश्वरत्व है। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ 'नारायण' शब्दसे हिरण्यगर्भ ही विवक्षित है। स्वभावसे ही पूर्णकाम परमेश्वरमें कामना नहीं हो सकती। कहा जा सकता है कि 'सोऽकामयत' इत्यादि वचनोंसे परमेश्वरमें भी कामना प्रसिद्ध है। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि 'आप्तकामस्य का स्पृहा' (माण्डूक्यकारिका १।९) 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) इत्यादि स्मृति-सूत्रोंसे निष्काम परमेश्वरमें भी लीलासे ही अनन्त ब्रह्माण्डका सर्जन कहा गया है, अतः भगवान्का शरीर कर्मफल नहीं है, अतएव भौतिक भी नहीं है; क्योंकि विराट् और सूत्रात्मासे अतिरिक्त भौतिक शरीर नहीं होता। यहाँ शंका होती है कि फिर भगवद्विग्रहका उपादान क्या है ? अविद्या उपादान है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि स्वप्रकाश ज्ञानस्वरूप परमात्मामें अविद्याका होना सम्भव नहीं है। जीवकी अविद्या भगवान्के शरीरका उपादान है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसी स्थितिमें भगवच्छरीरको शुक्ति-रजतादिकी तरह कल्पित ही कहना पड़ेगा। शुद्ध चैतन्य ही भगवान्का शरीर है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि बोध या चैतन्यकी साकाररूपसे प्रसिद्धि नहीं है। यदि कथंचित् चैतन्यको ही भगवान्का शरीर मान लिया जाय तो चैतन्यके समान ही भगवद्विग्रह भी अतीन्द्रिय होगा। ऐसी स्थितिमें प्रश्न बना रहता है कि भगवान्के विग्रहका उपादान क्या है ? इसके उत्तरमें नीलकण्ठजी कहते हैं कि भगवान् अपनी प्रकृतिका ही आश्रय लेकर आत्ममायासे प्रकट होते हैं। जीवात्मा अनात्मभूता तेजोवन्नात्मिका या पंचभूतात्मिका प्रकृतिका सहारा लेकर जन्म ग्रहण करता है, भगवान् प्रत्यक्चैतन्यसे अभिन्न स्वरूपभूतका ही सहारा लेकर अर्थात् किसी दूसरे उपादानकी अपेक्षा न करके ही अपनी मायासे देव, मनुष्यादिरूपमें प्रकट होते हैं। जैसे कोई मायावी स्वयं अपने स्थानसे अप्रच्युत स्वभाव रहकर ही अदृश्य होकर, स्थूल-सूक्ष्म भूतोंको बिना गृहीत किये ही, केवल मायासे सूत्रमार्गसे आकाशपर चढ़ते हुए अपने सदृश ही एक दूसरे मायावीको रचता है, ठीक वैसे ही कूटस्थ चिन्मात्र भगवान् अपनी मायासे चिन्मय शरीरको रचते हैं, सूत्रारोहणके समान बाल-यौवनादि अवस्थाओंको दिखलाते हैं। मायावी और भगवान्में इतना ही भेद होता है कि मायावी मायाका उपसंहरण करता हुआ दूसरे मायावीका भी उपसंहार कर लेता है, भगवान् माया और विग्रह दोनोंका ही उपसंहरण नहीं करते। इस दृष्टिसे हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट चैतन्यको 'अन्तस्तद्धर्मोप- देशात्' (ब्रह्मसूत्र १।१।२०) इस सूत्रसे वियदादिका उपादान और सर्वेश्वर बतलाया गया है। अतएव अन्यत्र भी 'नित्यैव सा जगन्मूर्तिः' (श्रीदुर्गासप्तशती १।६४) इत्यादि वचनोंसे भगवन्मूर्तिको नित्य कहा गया है। देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते । (श्रीदुर्गासप्तशती १।६५-६६) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट कहा गया है कि नित्य भगवन्मूर्तिका ही प्रयोजनवशात् प्रादुर्भाव ही उत्पत्ति शब्दसे कहा गया है। भगवान् श्रीशंकराचार्यका कहना है कि अज, जन्मरहित तथा अव्ययात्मा, अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभाव ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त भूतोंके ईश्वर होकर भी भगवान् (जिसके वशमें सारा जगत् है और जिससे मोहित होकर अपने अन्तरात्मा प्रत्यक्चैतन्याभिन्न वासुदेवको नहीं जानता, उस अपनी) वैष्णवी मायाको स्ववश करके आत्ममायाद्वारा देहवान् एवं उत्पन्नसे प्रतीत होते हैं। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ (गीता ४।७) अर्थात् जब-जब प्राणियोंके अभ्युदय-निःश्रेयसके साधनभूत वर्णाश्रमादि लक्षण धर्मकी ग्लानि होती है और अधर्मका अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं अपने