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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 778 में से

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पृष्ठ 593

'नियुक्तिकं ब्रुवाणश्च नास्माभिर्विनिवार्यते' इस न्यायसे उनके लिये हम कुछ कहना नहीं चाहते। यदि ऐसा सम्भव हो तो रहे। श्रीशंकरानन्दजीका इस विषयमें कहना है कि यद्यपि 'कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते' इस वचनके अनुसार कर्मोंसे ही प्राणीका जन्म और विनाश होता है, परमेश्वरमें जन्महेतु पुण्य-पाप न होनेसे जन्म असम्भव है तथापि मायाद्वारा परमेश्वरका जन्म असम्भव नहीं, अतएव अज, अव्यय, निरवयव होनेपर भी भगवान्‌का जन्म मायासे हो जाता है। कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण परमेश्वरका कर्मनिमित्त जन्म न होनेपर भी उनका कोई नियन्ता अवश्य होगा। इसी भ्रमको दूर करनेके लिये भगवान्‌ने कहा है—'भूतानामीश्वरोऽपि सन्' (गीता ४।६) अर्थात् प्राणियोंका ईश्वर होनेपर भी 'एष सर्वेश्वरः' (माण्डूक्य० ६) इत्यादि श्रुतिके अनुसार सबका नियन्ता परमात्मा ही है, वह किसीके नियोगका विषय नहीं है। इस तरह अज, अव्यात्मा, ईश्वर होकर भी अपनी दैवी प्रकृति मायाका सहारा लेकर वे उत्पन्न हो सकते हैं। वह्निके दग्धृत्व शक्तिके समान परमेश्वरकी अभिन्न शक्ति ही उनकी माया है। यही बात 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्'' (श्वेताश्वतर० १।३) इत्यादि श्रुतियोंसे कही गयी है। उसी मायासे भगवान् जन्मवान्‌से प्रतीत होते हैं। वस्तुतः भगवान् निष्कल एवं निष्क्रिय ही हैं। इस विषयमें श्रीआनन्दतीर्थका कहना है कि भगवान् अज और अव्ययात्मा होकर भी प्रकृतिसे जात, वसुदेवादिसे जात होकर प्रतीत होते हैं। इस मतमें भगवान्‌का देह ही अव्यय है, उसीको नाना अवतारोंका निधान और अव्यय बीज माना है— 'एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्।' (श्रीमद्भागवत १।३।५) इस मतमें आत्ममायाका अर्थ आत्मज्ञान है; क्योंकि प्रकृतिका निर्देश पृथक् आ चुका है। 'मतिः क्रतुर्मनीषा माया' इत्यादि कोशमें 'मनीषा' के अर्थमें 'माया' शब्द आया है। श्रीमद्रामानुजाचार्यका कहना है कि भगवान् अपने अजत्व, अव्ययत्व, सर्वेश्वरत्वादि सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको न छोड़ते हुए ही अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावमें अवस्थित रहकर ही स्वेच्छासे अवतीर्ण होते हैं। 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्', 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः' इत्यादि श्रुतियोंने भगवान्‌के सगुण, साकार स्वरूपका स्पष्टीकरण किया है। इनके मतमें भी 'माया तु वयुनं ज्ञानम्' इत्यादि अभियुक्तियोंसे मायाका अर्थ ज्ञान ही है। तथा च आत्ममायया- का अभिप्राय है आत्मसंकल्प। अतः भगवान् आत्म- संकल्पसे ही, अपने अपहतपाप्मत्वादि ऐश्वर्यस्वभावको न छोड़ते हुए ही देव-मनुष्यादिरूपसे प्रतीत होते हैं। 'अजायमानो बहुधा विजायते' इस श्रुतिका भी अभिप्राय यही है कि भगवान् इतरपुरुषसाधारण जन्मसे रहित होनेपर भी स्वसंकल्पसे देवादिरूपसे जायमान होते हैं। श्रीनीलकण्ठजीका कहना है कि 'अजोऽपि सन् अव्ययात्मा' इस श्लोकद्वारा देहविशिष्ट परमात्माका ही अजत्व, अव्ययत्व कहा गया है। देहादिरहित केवल आत्माका अजत्व, अव्ययत्व तो 'न त्वेवाहं जातु नासम्' (गीता २।१२) इत्यादि श्लोकोंसे पहले ही कहा जा चुका है। 'भूतानामीश्वरोऽपि सन्' इस अंशसे देहविशिष्ट परमेश्वरका ही ईश्वरत्व सिद्ध किया गया है, अन्यथा देहादिसे निकृष्ट अस्मदादि भी ईश्वरत्व तत्त्वमस्यादि वचनोंसे स्पष्ट ही है। आदित्यान्तर्यामी परमेश्वरका हिरण्यश्मश्रुत्वादि- विशिष्ट देह जन्म-मरणवाला है, यह कोई नहीं कह सकता; क्योंकि फलकी पराकाष्ठा हिरण्यगर्भ-देहकी प्राप्ति ही है, हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट स्वरूप तो अकर्मज होनेसे नित्य ही है। भगवद्विग्रहका उपादान कुछ लोगोंका कहना है कि 'पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत। अत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानि। अहमेवेदं सर्वं स्याम्। इति स एतं पुरुषमेधं पञ्चरात्रं यज्ञक्रतुमपश्यत्' इत्यादि 'शतपथ' के वचनसे मालूम होता है कि पंचरात्राख्य कर्मविशेषका

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