भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णकी बालक्रीडा १९ श्रीकृष्णकी बालक्रीडा वेदान्तवेद्य, परात्पर, पूर्णतम भगवान् अपने परम प्रिय धर्मके संस्थापन तथा गो, विप्र, साधुजनोंकी रक्षाके लिये अपनी दिव्य लीलाशक्तिद्वारा अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्य, सौस्वर्य सुधाजलनिधि मंगलमय विग्रह धारण करके प्रकट होते हैं। भक्तोंको अभय देनेवाले विश्वान्तरात्मा भगवान्का प्रादुर्भाव प्राकृत जीवोंकी तरह नहीं होता, अपितु भौतिक धातुसम्बन्ध बिना ही मनमें उनका प्राकट्य होता है। व्यापक विरज ब्रह्मका धारण सिवा निर्मल अग्र्य मनके और किसी तरह बन ही नहीं सकता। अनन्त, अखण्ड ब्रह्मतेजको ग्रहण तथा धारण करनेसे प्राणीमें तेज, प्रागल्भ्य आदि दिव्य शक्तियाँ स्फुरित होती हैं। अतएव अचिन्त्य भगवान् श्रीवसुदेवजीके मनमें ही प्रविष्ट हुए और मनसे ही देवकीने वसुदेवजीसे श्रीकृष्णको धारण किया— 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥' 'काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१६, १८) जन्मोत्सवका उल्लास सकललोकनायक पुरुषोत्तमका आगमन जानकर समस्त प्रकृति अपने प्रियतम, जीवनधन प्रभुके स्वागतके लिये उतावली हो उठी। परमशोभन समय प्रकट हुआ और शान्त-दिव्य नक्षत्र तथा ग्रह-तारक आ जुटे। समस्त दिशा-विदिशाएँ प्रभु-सम्मिलनकी सम्भावनासे प्रसन्न हो उठीं। निर्मल उडुगणोंसे युक्त गगनके आनन्दकी सीमा न रही। पुर, ग्राम, व्रजसहित माधवी श्रीभूदेवीने सर्वमांगल्यसम्पन्नरूप धारण किया। सरोवर, सरिताओंका जल शीतल, निर्मल तथा सुहावना होकर कमल-कमलिनियोंकी दिव्यश्रीसे सुशोभित हो उठा। भ्रमरवृन्द, मयूर, हंस, सारस, कारण्डव, कोकिल, शुक, तित्तिर, पारावत और अनेक दिव्यवर्ण विहंगमोंके सुमधुर निनादसे उन सरित्-सरोवर तथा वनराजियोंके पुष्पस्तबक पल्लवादि सन्नादित होने लगे और पुष्पगन्धयुक्त सुखद, सुस्पर्श, सुन्दर, शीतल समीर बहने लगा। इतना ही नहीं, दुष्ट दानवोंके अत्याचारसे प्रशान्त अग्नि श्रीभगवान्का आगमन जानकर फिरसे देदीप्यमान हो उठे और आततायियोंके उत्पीड़नसे मुरझाये हुए सत्पुरुषोंके सुमनोरूप सुमनस पुनः प्रफुल्लित हो गये, देवलोकमें भी देवता दुन्दुभि बजाने लगे और ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदि पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। सिद्ध, चारण आदि पवित्र मन्त्रोंसे ब्रह्माण्डनायक प्रभुका स्तवन करने लगे। किन्नर, गन्धर्वगण जगत्पावन गुणोंका गान करने लगे और विद्याधर अप्सराओंके साथ प्रभु-प्रेममें निर्भर होकर नृत्य करने लगे। ऐसे सुयोगमें देवरूपिणी देवकीमें आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र ऐसे प्रकट हुए, जैसे प्राची दिक्में पूर्णचन्द्र। पूर्णिमाको छोड़कर अन्य तिथियोंमें ठीक पूर्वा दिक्का सम्बन्ध न होनेसे चन्द्रमामें पूर्णता नहीं होती। यही कारण है कि श्रीकृष्णचन्द्रके पूर्ण प्रकाशके लिये देवकीदेवीको प्राची दिक् बतलाया गया है— 'देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः। आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥' (श्रीमद्भा० १०।३।८) श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने भी आनन्दवर्द्धन श्रीरामचन्द्रके पूर्णतम रूपमें प्रकट होनेके लिये श्रीकौसल्यामाताको प्राची बतलाया है—'बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची।' (रा०च०मा० १।१६।४) परंतु यहाँ एक बात और है। अलौकिक अद्भुत आनन्द-सुधासिन्धु-समुद्भूत श्रीकृष्णचन्द्र जैसे सकलंक लौकिक चन्द्रसे विलक्षण हैं, वैसे ही निर्मल- विशुद्ध-सत्त्वमयी देवकीरूपा प्राची भी प्राकृत प्राचीसे विलक्षण हैं। फिर जैसे सूर्यकान्तमणिपर ही सूर्यका पूर्णरूपेण प्राकट्य होता है, वैसे वेदान्तमहावाक्यजन्य ब्रह्माकाराकारित परमसत्त्वमयी मानसी वृत्तिपर ही पूर्णतम पुरुषोत्तमका प्राकट्य होता है। अतः यहाँपर वही परम सत्त्वसमूहाधिष्ठात्री महाशक्ति देवरूपिणी श्रीदेवीकी हैं और उनमें पूर्णतम तत्त्वका ही आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्ररूपमें प्राकट्य हुआ है। बालरूपकी झाँकी जन्म होनेपर श्रीवसुदेवजीने एक ऐसे अद्भुत