भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखनेवालों, भक्तिवालोंको यश देनेवाली यशोदा नाम्नी कन्याको प्रदान किया। पर्जन्यने मध्यम पुत्र नन्दको ही सर्वसम्मतिसे राज्य दिया और सम्पूर्ण भाई मन्त्री आदिका कार्य करते थे। पाँचों भाइयोंमें कोई सन्तति न थी। पुत्रेष्टि यज्ञादि किये गये, अनेक प्रकारकी भगवदाराधना होती रही। एक दिन श्रीमन्नन्दरायने नन्दरानीसे कहा—'मानिनि ! मैं तुम्हारे अंकमें दुग्धोद्गारी पयोधरपर क्रीड़ा करनेवाला श्यामवर्णका चंचल, चारु, दीर्घ नेत्रोंवाला बालक स्पष्ट रूपसे देख रहा हूँ। क्या यह स्वप्न है या जागर ? सहधर्मिणि ! ठीक कहो, क्या तुम्हें भी वैसा ही प्रतीत होता है ? श्यामश्चञ्चलचारुदीर्घनयनो बालस्तवाङ्कस्थले दुग्धोद्गारि पयोधरे स्फुटमसौ क्रीडन् मयालोक्यते। (गोपालचम्पू) नन्दरानीने कहा—'देव ! मेरे भी मनमें ऐसी ही बात आ रही है।' इसके अनन्तर दोनोंने ही अपनी मनोरथपूर्तिके लिये द्वादशी-व्रत प्रारम्भ किया। वर्ष पूर्ण होनेपर समान कालमें ही दोनोंके सामने देवदेवका प्राकट्य हुआ और कहा कि 'अहो ! तुम व्रतसे क्यों खिन्न हो रहे हो ? जो अतसीकुसुमके समान सुषमा- सम्पन्न सुकुमार तुम दोनोंके अनुभवमें आता है, वह तुम्हारे संकल्पका ही फल है।' ऐसा कहकर देव अन्तर्हित हुए। यथासमय दिव्य कालमें, जिस समय जाति (जूही)-के साथ माधवी, केतकीके साथ केतक, अम्बुजोंके साथ कुमुद फूले थे, दिशाएँ प्रसन्न थीं, उसी समय सर्वाश्चर्यनिधि श्रीकृष्णका जन्म हुआ। ललित स्मितसे नील कमलोंके सम्राट्के समान बालकका मुख था। वस्तुतः वह स्वरूप ऐसा विचित्र था कि औरोंकी तो कौन कहे, वह अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्को ही आश्चर्यसिन्धु या विस्मयमें डालनेवाला था— यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भूषणोंको भी विभूषित करनेवाले अंगोंको मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित देखकर कृष्ण स्वयं मुग्ध होकर उससे मिलनेके लिये उत्सुक हो उठते थे— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ कुछ महानुभावोंका कहना है, श्रीभगवान्का सम्बन्ध केवल प्रेम-निबन्धन ही है। तभी कहा है— 'भक्त्याहमेकया ग्राह्यः' (श्रीमद्भा० ११।१४।२१) अर्थात् भगवान् केवल भक्तिसे ही ग्राह्य होते हैं। जो जिस भावसे प्रभुको भजते हैं, प्रभु भी उन्हें वैसे ही प्राप्त होते हैं, अतः श्रीमन्नन्दराय एवं नन्दरानीके भावानुसार प्रभु वात्सल्य-प्रेमानुकूल उनकी पुत्रताको प्राप्त हुए। श्रीवसुदेवजीको भी वात्सल्य- रस प्राप्त था, परंतु सूतिका-गृहमें ही भगवान्के ऐश्वर्यपूर्ण रूपको देखनेसे उनमें वात्सल्य-रसका उतना तारल्य नहीं रह गया था, किंतु श्रीमन्नन्दरायमें सर्वदा समुद्बुद्ध अतएव सर्वदा ही शुद्ध वात्सल्य- रस रह गया था। वसुदेव और देवकीने भगवान्को मनसे ही पुत्रत्वेन धारण किया था, यह बात अग्रिम वचनोंसे ज्ञात होती है। 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१६) अर्थात् अंशभागसे भगवान् आनकदुन्दुभिके मनमें प्रविष्ट हुए। 'दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१८) अर्थात् जैसे पूर्वा दिक् आनन्दकर चन्द्रमाको धारण करती है, वैसे ही देवकीने मनसे ही सर्वान्तरात्मा कृष्णको धारण किया। जैसे वसुदेव-देवकीने मनसे ही कृष्णको धारण किया था, वैसे ही श्रीव्रजराज और व्रजरानीने भी पुत्रत्वेन उन्हें धारण किया था;