भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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हैं। इसलिये वे 'साक्षान्मन्मथमन्मथ' हैं। भगवान् जो चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र, मनके मन और प्राणके प्राण कहे गये हैं, उसका क्या रहस्य है? श्रोत्र किसे कहते हैं? जो इन्द्रिय शब्द- प्रकाशनमें समर्थ है, उसका नाम 'श्रोत्र' है। भगवान् उसे शब्द-प्रकाशनका सामर्थ्य प्रदान करते हैं, इसलिये वे श्रोत्रके श्रोत्र हैं। इसी प्रकार वे चक्षुके चक्षु, मनके मन और प्राणके प्राण भी हैं तथा वे ही साक्षात् मन्मथमन्मथ हैं। मन्मथ कामको कहते हैं। नायक- नायिकाके पारस्परिक स्नेहविशेषका नाम 'काम' है। वह एक प्रकारका रस है और भगवान् भी रसस्वरूप हैं; 'रसो वै सः'। (तैत्तिरीय० २।७) भगवान् सम्पूर्ण रसोंके अधिष्ठान हैं; वे निर्विशेष रसस्वरूप हैं तथा संसारमें जितने रस हैं, वे उन रसमयके ही विशेष विकास हैं। सिद्धान्त-दृष्टिसे देखा जाय तो शुद्ध सत् अशेषविशेष-निर्मुक्त परब्रह्म ही है। इसी प्रकार शुद्ध चित् भी वही है। सत् और चित्में भी कोई भेद नहीं है। जिसकी सत्ता होगी, उसका भान भी अवश्य होगा और जिसका भान होगा, उसकी सत्ता भी अवश्य होगी। अतः जो सत् है, वही चित् है और जो चित् है, वही सत् है। जिस प्रकार सच्चित् सम्पूर्ण प्रपंचका कारण है, उसी प्रकार आनन्द भी है। 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) जिस प्रकार सर्वविशेषणनिर्मुक्त सत् ब्रह्म है, उसी प्रकार निर्विशेष आनन्द भी शुद्ध परब्रह्म ही है। वह हेयोपादेयसे रहित है; पुण्य या अपुण्य विशेषणसे युक्त होनेपर ही वह हेयोपादेय होता है। जो आनन्द किसी उत्तम वस्तुको आलम्बन मानकर अभिव्यक्त होता है, उसे प्रेम कहते हैं और जो बन्धनकारी निःकृष्ट पदार्थोंके आलम्बनसे होता है, उसे काम या मोह कहा जाता है। भगवान् विष्णु, शिव एवं गुरुदेव आदि उत्तम आलम्बन हैं। भगवान् तो स्वयं ही रसस्वरूप हैं; उनमें तन्मय हुआ चित्त भी पूर्णतया रसमय हो जाता है। श्रीमद्मधुसूदन स्वामी कहते हैं— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकारो रसतामेति पुष्कलाम्॥ प्रेमीके द्रुत चित्तपर अभिव्यक्त जो प्रेमास्पदा- वच्छिन्न चैतन्य है, वही प्रेम कहलाता है। स्नेहादि एक अग्नि है। जिस प्रकार अग्निका ताप पहुँचनेपर जतु (लाक्षा) पिघल जाता है, उसी प्रकार स्नेहादिरूप अग्निसे भी प्रेमीका अन्तःकरण द्रवीभूत हो जाता है। विष्णु आदि आलम्बन सात्त्विक हैं; इसलिये जिस समय तदवच्छिन्न चैतन्यकी द्रुत चित्तपर अभिव्यक्ति होती है, तब उसे 'प्रेम' कहा जाता है और जब नायिकावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होती है तो उसे 'काम' कहते हैं। प्रेम सुख और पुण्य-स्वरूप है तथा काम दुःख और अपुण्यस्वरूप है। इस प्रकार यदि मूलमें देखें तो सत्का ही रूपान्तर सुख और पुण्य है तथा उसीका रूपान्तर दुःख और अपुण्य है एवं इन सब प्रकारके विशेषणोंसे शून्य जो सत् है, वही परब्रह्म है। ठीक इसी प्रकार जो सर्वविशेषणशून्य रस है, वह भी ब्रह्म ही है, वही 'साक्षान्मन्मथमन्मथ' हैं और वही श्रीकृष्ण हैं। इसीसे कामको वासुदेवका अंश कहा है—'कामस्तु वासुदेवांशः'। यह तो हुआ आध्यात्मिक विवेचन। आधिदैविक दृष्टिसे देखें तो भी भगवान्का रूपमाधुर्य ऐसा मोहक था कि जो काम संसारके प्रत्येक प्राणीको मोहित करनेमें समर्थ है, वही जिस समय अपने दल-बल- सहित भगवान्की परम सुन्दर दिव्य मंगलमयी मूर्तिके सामने आया तो उनका लावण्य देखकर मानो धूलिमें मिल गया। इसीसे उन्हें 'साक्षान्मन्मथमन्मथः' कहा गया है। वस्तुतः श्रीकृष्णचन्द्रके पादारविन्दकी नखमणि-चन्द्रिकाकी एक रश्मिके माधुर्यका अनुभव करके कन्दर्पका दर्प प्रशान्त हो गया और उसे ऐसी दृढ़ भावना हुई कि मैं लाखों जन्म कठिन तपस्या करके श्रीव्रजांगनाभावको प्राप्तकर श्रीकृष्णके पादारविन्दकी नखमणिचन्द्रिकाका यथेष्ट सेवन करूँगा,