भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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निर्गुण या सगुण ५८७ भूषण-वसन तथा सांगोपांग परिकरादिका चिन्तन किया जाता है। पश्चात् प्रेम और अनुरागकी वृद्धिमें श्रीचरणारविन्द या अमृतमय मुखचन्द्रमें ही मनकी एकाग्रता सम्पादन की जाती है। प्रेम-प्राखर्यमें मनकी इतनी शिथिलता होती है कि परम मधुर भगवान्‌से भिन्न वस्तुके चिन्तनकी तो चर्चा ही क्या ? साक्षात् श्रीभगवान्‌के अनन्त कोटि चन्द्रसागर-सार-सर्वस्व निष्कलंक पूर्णचन्द्रकी मधुर दीप्तिको लजानेवाले सुस्मित मुखचन्द्रको ग्रहण करनेमें भी वह असमर्थ हो जाता है। इस तरह सर्व प्रपंचोंसे हटकर अपने ध्येयमें स्थित मनको जब ध्येय-ग्रहणमें भी सामर्थ्य न रहा, तब जो वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्द भगवान् अभीतक ध्येयरूपमें स्थित थे, वे ही अब ध्येय-ध्यान-ध्याता और उन तीनोंके अभावके प्रकाशरूपसे अभिव्यक्त होते हैं। ध्याता-ध्यान-ध्येय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय आदि त्रिपुटियोंका ऐसा स्वभाव है कि इनमें एकके मिटनेसे तीनों ही मिट जाते हैं। एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९) ध्येय न रहनेपर ध्यान भी नहीं रहता; क्योंकि ध्येयाकार मानसी वृत्तिको ही ध्यान कहा जाता है और ध्यानरूपा वृत्तिके आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही ध्याता कहा जाता है। अतः जब ध्यान नहीं, तब ध्यानका आश्रयभूत ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता है और ध्याता तथा ध्यानके न होनेपर ध्याताके ध्यानका विषयीभूत ध्येय भी कैसे उपलब्ध हो सकता है। इस तरह जो सर्वावभासक भगवान् अभी ध्येय-रूपसे स्थित थे, वे ही किसी समयके सर्वाभावभासक तथा इस समय सर्वाभावके भासकरूपसे अभिव्यक्त हो जाते हैं। इस तरह प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्यामृत- सौन्दर्यामृतपानसे उन्मत्त मनकी शिथिलता और निश्चलता होते ही ध्यान-ध्येय-ध्याताके भाव तथा अभावके भासक शुद्ध प्रत्यक्‌इ‌डन्तरात्मा स्वरूपसे अनन्त अखण्ड व्यापक आनन्दघन भगवान् प्रकट हो जाते हैं। इस तरह सहजमें ही भगवान् अपने ही मधुर स्वरूपमें मनको खींचकर और अपने माधुर्य सौन्दर्यामृत- पानसे मनको विभोरकर, त्रिपुटी मिटाकर, सर्वाभावभासक शुद्ध सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर भक्तको सदाके लिये कृतार्थ कर देते हैं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्‌के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड-नायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बताया गया है। चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्‌के अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार ध्यान कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये पुनः-पुनः भगवान्‌के मधुर स्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः- पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है— 'हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्‌के अचिन्त्य, अनन्त, मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्वसाधन तथा सर्वफल स्वरूप है। अतएव इसमें साधक तथा सिद्ध दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है— साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) प्रभुके श्रीचरणारविन्द-सौगन्ध्यामृत-सिन्धुके एक बिन्दुके समास्वादन करनेसे सनकादि, शुकादि-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी यह अनुभूतियाँ हैं— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५)