भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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ही श्यामीभूत ब्रह्म कृष्ण माना है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ किसीका कहना है कि पूर्णानुरागरससार- सरोवरसमुद्भूत पंकज श्रीकृष्ण है, किसीने कहा नहीं, सच्चिदानन्दरससार-सरोवरसे ही इस कृष्ण-कुवलयका प्राकट्य हुआ है। वह ऐसा कुवलय है कि भृंगों (भक्तमनोमिलिन्दों)-ने अभीतक उसका आघ्राण किया ही नहीं। चाहे ऐसा कह लें कि यद्यपि वे अनादि कालसे ही उस कृष्णके सौन्दर्य-कुवलयमधुका पान कर रहे हैं तथापि उन्हें प्रतिदिन, प्रतिक्षण उसमें नवीनताका ही स्फुरण होता है अर्थात् प्रतिक्षण ही उसमें नवीनताका ही भान होता रहता है— 'तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्' इसी तरह कवीन्द्ररूप अनिलोंने अभीतक इस कुवलयके यशःसौरभका अपहरण नहीं किया अर्थात् उन्हें भी नवीनताकी ही स्फूर्ति होती है। ऊर्मीकणभरोंसे—सांसारिक षडूर्मियोंसे— यह कुवलय आहत नहीं हुआ। इतना ही क्यों, आजतक किसीने इसे देखा भी नहीं है— अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत्॥ (आनन्दवृन्दावनचम्पू २।११) देवकीने मुक्त मुनीन्द्रोंका अन्वेष्टव्य एक अद्भुत फल उत्पन्न किया, व्रजेन्द्रगेहिनी नन्दरानीने उसे पाला, श्रीव्रजसीमन्तिनियोंने उस फलका अनुभव किया— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ (पद्यावली २९९) श्रुतियोंमें सगुण-साकाररूपकी अवधारणा सच्चिदानन्द परब्रह्मका सगुण, साकार रूप होता है, यह 'केनोपनिषद्' में भी प्रसिद्ध है। देवासुर-संग्राममें परमेश्वरके अनुग्रहसे देवताओंको जय मिली, परंतु देवताओंने समझा कि हमारे ही परिश्रमका यह फल हुआ। भगवान्‌ने समझ लिया कि यदि इन्हें भी गर्व हुआ तो असुरोंसे इन देवताओंमें अन्तर ही क्या रह जायगा? असुषु प्राणोपलक्षितेषु अनात्मसु रमन्ते ये ते असुराः। अथवा अशोभने अनात्मनि रमन्ते ये ते असुराः। अर्थात् अशोभन अनात्मामें रमण करनेवाले असुर कहलाते हैं। भगवान् यह सोचकर परम प्रकाशमय सगुण, साकार, दिव्य रूपमें प्रकट हुए। उस स्वरूपको देखते ही देवता घबड़ाये और 'सपक्षका है या विपक्ष का' यह जाननेके लिये अग्नि, वायु और इन्द्रको भेजा। अग्नि, वायु उस परमात्माके सामने एक तृण भी उठाने एवं जलानेमें समर्थ न हुए। दोनों देवताओंके लौटनेपर इन्द्र गये। इन्द्रको आते देखते ही वे प्रभु अन्तर्हित हो गये। इन्द्र लज्जित होकर वहीं उस स्वरूपकी जिज्ञासासे तप करने लगे। बहुत दिनोंके तपसे भगवती उमा (ब्रह्मविद्या) प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रह्मका परिचय कराया। ब्रह्मज्ञानी होनेसे ही देवताओंमें अग्नि, वायु, इन्द्र प्रधान हैं। उनमें भी इन्द्रने पहले ब्रह्मका परिचय प्राप्त किया, अतः वही श्रेष्ठ माने गये हैं। 'ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये' इत्यादि श्रुतियोंमें ये बातें स्पष्ट हैं। 'छान्दोग्य' में भी सूर्यमण्डलान्तर्गत एक हिरण्मय, हिरण्यश्मश्रु, तेजोमय परम पुरुषका वर्णन आता है, वह भी सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही सगुण, साकार रूप है। यह बात उत्तरमीमांसाके 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रमें भी स्पष्ट है। आचार्य श्रीशंकरभगवान् कहते हैं कि परमात्माका माया (विशुद्ध सत्त्व)-के योगसे विग्रह बन सकता है। यद्यपि वह भूतगुणों—शब्दादिसे युक्त प्रतीत होता है तथापि वह शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है। शब्दादिमत्ताकी प्रतीति उसमें भ्रान्ति ही है। 'कैवल्योपनिषद्' में 'उमासहायं परमेश्वरं विभुम्' इस वचनसे भी उमा-महेश्वरका स्वरूप वर्णित है। 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे। पृथिव्याः सप्तधामभिः' इस मन्त्रमें बतलाया गया है कि विष्णुगायत्र्यादि सप्त छन्दोंद्वारा देशपर विविध