भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ भक्तिसुधा नीलाम्बुदके अंकुरपर शोभायमान सुन्दर विद्युत्कलिका है या किसी दिव्य कसौटीपर रंजित कनक-रेखा है। अरुण-कमलके सदृश मुख, श्रीहस्त और चरणसहित दीप्यमान श्यामल सर्वांगको देखकर समझती हैं कि यह चार-पाँच अरुण कमलकोशसे संयुक्त सुन्दर यमुना-तरंग हैं। अमृतमय मुखचन्द्र और सुन्दर अलकावलियोंको देखकर श्रीनन्दरानी कल्पना करती हैं कि यह क्या सौन्दर्य-माधुर्यमय मादक मधुका अधिक पान कर लेनेसे उन्मदान्ध अतएव भ्रमणमें असमर्थ निश्चल मधुकरसमूह है, किंवा स्निग्ध-श्यामल गाढान्धकारके अंकुर-समूह ही अलक-समूहरूपमें भासमान हो रहे हैं! नयनोंको देखकर उनमें मुकुलित नीलोत्पलकी कल्पना और सुन्दर युगल कपोलोंमें दिव्य नीलमणिमय जलके विशाल बुद्बुदकी कल्पना करती हैं और अति-सुभग युगल श्रवणको देखकर उनमें श्यामल महो (तेजो)-मयी लतिकाके अभिनवोन्मिषित युगल पल्लवकी कल्पना करती हैं। तिमिर-द्रुमके अंकुरके समान नासाशिखर, यमुनाके बुद्बुदके समान दोनों नासापुट, द्विदल जवाकोरकके समान अधर, ओष्ठ परिपक्व तथा छोटे-छोटे यमल (सहजात या युग्म) जम्बूफलके समान चिबुक (ठोढ़ी)-को निरीक्षणकर नयनोंके फलको पाकर व्रजरानीने आनन्द-जलधिमें अपनी आत्माको अवगाहन कराया। बालदर्शनसे श्रीनन्दरायजी आनन्दमूर्च्छित हो गये इतनेमें ही श्रीमन्नन्दरायके समीप जाकर व्रजपुरपुरन्ध्रियोंने पुत्रजन्मका मंगल-सन्देश सुनाया। ग्रीष्मसे सूखे हुए सरोवरको अमृत-धाराओंसे सरस करते हुए अद्भुत मधुर घन-गर्जनकी तरह पुत्रजन्म- श्रवण करते ही श्रीमन्नन्दराय जैसे हर्षवर्षामें स्नानकर, अमृत-महार्णवमें प्रविष्ट होकर, आनन्द-मन्दाकिनीसे आलिंगित होकर बालकके अवलोकनके लिये उत्कण्ठित हो उठे। यद्यपि आनन्द-मूर्च्छाके समय सूतिका- भवनमें प्रवेश असम्भव था तथापि स्वयं उपस्थित मूर्त्तिमान् ब्रह्मानन्द चमत्कारने ही श्रीव्रजराजके श्रीहस्तको पकड़कर सूतिका-भवनमें पहुँचाया। फिर भी स्खलन सम्भव था, अतः समुचित सुकृतसमूह चातुर्य ही आकर्षण करता हुआ सूतिका-भवनकी ओर ले चला। इतना ही नहीं, आनन्द-मूर्च्छाके पश्चात् उत्पन्न होनेवाली उत्कण्ठाने अपने दोनों हस्तोंसे पृष्ठकी ओर प्रेरित किया। इस तरह इन सबकी सहायतासे सूतिका- भवनमें पहुँचकर यशोदोत्संगलालित श्रीकृष्णको देखकर वे विचार करने लगे कि क्या यह अखण्ड सान्द्रानन्दका बीज है, किंवा जगन्मंगल मंगलोदयका अंकुर है अथवा सिद्धांजनलताका पल्लव है या चिरतर-समय- समुत्पन्न सुकृतकल्पमहीरुहा-रामका कुसुम है अथवा समस्त उपनिषद् कल्पलता-श्रेणीका सुन्दर फल है, किंवा श्रीव्रजेश्वरीकी श्रीअंगररूपा अपराजितालताका ही कुसुम है। इस तरह अभिनव बालकको देखकर श्रीनन्दराय मानो सर्वमनोरथ-सम्पत्तिसे सिद्ध हो गये, आनन्द साक्षात्कार चमत्कारसे विक्षिप्त हो गये या लिखित चित्रकी तरह जड़ीकृत हो गये। भगवान्का जातकर्म-संस्कारोत्सव इस प्रकार प्रथम आनन्द-मूर्च्छामें प्रसुप्त होनेके बाद श्रीकृष्ण-दर्शन-सुखका अनुभव करानेके लिये चेतनादेवीने ही इन्हें प्रतिबोधित किया। उज्जृम्भमाण विपुल आनन्दसे पुलकावली और आनन्दवाष्पकणनिकर- निपात आदिसे लक्षित किसी अलौकिक दशाको प्राप्त होकर सनन्द, उपनन्द, सन्नन्द आदि तथा विप्रगणसहित पुरोधससे जातकर्मादि संस्कार कराकर अपार सम्पत्ति रत्न-मणि-भूषण-वसन-गोधनादिका उन्होंने दान दिया। श्रीमन्नन्दरायके दान-कालमें चिन्तामणि, कल्पतरु, कामधेनुओंके समुदाय शक्तिहीनसे हो गये, रत्नाकरोंमें नाना मत्स्यादिमात्र ही शेष रह गये, किं बहुना त्रैलोक्य-लक्ष्मीके भी पास लीला-कमल ही अवशिष्ट रहा। श्रीव्रजराजकुमार श्रीकृष्णका जन्म हुआ, यह मंगलमय ध्वनि मुखोंमुख, मार्गोंमार्ग, कानोंकान सर्वत्र फैल गयी और सब सोचने लगे कि श्रीयशोदा अद्भुत कल्पलता है, जिसमें भगवत्प्रकाश-रूप दिव्य फल प्रकट