भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 591

क्रमण-चरण-विन्यास करते हैं। 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पाꣳसुरे स्वाहा'। इस मन्त्रसे ज्ञात होता है कि त्रिविक्रमावतारधारीने इस प्रतीयमान विश्वको अपने चरणोंसे आक्रान्त किया है, अपने चरणसे तीन प्रकारसे पादविन्यास किया है। इन विष्णुके धूलियुक्त पादस्थानमें सम्पूर्ण विश्व अन्तर्भूत होता है। 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्' इसमें भी कहा गया है कि किसीके द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, उस सर्वजगत्के रक्षक विष्णुने अग्निहोत्रादि कर्मोंका पोषण करते हुए पृथिव्यादि स्थानोंमें अपने तीन पदोंसे क्रमण किया। इस तरह अनेक श्रुतियोंमें परमात्माके सगुण, साकार रूपका वर्णन है। 'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते। तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा।।' यहाँ भी कहा है कि प्रजापति गर्भके भीतर आता है, वह स्वरूपसे अज होकर भी अनेक रूपोंसे प्रकट होता है, उसके प्राकट्यका धर्मरक्षणादि प्रयोजन धीर लोग जानते हैं। 'या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥' 'नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः' इत्यादि अनेक स्थानोंमें परमेश्वरका ही नीलकण्ठ महादेवरूपमें वर्णन मिलता है। एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ इस मन्त्रमें कहा गया है कि यही ईश्वर सब दिशाओंमें व्याप्त होकर, पहले गर्भमें रहकर प्रकट हुआ, वही सर्वतोमुख परमेश्वर पहले अनेक रूपसे उत्पन्न हुआ है और आगे भी उत्पन्न होगा। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ (गीता ४।६) इस श्लोकपर निम्नलिखित अभिप्राय केशव काश्मीरीका है- 'यद्यपि मैं अज हूँ अर्थात् जीवोंके समान कर्मनिमित्त अपूर्व देह-ग्रहण नहीं करता, अव्ययात्मा=पूर्वदेहवियोगरहित हूँ तथापि अपनी प्रकृति (स्वभाव) - असंगत्व, अजेयत्व, अनतिक्रमणीयत्वादिको न छोड़कर ही अपनी माया - संकल्पसे लोकहितार्थ जन्म लेता हूँ।' इस व्याख्यानमें 'प्रकृति' का अर्थ स्वभाव और 'माया तु वयुनं ज्ञानम्' इस 'निघण्टु' वचनसे 'माया' का अर्थ ज्ञान लिया गया है। 'अजायमानो बहुधा विजायते' (मुद्गल० ३।१) इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध किया गया है। 'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति' (मुण्डक २।२।७), 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेता० ३।८), 'हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः' (छान्दोग्य० १।६।६) इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान्का सगुण स्वरूप मालूम पड़ता है। 'यो वेत्ति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मनः। मुखं तस्यावलोक्याऽपि सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ स सर्वस्माद्बहिष्कार्यः श्रौतस्मार्तविधानतः।' 'न भूतसङ्घसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः।' अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० १०।१४।२) इत्यादि 'भारत' 'भागवत' आदिके वचनोंसे भी भगवान्के स्वरूपको अभौतिक कहा गया है, भौतिक माननेवालेको पातकी बतलाया गया है। मधुसूदनजी कहते हैं कि सर्वज्ञ ईश्वरको धर्माधर्म न होनेसे उनका जन्म नहीं बन सकता। नये देहेन्द्रियादिका ग्रहण जन्म और पूर्वगृहीतका वियोग मृत्यु कहलाता है। ये दोनों ही बातें अज, अव्यय परमात्मामें सम्भव नहीं हैं। यदि ईश्वरका शरीर स्थूल भूतकार्य हो या व्यष्टिरूप हो तो जाग्रदवस्थाभिमानी जीवोंके तुल्य ही ईश्वर भी होगा। समष्टिरूप हो तो विराट् जीवरूप होगा। यदि सूक्ष्मभूतका कार्य है या व्यष्टिरूप है तो स्वप्नावस्थाभिमानी होगा और यदि समष्टिरूप हो तो हिरण्यगर्भ होगा। परमेश्वरका