भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८२ भक्तिसुधा भौतिक स्वरूप जीवाविष्ट हो ही नहीं सकता। कुछ लोग कहते हैं कि जीवाविष्ट शरीरमें ही 'भूतावेशन्याय' से ईश्वरका प्रवेश होता है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यदि इस शरीरमें जीवको ही सुख-दुःखादि भोग होता है, ईश्वरको नहीं, तब तो अन्तर्यामीरूपसे सर्वत्र ही परमेश्वरका प्रवेश सिद्ध है, फिर ऐसा शरीर-विशेष स्वीकार करना व्यर्थ ही है। यदि उस शरीरमें जीवका भोग नहीं बनता, तब तो उसे जीवशरीर भी नहीं कहा जा सकता, अतः ईश्वरका भौतिक शरीर कथमपि नहीं बन सकता। इन्हीं बातोंका निराकरण करते हुए भगवान् कहते हैं कि 'मैं अज और अव्यय होता हुआ भी, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंका ईश्वर होकर भी, अपनी विचित्र शक्तिवाली अघटितघटनापटीयसी उपाधिभूत मायाको अपने चिदाभाससे वशीभूत करके मायाके परिणामविशेषोंसे ही देहवान्के समान उत्पन्न- सा प्रतीत होता हूँ। अनादि माया ही यावत्कालस्थायी होनेसे नित्य कहलाती है। वही मुझमें जगतकारणता सम्पादन करती है। वह मेरी इच्छासे ही प्रवर्तमान होकर विशुद्ध सत्त्वमयी मेरी मूर्ति कहलाती है। उस मूर्तिसे विशिष्ट मुझमें अजत्व, अव्ययत्व, ईश्वरत्व उपपन्न हो जाता है।' अतएव श्रुति कहती है— 'आकाशशरीरं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद् वल्ली १ अनुवाक ६) आकाश अर्थात् माया ही भगवान्का शरीर है। यहाँ शंका हो सकती है कि भौतिक शरीर न होनेपर भगवान्में मनुष्यत्वादि-प्रतीति कैसे होगी? इसका समाधान यह है कि आत्ममाया (भगवान्की माया)-से ही लोकानुग्रहके लिये भगवान्में मनुष्यत्वादि- प्रतीति होती है। यही बात 'मोक्षधर्म' में लिखी है— माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद॥ सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि। (महा०, शान्ति० ३३९।४५-४६) एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते॥ इच्छन् मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः। (महा०, शान्ति० ३३९।४४-४५) अर्थात् हे नारद! मुझ कारणोपाधि परमेश्वरको जो भूतगुण-शब्दादिसे युक्त देख रहे हो, यह मेरी माया ही है। मुझ कारणोपाधिको कोई चर्मचक्षुसे नहीं देख सकता। कुछ लोग परमेश्वरमें देह-देहि-भाव ही नहीं मानते। उनका कहना है कि सच्चिदानन्दघन, निर्गुण, परिपूर्ण परमात्मा ही भगवान्का देह है। भगवान्से पृथक् भौतिक या मायिक उनका कोई भी विग्रह नहीं है। 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा अनुच्छित्तिधर्मा' इत्यादि श्रुतियों और 'असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेर्नात्माऽश्रुतेर्नित्य- त्वाच्च ताभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे यही विदित होता है कि वस्तुतः भगवान् जन्म-विनाशरहित, सर्वभासक, सर्वकारण, मायाका अधिष्ठान होनेसे सर्वभूतोंके ईश्वर होकर भी अपने एकरस, सच्चिदानन्दघनस्वभावमें ही अवस्थित रहकर देह-देहिभावके बिना ही देहिवत् व्यवहरण करते हैं। अदेह सच्चिदानन्दघनमें देहकी प्रतीति कैसे होती है? इसका उत्तर 'आत्ममायया' से ही दे दिया है। निर्गुण, शुद्धरस, देहदेहिभावशून्य भगवान्में देहरूपसे प्रतीति मायामात्र है। यही 'श्रीमद्भागवत' में भी— कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (१०।१४।५५) अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥ (१०।१४।३२) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट कहा गया है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा श्रीकृष्ण ही हैं, वे ही अपनी मायासे जगत्के हितके लिये देहवान्से प्रतीत होते हैं। नन्दगोपव्रजवासियोंका लोकोत्तर सौभाग्य था कि पूर्ण सच्चिदानन्दघन उनका मित्र होकर प्रकट हुआ था। कुछ लोग निरवयव, निर्विकार परमानन्दका ही अवयवावयविभाव वास्तविक ही मानते हैं, परंतु