भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण-जन्म १७ इसलिये कहा जाता है कि माघ शुक्ल प्रतिपदाकी सर्व-सुखसम्पन्न रजनीमें श्रीव्रजराजकी सेवा करती हुई यशोदाने तन्द्राामें स्वप्नके समान कुछ चमत्कार देखा। जिस कुमारको पहले देखा था, वही किसी सर्वावरणकारिणी दिव्य कुमारीसे अपनेको आवृत करके व्रजराजके हृदयसे निकलकर उनके हृदयमें प्रविष्ट हुए। बालक हृदयमें विराजमान हुआ और कन्या उदरमें और उसी समयसे नन्दरानीमें गर्भ- लक्षण दिखलायी देने लगे। व्रजरानीमें प्रस्फुरित होनेसे ही कृष्णका लोकमें भी वैसे ही स्फुरण हुआ, जैसे स्फटिक-घटीमें रहनेवाला दीपक भीतर- बाहर सर्वत्र प्रकाश करता है— व्रजराज्ञां स्फुरितात्मा कृष्णः स्फुरति स्म लोकेऽपि। दीपः स्फटिकघटी भागन्तर्बहिरपि विभाति तत्तुल्यः ॥ यद्यपि नन्दरानी रसना-रसके जीतनेवाले धैर्यसे युक्त और गाम्भीर्यादि गुणोंमें अत्यन्त प्रवीण थीं, फिर भी कृष्णावेशसे तुलसी-संस्कृत घृत और सितायुक्त स्वच्छ परमान्नरूप दोहदकी उन्हें इच्छा होने लगी। उधर योगमायाने देवकीके सप्तमासिक गर्भको आकर्षित करके रोहिणीमें रख दिया। फिर रोहिणीने श्रावणसे पहले श्रवण नक्षत्रमें गौर सुन्दर कुमारको उत्पन्न किया। जैसे पौर्णमासी पूर्ण चन्द्रको प्रकट करती है, सिंहवधू विक्रमी शावकको उत्पन्न करती है, वैसे ही रोहिणीने बलरामको प्रकट किया। उस बालकके अंगकी कान्ति सूर्यकी कान्तिको लज्जित करती थी, मुखकान्ति चन्द्रमाकी कान्तिको लजानेवाली थी। महाप्रभावशाली वह बालक अन्य समयमें अत्यन्त जड़-सा ही दिखायी देता था, परंतु कृष्णको गर्भमें धारण करनेवाली नन्दरानी जब उसको अपनी गोदमें लेती थी, तभी बालकको विश्रान्ति और प्रसन्नता होती थी। अनन्तर परम शुभ कालमें कृष्णका प्रादुर्भाव हुआ। ललितस्मित नीलकमलके समान मुख, सूक्ष्म भ्रमरसे चित्रित कैरव-कोशके समान नेत्र, मधुर श्यामल तिल-प्रसूनके समान नासिका, सिन्दूर-गिरि- समुद्भूत जवाकुसुम और बिम्बाफलके सदृश ओष्ठ और अधर थे। अंजनभूमि-समुद्भूत श्याम लता-पत्रके समान कान, नवपल्लवयुक्त नव तमाल-शाखाके समान दोनों ही श्रीहस्त, कोमल मृणालतन्तुसदृश रोमोंकी दक्षिणावर्तराजिसे लांछित दक्षिण वक्षःस्थल और सुवर्णवर्ण रोमोंकी वामावर्तराजिसे लांछित वाम वक्षःस्थल विद्युत्से आश्लिष्ट श्यामल मेघ-खण्डके समान सुशोभित होता था। वे बालकृष्ण अपने मुखसे महापद्मको, नयनोंसे पद्मको, नासिकासे मकरको, स्मितसे कुन्दको, कण्ठसे शंखको, चरणपृष्ठोंसे कच्छपको और दीप्तिसे इन्द्रनीलको जीतनेवाले थे। इनका आविर्भाव स्नेहमयी स्फूर्ति-परम्पराके वशीकारसे ही होता है, अन्यथा नहीं। पुत्र-रूपसे आविर्भावमें पितृभावमय स्नेह ही बीज है। जहाँ भी कहीं पुत्रभावसे उनका प्रादुर्भाव होता है, वहाँ तत्सम्बन्धमय स्नेहकी स्फूर्ति ही मुख्य कारण है। व्रजराज आदिमें शुद्ध समुद्बुद्ध वात्सल्य भाव था। श्रीदेवकी-वसुदेवके हृदयमें वही चतुर्भुजरूपसे थे, अतएव बाहर भी वैसे ही प्रकट हुए। श्रीव्रजराज- व्रजरानीके हृदयमें द्विभुज ही स्वरूप था, अतएव बाहर भी उन्हें द्विभुज स्वरूपका ही उपलम्भ हुआ। जिस समय देवकीको कंसके भयसे आविर्भूत चतुर्भुजरूपको आच्छादन करके द्विभुज रूप देखनेकी इच्छा हुई, उस समय श्रीयशोदाके यहाँ प्रकट द्विभुज स्वरूप ही वहाँ प्रकट होकर चतुर्भुज स्वरूपको अपनेमें लीन करके आविर्भूत हुआ। साकाररूप माताके गर्भमें स्थित रहकर भी निराकारतया योगमाया ऊर्ध्व गतिसे द्विभुज कृष्णको देवकीके पास वैसे ही लायी, जैसे गन्धवाह नीलकमल-दलको लाये, वैसे ही सबसे अलक्षित होकर एवं माताको भी मोहित करके आयी और गर्भस्थ आकारसे माताको प्रसूतिक भ्रम पैदा करके अपने-आपको बाहर प्रकट करके शय्यापर स्थित रही। उसीने संकर्षणको हटाकर रोहिणीमें प्रवेश कराया था। 'अथाहमंशभागेन'