भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१६२ भक्तिसुधा

श्रीकृष्ण आत्मरति हैं, अतः जबतक व्रजांगना रसात्मक श्रीकृष्णमय न हो जायँ, तबतक वे श्रीकृष्णरमणार्ह नहीं हो सकतीं, श्रीकृष्णांगसंस्पृष्ट वस्त्रोंके संसर्गसे व्रजांगनाओंके प्राकृतभावकी निवृत्ति एवं श्रीकृष्णभावकी प्राप्ति होती है। जैसे अभिव्यक्त अग्निके सम्बन्धसे अनभिव्यक्त अग्निवाले काष्ठमें भी अग्निकी व्यक्ति हो जाती है। अग्नि सर्वत्र व्यापक है, केवल प्राकट्यकी ही विशेषता होती है, उसी भाँति 'रसो वै सः', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिवचनोंके आधारपर यह प्रसिद्ध है कि रसात्मक ब्रह्मस्वरूप ही सब कुछ है। केवल अनाद्यनिर्वचनीयाविद्यामय नामरूपोंद्वारा वह तत्त्व आवृत रहता है। निरावरण रसात्मक ब्रह्म श्रीकृष्णके सम्बन्धसे सभी वस्तुएँ निरावरण रसात्मक श्रीकृष्णमय हो जाती हैं। बस, इस तरह श्रीकृष्णके स्पर्शसे व्रजांगनाओंके वस्त्र नियवरणस्वरूप हो गये, फिर उनके धारणसे व्रजांगनाओंमें भी रसात्मकता आ गयी। लोकमें भी प्रियसंसृष्ट पुष्पमाला, वस्त्र आदिको प्रेमी बड़े अनुरागसे हृदय एवं नयनोंमें लगाते हैं। श्रीकृष्ण-संसृष्ट वस्त्रको धारणकर व्रजांगनाएँ रसाक्रान्त हो उठीं। श्रीकृष्णबल पाकर लज्जा नेत्रोंद्वारा पुनः उनमें प्रविष्ट हुई। श्रीकृष्णने वस्त्र और अपने- आपको तो दे दिया, परंतु उनके मनको चुरा लिया। अतः प्रेष्ठ-संगमके लिये लालायित होकर वे व्रज न जा सकीं। परमानन्द रसात्मक श्रीकृष्णके सम्मिलन, संस्पर्श, सम्भोग तादात्म्यापत्तिके लिये जो न लालायित हो, उसका जीवन सचमुच व्यर्थ है। अस्तु, श्रीकृष्णने उन व्रजकुमारिकाओंके संकल्पको जान लिया कि इन्होंने मेरे ही पादस्पर्शकी कामनासे यह व्रत धारण किया है, फिर तो श्रीकृष्ण भक्त-परतन्त्र होकर गोपीकी प्रेम-रज्जुसे बँधकर दामोदर हो गये। प्रेम- पाशगृहीत होकर बोले—साध्वियो! आपलोगोंके संकल्पको मैंने जान लिया और मैंने उसका अनुमोदन किया, वह सफल होनेयोग्य है। मुझमें जिनके मन और बुद्धि निविष्ट हैं, उनकी कामनाएँ कामना न होकर केवल रसरूप ही होती हैं। जैसे भर्जित एवं क्वथित धानसे अंकुरकी उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही मद्विषयक काम संसारका हेतु नहीं बनता। हाँ! जैसे भर्जित वा क्वथित बीज विशिष्ट स्वादयुक्त होनेसे आस्वादनीय होता है, वैसे ही मद्विषयक काम रसात्मक होनेसे रसिकोंके लिये आस्वादनीय होता है। अस्तु, अब आपलोग व्रज जायें। जिस उद्देश्यसे आपलोगोंने आर्याकी अर्चना की है, वह इन रात्रियोंमें सफल होगी। 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः।' यद्यपि कहा जाता है कि उसी क्षण श्रीव्रजांगनाओंका मनोरथ पूर्ण करना चाहिये था, परंतु गम्भीरतासे विचार करें तो विदित होगा कि पूर्वकथनानुसार आत्मरति भगवान्‌का रमण आत्मामें ही होता है। अतः व्रजांगनाओंमें जबतक पूर्ण रसात्मकता न होगी, तबतक उनमें रमण असम्भव है। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है जबसे प्राणी भगवान्‌का अर्चन-स्मरण आरम्भ करता है, तभीसे प्राणीका प्राकृतभाव नष्ट होने लगता है और भगवत्स्वरूपभूत अप्राकृत रसात्मकता आ जाती है। व्रजकुमारिकाएँ युगोंसे श्रीकृष्णप्राप्तिके लिये तप, जप, ध्यान कर रही थीं। बहुत अंशोंमें उनका प्राकृतत्व नष्ट हो चुका था, अप्राकृत रसरूपता भी उनमें बहुत अंशोंमें आ गयी थी। तथापि अभी वह सब अपूर्ण ही था। भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा और ध्यानमय सम्मिलन-परिरम्भणादिजन्य रसके आस्वादनसे रसमय देहेन्द्रिय, मन और बुद्धिकी पुष्टि होती है। वियोगजन्य दुःखके तीव्र तापसे देहेन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका दाह होता है, परंतु उत्कण्ठा और वियोग भी उस वस्तुमें नहीं होता, जिसका मिलना ही असम्भव है। अति सुलभ पदार्थमें भी उत्कण्ठा नहीं होती और अति दुर्लभमें भी असम्भव बुद्धिसे प्रीतिकी कमी होती है। जिन्हें साम्राज्य आदिका मिलना असम्भव