भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतीत होता है, उनकी उधर उत्कण्ठा या प्रयत्न कुछ नहीं होता। एक दीन-हीन भिक्षुकीको सम्राट्का सम्मिलन असम्भव है, अतः उसे उसकी उत्कण्ठा भी नहीं होती। जीव भी अपनेको कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी और महापापी समझकर तथा भगवान्को अनन्त- ब्रह्माण्डनायक समझकर उनसे अपना मिलना असम्भव समझे तो न उसे सम्मिलनकी उत्कण्ठा होती है और न वह उत्कट प्रयत्न ही करता है। इसीलिये भगवत्सम्मिलनसे वंचित रहता है। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है। भक्ति हुई कि भगवान्का सम्मिलन हुआ। इसीलिये भगवती श्रुति भगवान्की चिदानन्द रसमयी जीव शक्तियोंको भगवत्सम्मिलनकी सुलभता दिखलाती है—‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।’ (श्वेताश्वत० ४।६) तुम दोनों सुपर्ण हो, तुम दोनोंका स्वाभाविक सख्य है, तुम दोनों सदा सम्बन्धित और एक ही स्थानमें रहते हो। तुम भगवान्के हो, भगवान् तुम्हारे हैं। भगवान् तुम्हारे सम्मिलनकी प्रतीक्षामें हैं। तुम श्रद्धा- भक्तिसे एक बार भगवान्के मंगलमय नामका उच्चारण करो, समस्त पाप-तापसे मुक्त होकर भगवत्प्राप्तिके योग्य हो जाओगे। इस तरह चिदानन्दमयी जीव-शक्तियोंको प्रभुमिलनकी सम्भावना, उत्कण्ठा, उत्सुकता होती है। जब कभी सुलभ समझकर असावधानी होने लगती है, तब ‘दूरात्सुदूरे’ कहकर उसकी दुर्लभता भी बतायी जाती है। जप, तप और देवाराधनादिद्वारा जीवशक्तिको शुद्ध जिज्ञासा तथा प्रेप्सा होती है। श्रीव्रजांगनाओंको भी कात्यायनीसमर्चनद्वारा वर प्राप्त करके भगवत्सम्मिलनकी सम्भावना और उत्कट उत्कण्ठा हुई, परंतु फिर भी अभी उत्सुकता और उत्कण्ठाकी अपेक्षा है। इसीलिये भगवान् अभी कुछ अवधिका निर्देश कर रहे हैं। परम बुभुक्षुके सन्मुख जिस समय मधुर मनोहर पक्वान्न उपस्थित हो और उसके सम्मिलनकी सम्भावना हो गयी हो तो फिर उत्सुकताका ठिकाना नहीं रहता। व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णांगसंसृष्ट-वस्त्रद्वारा श्रीकृष्णांग-संस्पर्शका रसास्वाद होनेसे अधिकाधिक आकर्षण हुआ। किसी भी रसका जबतक अनुभव न हो, तबतक उधर आकर्षण नहीं होता। यही स्थिति ब्रह्मरसकी है। श्रीनारदजीको भी जब एक क्षणके लिये भगवत्स्वरूपके माधुर्यका अनुभव हुआ, तब उन्हें एक विचित्र लालसा हुई। ध्यायस्तच्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७) फिर अनेकशः प्रार्थना करनेपर भी भगवान्ने यही कहा कि—‘सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ।’ (श्रीमद्भा० १।६।२३) एक बार तुम्हें स्वरूप-माधुर्यका अनुभव कराया। यह केवल उत्कट कामनाके लिये। उत्कट कामनासे ही प्राणी समस्त पाप-तापोंको नष्ट कर देता है। इसीलिये भावुकोंने कहा है— न वै जनो जातु कथंचनाव्रजे- न्मुकुन्दसेव्यन्वयदङ्ग संसृतिम्। स्मरन्मुकुन्दाङ्घ्र्युपगूहनं पुन- र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः॥ (श्रीमद्भा० १।५।१९) मुकुन्दसेवी औरोंके समान कभी संसृतिमें नहीं पड़ता, किंतु वह मुकुन्दके श्रीचरणका उपगूहन (आलिंगन) करता हुआ, उसके सुस्पर्श सौगन्ध्यामृत रसका आस्वादन करता हुआ उसे कभी छोड़ना नहीं चाहता। अस्तु, श्रीव्रजांगनाओंको श्रीकृष्णके श्रीअंग एवं अमृतमय मुखचन्द्रिकाका दर्शन हुआ। उनके वचनामृत, हास-परिहासका आस्वादन हुआ एवं वस्त्रद्वारा परम्परया श्रीकृष्णांगका संस्पर्श भी हुआ, अतः सर्वात्मना श्रीकृष्णकी ओर उनका आकर्षण हुआ और वरप्राप्तिसे श्रीकृष्णका पूर्ण संस्पर्श हो सकेगा, यह भी सम्भव हो गया।