भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णकी बालक्रीडा २३ सर्वस्वसे ही अभ्यंग आदि हुआ है। यह बालक मानो अभिनव नीलमणीन्द्रका अंकुर है अथवा श्यामल तमालका सुभग मृदुल पल्लव है अथवा मानो नवाम्भोदका अति स्निग्ध कन्दल है या त्रैलोक्य- लक्ष्मीका अत्यन्त उत्कृष्ट और सुरभित कस्तूरिका- तिलक है किंवा सौभाग्यसम्पत्तिका अति चिक्कण एवं सर्वाकर्षण-सम्पन्न सिद्धांजन है। क्या यह बालक सुरभित श्यामल मृगमद कर्दम है या श्यामामृत- महोदधिके मन्थनसे समुद्भूत अति स्निग्ध और मधुर नवनीतपिण्ड है अथवा मृगमद-रससे श्यामलीकृत शुद्ध दुग्धफेनखण्ड या सौन्दर्य-माधुर्य सुधाजलनिधिका रत्न है किंवा सुछवि युवतीका ललित लोचन है। श्रीनन्दरानीद्वारा पयःपान कराना पहले तो श्रीनन्दरानी बालकके दिव्यांगमें अपना प्रतिबिम्ब देखकर ‘यह कौन है’ ऐसी शंकासे व्याकुल हो उठीं और सोचने लगीं कि ‘क्या प्रसवके समय मेरा रूप धरकर यह कोई योगिनी आ गयी है।’ पश्चात् नृसिंह मन्त्र जपती हुई, उससे ‘दूर हो’ ऐसा कहती हैं। तत्पश्चात् दीर्घश्वासके सम्बन्धद्वारा निजप्रतिबिम्ब मिटनेपर श्रीव्रजरानीने उस अद्भुत बालकको देखा, जिसका अंग मृगमदसार-पंकके समान अत्यन्त सुकोमल है, जिसका मुखचन्द्र चूर्णित घनान्धतमकी तरह स्निग्ध श्यामल अलकावलीसे शोभित है और जो मानो सबके मनको आकर्षित करनेके लिये ही दोनों हाथोंकी मुट्ठी बाँधे हुए कालिन्दी-तरंगकी तरह चरणको चला रहा है। स्वयं परम कोमलांगी होती हुई भी अंकमें लेनेसे भयभीत होती हैं कि कहीं मेरे कठोर अंगसे बालकका सुकुमार शरीर पीड़ित न हो, अपने पयोधरके अग्रको उसके अधरपुटमें रखकर वे पयःपान कराने लगीं। फिर व्रजपुरन्ध्रियोंके शिक्षानुसार श्रीकृष्णको गोदमें लेकर मूर्त अमृत-रसकी तरह स्तन-रस पिलाने लगीं। स्नेहके आवेगसे दुग्ध अधिक प्रसृप्त होकर मृदुल बिम्बाधरके प्रान्तसे कपोलतलको आप्लावित करने लगा, तब श्रीव्रजरानी सादर सस्नेह सुकोमलतर आँचलसे उसको पोंछने लगीं। श्रीव्रजरानीकी समस्त सखियाँ बालकको देखकर प्रमुदित होती हैं और विचार करती हैं—‘अहो! इस शिशुको सिरपर धारण करें किंवा नयनोंमें धारण करें किंवा हृदय या हृदयके मध्यमें इसे बिठला लें।’ फिर देखती हुई कल्पना करती हैं, मानो देदीप्यमान नीलमणिसे इस बालकके सर्वांगका निर्माण हुआ है। कुरुविन्द (अरुण कान्तिवाले मणि)-से बिम्बाधर एवं पद्मरागसे श्रीचरण और हस्त तथा पक्व दाड़िम- बीजके समान शिखरमणिसे नखोंका निर्माण हुआ है, अतः क्या यह मणिमय बालक है? पुनः बालकके श्रीअंगकी कोमलताका अनुभव करके कठिन मणि- मयत्वकी कल्पनाको अनुचित समझकर दूसरी कल्पना करती हैं, मानो नीलेन्दीवरसे बालकके सकल अवयवोंका, बन्धूकसे बिम्बाधर ओष्ठका, जवाकुसुमसे पाणिपादका और प्रान्तरत्न मल्ली-कोरकसे नखसमूहका निर्माण हुआ है, अतः क्या यह कुसुममय बालक है? फिर सोचती हैं कि क्या वस्तुतः अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्य-माधुर्य-बिन्दुका उद्गमस्थान और अचिन्त्य अनन्त सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासिन्धु-सार-सर्वस्व किंवा सकेलि सुषमा और शोभासारको ही लेकर किसी अद्भुत अलौकिक जगन्मोहन कामने ही अपने सु- करकमलसे इस बालकका निर्माण किया है! श्रीव्रजेश्वरीका बालकृष्णके मनोरम अंगोंको देखकर मुग्ध होना श्रीव्रजेश्वरी अपने ललन श्रीबालकृष्णको स्नेहस्रुत पयोधर पिलाती हुई दक्षिण वक्षःस्थलमें मृणालतन्तुके समान स्वच्छ सुभग सुस्निग्ध दक्षिणावर्त रोमराजिस्वरूप श्रीवत्सचिह्नको देखकर स्तनरस-कणोंके निपात- विन्यासको समझकर मृदुल अंचलसे पोंछती हैं, परंतु पोंछनेपर भी जब वह न मिटा, तब यह कोई ‘महापुरुष-लक्षण है’ ऐसा चिन्तन करने लगीं। पुनः वक्षःस्थलके वामभागमें स्वर्णसरीखे वामावर्त रोमराजीरूप लक्ष्मीचिह्नको देखकर कल्पना करती हैं, क्या यह सुकोमल नवल तमाल-पल्लवपर बैठी हुई अतिसूक्ष्म पीतवर्णकी कोई विहंगी है या अति सुन्दर स्निग्ध