भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

२२ भक्तिसुधा श्रीकृष्ण मानो अद्भुत कुवलय अर्थात् रात्रिविकासी पंकज हैं। वह पंकज भी जलीय सरोवरके साधारण पंक या क्षीरसरोवरके नवनीतमय पंकसे जायमान नहीं है, किंतु पूर्णानुरागरससार सरोवरके सारमय पंकसे उत्पन्न होनेवाला पंकज है। यह ऐसा अलौकिक कुवलय है कि आजतक भृंगोंने इसका आघ्राण एवं मकरन्द-पान नहीं किया। अर्थात् भक्तोंने अबतक श्रीमन्नारायणके ही रूपमाधुर्यका आस्वादन किया, पर इन यशोदोत्संग-लालित श्रीकृष्णका माधुर्यामृत पान नहीं किया और अनिलोंने अभीतक इस पंकजका सौगन्ध्य भी नहीं हरण किया। अभिप्राय यह है कि कवीश्वरोंने अबतक नारायणके यशका ही वर्णन किया है, अतः यह उनके लिये भी अपूर्व ही है और यह नीरमें उत्पन्न होनेवाला भी नहीं अर्थात् प्रपंचमें श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव ही नहीं है। तरंगोंने भी इस पंकजको आहत नहीं किया है अर्थात् मायामय गुणोंके तरंगोंसे यह असंस्पृष्ट है और आजतक किसीने कहीं भी इस अद्भुत कमलको देखा भी नहीं है या वैकुण्ठवासियोंने भी इस तत्त्वका दर्शन नहीं किया है अथवा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके श्रीअंगका ऐसा अद्भुत नित्य नवनवायमान माधुर्य है कि भक्तगण अनादि कालसे उसका आस्वादन करते हुए भी उसको प्रतिक्षण अभिनव एवं अपूर्व ही समझते हैं, वैसे रसिकजन भी सदा ही श्रीकृष्णके सुमधुर यशका वर्णन करते हैं, पर तब भी उन्हें प्रतिक्षण उसमें अपूर्वताका ही भान होता है— अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दसरसो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत् ॥ (आनन्दवृन्दावनचम्पू) व्रजांगनाओंको माधुर्यरूप बालप्रभुका दर्शन श्रीनन्दरानी मृदु मधुर विश्व-मोहन शिशु- रुदनको सुनकर प्रेमानन्दमें चित्रलिखित-सी रह गयीं। योगमायाका प्रभाव मिट जानेपर शिशु-रुदनसे आकर्षित होकर स्निग्ध व्रजयुवतीजन समीप आयीं। जैसे चन्द्रमाका अभ्युदय होते ही व्यवधानयुक्त भी (साक्षात् चन्द्रिका-सम्बन्ध न होनेपर भी) कुमुदिनी प्रफुल्लित होती है, वैसे ही श्रीकृष्णचन्द्रके अभ्युदयमात्रसे परमानन्दवती स्निग्धाओंके सुमनस (शोभन मन) प्रफुल्लित हो उठे। श्रीकृष्ण केवल श्रीयशोदाकी शय्यापर ही नहीं, अपितु व्यवधान होनेपर भी स्निग्धोंके स्वच्छ चित्तपर भी प्रतिबिम्बकी तरह स्फुरित हुए। नवनील नीरधरके समागममें चातकीके समान प्रहृष्ट होकर व्रजांगनाएँ शीघ्र ही समीप आकर रोहिणी आदिके साथ बालकको देखने लगीं। जैसे अभ्युदित होते हुए पूर्ण चन्द्रमाको उत्कण्ठित होकर चकोरीगण देखती हैं, वैसे ही व्रजांगनागण श्रीकृष्णको सतृष्ण निर्निमेष नयनोंसे देखती हुई सोचती हैं कि क्या यह अद्भुत अलौकिक नीलकमलमय माल्य है, किंवा अलौकिक इन्द्रनीलमणि है अथवा विचित्रच्छविका सुमधुर वैदूर्य है। अहो! यह बालक अनुपमेय और अज्ञेय है। इस बालकके तनु और सर्वेन्द्रियोंकी रचना नयनोंकी निर्द्वन्द्वताका विस्तार करती है। अहो! मानो इस बालकके श्रीअंग मृगमद-सौरभ तथा तमाल-दलसारसे अभ्यंजित हैं, मानो निखिल- ब्रह्माण्डव्यापी लावण्यामृतसारसे ही इस बालकके श्रीअंगमें उबटन हुआ है और निजांगतेजसे ही यह नहलाया गया है। मानो निज-मुखचन्द्रसे विनिःसृत कान्ति-सुधासे ही इसका अनुलेपन हुआ है एवं मंगलमय लक्ष्मीसे ही इस बालकका अंग भूषित किया गया है। अथवा इस बालकके सुन्दर अंगोंमें मानो अति सुगन्धित स्नेह (तेल या प्रेम)-से अभ्यंग हुआ है और सौरभ्य (विश्वव्यापी सौगन्ध्यामृतसार)-से उबटन हुआ है, माधुर्यामृतसारसे स्नान कराया गया है और लावण्यसारसे मार्जन किया गया है। सौन्दर्यसारसर्वस्वसे अनुलेपन और त्रैलोक्य-लक्ष्मीसे ही इसका शृंगार हुआ है। अभ्यंग-स्नान-मार्जन आदिसे लोकमें यत्किंचित् स्निग्धता-मधुरता-लावण्यादिका सम्पादन होता है, यहाँ तो स्नेह-माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्यादि सुधासार-