भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २१ विलास आपमें औपचारिक दृष्टिसे व्यपदिष्ट होते हैं। त्रिलोकी-पालनके लिये आप ही सत्त्वका अवलम्बन करके शुक्लरूपको धारण करते हैं और उत्पादन तथा संहारके लिये रक्त और कृष्णरूप धारण करते हैं। हे विभो! आप इस लोककी रक्षाके लिये ही मेरे गृहमें अवतीर्ण हुए हैं और आप असुर-यूथपोंकी सुसज्जित बड़ी-से-बड़ी सेनाओंका वध करके भू- भारका अपनयन करेंगे; परंतु आपके अग्रजोंका वध करनेवाला यह कंस तो अभी ही आपका जन्म-श्रवण करते ही शस्त्र लेकर आयेगा। इस तरह श्रीवसुदेवजीकी स्तुति समाप्त होनेपर देवकी भी महापुरुष-लक्षण-सम्पन्न पुत्रको देखकर तथा कंससे भयभीत होकर स्तुति करने लगी—'जिस अव्यक्त, आद्य, निर्विकार, निर्गुण ब्रह्मज्योतिको वेद निर्विशेष, निरीह तथा सत्तामात्र बतलाते हैं, वह समस्त कार्य-कारण, अध्यात्मके प्रकाशक, व्यापक विशुद्ध ब्रह्म आप ही हैं। कालचक्रके वेगमें समस्त प्रपंचका विलयन हो जानेपर भी एक आप ही अवशिष्ट रहते हैं। हे प्रकृति-प्रवर्तक प्रभो! यह कालचक्र भी केवल आपकी ही लीला है। अतः नाथ! मैं आपके प्रपन्न हूँ। हे नाथ! मरणधर्मा प्राणी मृत्यु-व्यालसे भीत होकर पलायन करता हुआ समस्त लोकोंमें गया, परंतु कहीं निर्भय न हुआ, पर जब कभी वह आपकी कृपासे आपके श्रीचरणोंको प्राप्त करता है, तभी स्वस्थ होकर सुखकी नींद सोता है, फिर तो मृत्यु उससे बहुत दूर रहती है। हे नाथ! आप हम सबकी इस कंससे रक्षा करें और साथ ही यह भी प्रार्थना है कि यह ध्यानास्पद स्वरूप सर्वसाधारणको दृष्टिगोचर न हो और कंस मुझमें हुए आपके जन्मकी बात न जाने।' इस तरह नाना प्रकारसे वसुदेव और देवकीका स्तवन श्रवणकर उनके पूर्वजन्मकी तपस्या तथा वर- प्राप्तिकी बात बताकर एवं अपनेको नन्दके घर पहुँचानेका संकेत करके माता-पिताके देखते-देखते ही अपनी दिव्य योगमायाके प्रभावसे श्रीकृष्ण शिशु रूपमें व्यक्त हो गये। भगवान्‌के संकेतसे ज्यों ही श्रीवसुदेवजीने अपने शिशुको नन्दके घर पहुँचानेका मन किया, त्यों ही श्रीवसुदेवजीके चरणोंके बन्धन शिथिल हो गये और पहरेदार सो गये। वज्रमय कपाट भी खुल गये। जिस समय श्रीवसुदेवजी बालकरूप परमपुरुषको लेकर चले, नागराज श्रीशेष अपने सहस्त्र फणोंसे छाया करते हुए साथ चले और श्रीयमुनाजी गाध हो गयीं। इस तरह श्रीयोगमायाकी सहायतासे श्रीवसुदेवजीने श्रीमन्नन्दरायके मंगलमय भवनमें, जिसका द्वार खुला था, पहुँचकर प्रसुप्त श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीकी शय्यापर अपने सर्वस्व पुत्ररत्न किंवा अन्तरात्माको ही लिटा दिया और कन्यारूपमें श्रीयशोदाजीसे उत्पन्न योगमायाको लेकर वे अपने स्थानको लौट आये। श्रीवसुदेवके चले जाने तथा योगमायाका प्रभाव मिट जानेपर सब लोग प्रबुद्ध हो गये— ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ यशोदाजीको बालरूपके दर्शन श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीने प्रबुद्ध होकर नीलोत्पलदल- श्याम मनोहर पुत्रको देखा और वे अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुईं। इस समयकी बालकृष्णकी शोभा या छविका कहना ही क्या है! भगवान् दिव्यातिदिव्य महेन्द्र नीलमणि तथा अति दिव्य नीलकमल, किंवा नील नीरधर या मयूरपिच्छचन्द्रकसे कोटिगुणित सुन्दर, श्यामल, कोमल, गम्भीर एवं दीप्तिमान् हैं और अपने अमृतमय मुखचन्द्रकी दिव्य छविसे अनन्त कोटि चन्द्रमाओंको लजानेवाले हैं। लोकातीत कमलदल- सरीखे मनोहर नयन हैं और कल्पतरुके सुकोमल नवल दलकी मृदुता एवं मनोहरताको प्रहसन करनेवाले अंघ्रि-पल्लव हैं। श्रीव्रजेन्द्रगेहिनी यशुमति अपने मधुरतम ललन श्रीकृष्णको देखकर कल्पना करती हैं, क्या यह श्यामल महोमय परतत्त्व श्याममय प्रकाश- पुंजोंका साम्राज्य है, किंवा रूपरत्नाकरोंकी दिव्यनिधि है, किंवा लावण्यामृतमाणिक्यका परम सौभाग्य है, किंवा तत्तत् अंगावलियोंका सुशोभित सिद्धान्त है। यशोदानन्दन श्रीश्यामसुन्दरके सुमधुर स्वरूपका अनुभव करके भगवद्भक्त कवीन्द्रगण भी कल्पना करते हैं कि श्रीव्रजेन्द्रगेहिनी यशोदाके अंकमें विराजमान