भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० भक्तिसुधा बालकको देखा, जिसके कमलदलके समान लोचन हैं और जो अपनी चार भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए है। उसका शरीर नव-नील- नीरदके समान परम सुभग-सौन्दर्य-सम्पन्न है और उसपर श्रीवत्स-चिह्नयुक्त कौस्तुभमणि तथा पीताम्बर विराज रहा है। परम-तेजोमय किरीट तथा कुण्डलकी दिव्य दीप्तिसे उसके सहस्रों कुन्तल (स्निग्ध सुचिक्कण- दीप्ति श्यामल अलकावली) आलिंगित हैं, उनमें किरीटकी दीप्तिसे ऊर्ध्व और कुण्डलोंकी दीप्तिसे निम्नभागकी अलकावली वैडूर्यमणिकी तरह नाना- छवियुक्त हो रही है। ऐसे तेजोमयी कांची आदिसे अत्यन्त शोभायुक्त बालकको विस्मयसे प्रफुल्ल नेत्रोंद्वारा देखकर श्रीवसुदेवजीने परब्रह्म परमात्माको ही अपने पुत्ररूपमें समझा और उसके जन्मोत्सवमें मनसे ही ब्राह्मणोंके लिये दस सहस्र गौओंका संकल्प कर डाला। फिर उस बालकको अपने दिव्य ब्राह्म-तेजसे सूतिका-भवनको प्रभासित करते हुए, अपने श्रीअंगकी सुभगता, श्यामलता और मधुर दिव्य दीप्तिसे नीलमणि तथा नीलेन्दीवरकोशकी सहज सुभगता और श्यामलता तथा अपरिगणित सूर्य-चन्द्रके सुमधुर दिव्य प्रकाशको लजानेवाला साक्षात् परम पुरुष परमात्मा जानकर वे विनम्र और कृतांजलि तथा प्रभावित होनेके कारण निर्भय होकर स्तुति करने लगे। स्तुति-निवेदन 'हे नाथ! मैंने आपकी मंगलमयी कृपासे ही आपको जाना। आप प्रकृतिपार सर्व-बुद्धि-साक्षी निर्मल-बोध तथा आनन्दरूप साक्षात् परम पुरुष हैं। आप ही पहले अपनी प्रकृतिसे त्रिगुणात्मक प्रपंचका निर्माणकर पश्चात् उसमें अप्रविष्ट होकर भी (क्योंकि सर्वप्रकाशक सर्वाधिष्ठान, व्यापक असंग तत्त्वका प्रवेश नहीं बन सकता) प्रविष्टके समान प्रतीत होते हैं। जैसे महदादि अविकृत भाव विकृत भूतोंके साथ मिलकर विराट्का निर्माण करते हैं और उनमें अनुगतसे प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें अप्रविष्ट ही हैं, हे नाथ! वैसे ही आप सर्वप्रकाशक, सर्वाधिष्ठान, सर्वकारण हैं। आपका विवर्त्तभूत जगत् आपमें ही है और आप स्वरूपसे असंग होते हुए भी तत्तत्प्रपंचोंकी सत्ता और स्फूर्तिरूपसे उनमें प्रविष्ट-से प्रतीत होते हैं। यहाँ तात्पर्य यह है कि कार्यसे प्रथम ही कारण सिद्ध होता है। किं बहुना कारणका ही कार्यरूपमें प्रादुर्भाव होता है। कारणसे भिन्न कार्य कुछ होता ही नहीं, फिर कार्यमें कारणका प्रवेश या परस्पर आधाराधेय भाव कैसे हो सकता है, पर तब भी कुण्डलमें सुवर्ण, पटमें तन्तु—ऐसा व्यवहार होता है। इसलिये अनिर्वचनीय कार्य और कार्यमें कारणका अनिर्वचनीय प्रवेश प्रतीत होता ही है। हे नाथ! आप रूपज्ञानादि साधनोंसे अनुमित इन्द्रियों तथा तद्ग्राह्य रूपादि विषयोंके साथ सत्ता और स्फूर्तिरूपसे विराजमान रहते हुए भी इन्द्रियादिसे अग्राह्य ही रहते हैं। जैसे चक्षुसे रूप-ग्रहणकालमें रूपके साथ विद्यमान भी रस नहीं गृहीत होता; क्योंकि इसके ग्रहणमें चक्षुकी शक्ति नहीं है, वैसे ही विषय तथा इन्द्रियादिमें विद्यमान रहते हुए भी आप इन्द्रियादिसे उपलब्ध नहीं होते; क्योंकि इन्द्रियोंमें सर्वाधिष्ठानभूत आपका प्रकाश करनेका सामर्थ्य नहीं है। परिच्छिन्न पक्षी आदिका नीडमें प्रवेश होता है, आप अपरिच्छिन्न हैं, अतः आपका बाह्य-आभ्यन्तर भाव ही नहीं बन सकता। आप सर्वस्वरूप तथा सर्वात्मा एवं परमार्थवस्तु हैं, आपका प्रवेश कैसे और कहाँ हो सकता है? यदि कोई कहे कि दृश्य-प्रपंचमें आपका प्रवेश हो सकता है सो ठीक नहीं; क्योंकि निर्विकार सच्चिदानन्द भगवान्से भिन्न दृश्य-प्रपंचमें जो सत्यत्व बुद्धि करता है, वह अविवेकी है (हेयादि दृश्य-अनुवाद वाचारम्भणको छोड़कर किसी तरहसे भी विचारसह नहीं है, किंतु तत्त्वकोटिसे अत्यन्त बहिर्भूत अविचारितरमणीय ही है)। हे नाथ! यद्यपि आप निरीह, निर्गुण तथा निर्विकार हैं तथापि तत्त्वज्ञगण सकल प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आपसे ही कहते हैं। आपके मायायुक्त और मायातीतरूपमें ये दोनों बातें विरुद्ध नहीं हैं। अर्थात् आपके मायायुक्तरूपसे अनन्त ब्रह्माण्डके सृष्ट्यादि होते हैं और मायातीतरूपसे आप निरीह निर्गुण भी हैं। वस्तुतः आपके आश्रित रहनेवाली मायाके समस्त