भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिसुधा प्रथम खण्ड—श्रीकृष्णलीला-दर्शन श्रीकृष्ण-जन्म श्रीनन्दराय और देवी नन्दरानीजीका परिचय 'श्रीगोपालचम्पू' में श्रीकृष्ण-जन्मका बड़ा सुन्दर वर्णन मिलता है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके बाल्य- सुखके उपभोक्ता श्रीमन्नन्दराय कौन थे? 'गोप' शब्दसे भी उनका व्यवहार होता है। 'सच्छूद्रौ गोपनापितौ' इत्यादि वचनोंके आधारपर कुछ लोग उन्हें शूद्र समझ सकते हैं। वैसे तो भगवान्का जहाँ ही प्राकट्य हो, वही कुल धन्य है, फिर कोई भी क्यों न हो! परंतु 'श्रीगोपालचम्पू' के रचयिताने तो उन्हें क्षत्रियसे वैश्यकन्यामें उत्पन्न, अतएव वैश्य माना है। वृष्णिवंशमें भूषणस्वरूप देवमीढ़ मथुरापुरीमें निवास करते थे। उनकी दो स्त्रियाँ थीं, एक वैश्यकन्या और दूसरी क्षत्रियकन्या। क्षत्रियकन्यासे शूर हुए, जिनके वसुदेवादि हुए और वैश्यकन्यासे पर्जन्य हुए। अनुलोम संकरोंका वही वर्ण होता है, जो माताका होता है। इसी कारण पर्जन्यने वैश्यताको ही स्वीकार किया और गोपालनमें ही विशेष रूपसे प्रवृत्त हुए, जो कि वैश्य- जातिका प्रधान कर्म है, इसीलिये वे गोप भी कहे गये— 'वृष्णिवंशावतंसः श्रीदेवमीढ़नामा परमगुण- धामा मथुरामध्यासयामास। तस्य भार्याद्वयमासीत्। प्रथमा द्वितीयवर्णा द्वितीया तृतीयवर्णा। तयोश्च क्रमेण शूरः पर्जन्य इति पुत्रद्वयं बभूव। शूरस्य वसुदेवादयः समुदयन्ति स्म। श्रीमान् पर्जन्यस्तु 'मातृवर्णवद्दर्णसङ्कर' इति न्यायेन वैश्यतामेवाविश्य गवामेवैश्यं वश्यं चकार।' पर्जन्य बड़े धर्मात्मा और ब्रह्म-हरिपूजनपरायण थे। उनका मातृवंश वैश्य सर्वत्र विस्तीर्ण और प्रशंसनीय था, उनमें भी वैश्यविशेष आभीर वंश था। वैश्यकी पुत्रीमें ब्राह्मणसे उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ' होता है और अम्बष्ठ-कन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न 'आभीर' होता है। यह आभीर वैश्य ही होता है। ऐसे ही वैश्यकुलकी कन्यामें देवमीढ़ क्षत्रियसे उत्पन्न पर्जन्य वैश्य थे। ये ही गोपवंशरूपसे कृष्णलीलामें प्रख्यात हैं, अतएव इससे शूद्र गोप पृथक् हैं। यह तो वैश्य ही गोपालन कर्मसे गोप कहे गये। ब्रह्माने भी आभीरापरपर्याय गोप-कन्याको पत्नीत्वेन स्वीकार करके उसके साथ यज्ञ किया था। अतएव 'भागवत' में भी गर्गजीसे नन्दजीने कहा था कि इन दोनों पुत्रोंका द्विजातिसंस्कार करो—'कुरु द्विजातिसंस्कारम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८।१०) कृष्णने भी 'कृषिवाणिज्य- गोरक्षा कुसीदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥' (श्रीमद्भा० १०।२४।२१) इत्यादिसे अपनेको गोवृत्त वैश्य कहा है। पर्जन्यके उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सनन्द और नन्दन—ये पाँच पुत्र हुए। उनमें भी श्रीमन्नन्दराय सबके ही प्रेमास्पद थे। किसी सुमुख नामक प्रमुख गोपने श्रीमन्नन्दरायको परम धन्या, सुननेवालों,