भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ भक्तिसुधा (श्रीमद्भा० १०।२।९) का यही आशय है कि आकारभेद चतुर्भुज स्वरूपके साथ द्विभुज कृष्णका अवतार होगा और वह आकारभेद द्विभुजाकार नन्दनन्दनमें मिल जायगा। अनन्तर वसुदेवजी योगमायाके प्रभावसे सबके प्रसुप्त हो जानेपर उस बालकको लेकर श्रीनन्दरायके भवनमें पहुँचे और नन्दरानीकी शय्यापर उस बालकको पधराकर वहाँसे कन्याको उठा लाये। ईश्वरता-प्रत्यायक चतुर्भुजरूपसे और उपदेशसे भगवान्ने वसुदेवके यहाँ उत्पन्न होना तो व्यक्त कर दिया, परंतु पुत्रता-सन्देह उत्पन्न किया, अतएव उन्हें अनेकों बार उनकी पुत्रतामें सन्देह होता था। श्रीमन्नन्दरानी और नन्दके यहाँ तो द्विभुजरूपसे और वचनादि शक्तिको व्यक्त करनेसे निःसन्देह पुत्रताको व्यक्त किया। आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-को इन बातोंका कुछ भी अनुसन्धान नहीं हुआ। फिर भी श्रीनन्दकी कन्याको ले जाकर उसे खो दिया, उसके बदलेमें कोई प्रतिदान नहीं दिया। ऐसी स्थितिमें वे छोड़े हुए कृष्णमें अपनापन कैसे मान सकते थे? आगमादिकोंमें भी नन्दनन्दन, नन्दात्मज आदि स्पष्ट पद आते हैं। नन्दरानीके पुत्रदर्शनका उल्लास फिर मायाके उपरत होनेपर नन्दरानीने जागकर प्रत्यक्ष नीलोत्पल-दल-श्याम पुत्रको देखा— ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ बालकका दिव्यातिदिव्य इन्द्रनीलमणिके समान वपु और चन्द्रको जीतनेवाला परम मनोहर मुख था। लोकातीत कमल-दलके सदृश नेत्र और कल्पतरु- नव-पल्लव दलोंके सदृश हाथ थे। हस्त-पादादिको कुछ चलाते हुए वह अपने मृदु, मधुर क्रन्दनसे विश्वको मोहित करता था। 'क्या यह श्यामल प्रकाशोंका साम्राज्य या रूपरत्नाकरोंकी निधि है, लावण्यभागियोंका भाग्य—किंवा तत्तत् अंगावलियोंका विलसित सिद्धान्त है' जबतक नन्दरानी यह विचार कर ही रही थीं, तबतक 'ओमोम्' इस तरह रोदन- व्याजसे बालकने उसकी विकल्पपरम्पराको स्वीकार किया। प्रजात पुत्रको देखकर नन्दरानी सखियोंको भी न बुला सकीं, फिर और चेष्टित होना तो दूर रहा। प्रेमाश्रुओंसे आँखें मिच गयीं, कण्ठ गद्गद हो उठा, वपु स्तब्ध हो उठा, लालनकी लालसासे आत्मा व्यग्र हो उठा। जब माया चली गयी, तब लोगोंका मोह गया। पुरुषोत्तमके प्राकट्यमें व्यवहित नरनारियोंके भी मन वैसे ही विकसित हो उठे, जैसे चन्द्रोदय होते ही व्यवहित कुमुदिनियोंके भी सुमन खिल उठते हैं। वह बालक केवल नन्दरानीकी शय्यापर ही नहीं, अपितु स्निग्धाओंके स्वच्छ चित्तोंमें भी प्रतिबिम्बके समान प्रस्फुरित हुआ, अतः वे शीघ्र ही रोहिणी आदिके संग आकर बालकको वैसे देखने लगीं, जैसे समुदित होते ही चन्द्रको चकोरगण देखते हैं। यशोदा यद्यपि प्रेममें स्तब्ध थीं तथापि स्मेर नेत्रोंसे बालकको देख रही थीं। व्रजपुर-पुरन्ध्रीगण कल्पना करती हैं—क्या यह नवीन इन्दीवर महान् इन्द्रनील है किंवा वैदूर्य है? अहो! यह जो बालकका स्वरूप है, वह मानो मृगमद-सौरभ और तमाल-दलसे बना हुआ है, अद्भुत लावण्यसे अभ्यक्त है, निज देहके तेजसे उद्वर्तित है, निज मुखनिर्गत कान्तिसुधासे स्नात है, सौन्दर्यसे अनुलिप्त है, त्रैलोक्य-लक्ष्मीसे समलंकृत है। चूर्णीभूत तमके समान इसके केश और चन्द्रबिम्बके समान इसका मुख है। मानो सबका मन खींचनेके लिये ही उसने मुट्ठी बाँध रखी है। यमुना-तरंगके समान चरण- कमलको चलाते हुए उस बालकको देखकर सब बहुत ही प्रसन्न हुईं और कहने लगीं—'अहो! इसे सिरपर रखें, नयनमें रखें या हृदय-मध्यमें रखें।' बार- बार उस बालकको देखकर भी नहीं तृप्त होतीं। फिर धैर्यसे किसी तरह उन्होंने स्नानादि कृत्य सम्पादित किया। श्रीमन्नन्दादि गोपोंको कृष्ण-जन्मका समाचार जब प्राप्त हुआ, तब परमानन्दमें सब विभोर हो गये। क्या भारतको वह शुभ दिन देखनेका सौभाग्य पुनः प्राप्त होगा?