भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १९७ फिर साक्षात् श्रीकृष्ण-रसमें निमग्न व्रजांगनाओंके सन्निधानमें कामका क्या प्रभाव रह सकता था ? यह भी एक आदर्श है। जिस प्रकार साधकोंके लिये चित्रलिखित स्त्रीको भी न देखना आदर्श है, उसी प्रकार जो बहुत उच्चकोटिके सिद्ध महात्मा हैं, उनके लिये मानो यह चेतावनी है कि भाई, तुम अभिमान मत करना; जबतक तुम ऐसी परिस्थितिमें भी अविचलित न रह सको, तबतक अपनेको सिद्ध मत मान बैठना। अहो ! जिनके नखमणिकी ज्योत्स्नासे भी अनन्तकोटि कन्दर्पोंका दर्प दलित हो जाता था, उन परम सुन्दरी व्रजसुन्दरियोंको भी जिन्होंने रमाया, उन श्रीहरिके दिव्यातिदिव्य योगका माहात्म्य कहाँतक कहा जा सकता है ? साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि कामुकोंके लिये तो नर-नारायणका आदर्श भी अनुपयुक्त है। उन्हें तो मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामके ही चरणचिह्नोंका अनुसरण करना चाहिये। श्रीनर-नारायणका आदर्श साधकोंके लिये है; उन्हें ऋषभदेवजीके आदर्शका अनुकरण नहीं करना चाहिये; क्योंकि सर्वकर्मसंन्यासका अधिकार सबको नहीं है। उनका आचरण तो परमोत्कृष्ट तत्त्वज्ञोंके लिये ही है। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके दिव्यातिदिव्य आचरणोंका तो यदि कोई मनसे भी अनुकरण करेगा तो पतित हो जायगा, ‘नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः।’ (श्रीमद्भा० १०।३३।३१); क्योंकि वे तो निरतिशय ऐश्वर्यवान् साक्षात् भगवान्की ही अलौकिक लीलाएँ हैं। कोई भी जीव इस स्थितिपर नहीं पहुँच सकता। भला, भगवान्के सिवा ऐसा कौन है, जिसने सम्पूर्ण जगत्को मोहित करनेवाले कामदेवका मानमर्दन किया हो। मदनमोहन तो एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। करना तो दूर, हर किसीको तो इसे सुनना भी नहीं चाहिये; क्योंकि 'छठी भावना रासकी', इसे सुनने- देखनेका अधिकार तो देहाध्याससे ऊपर उठे बिना प्राप्त ही नहीं होता। भगवान्ने जो कहा है कि— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेत्तरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (गीता ३।२१) इसका तात्पर्य यह नहीं है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी आचरणोंका अनुकरण करना चाहिये; बल्कि जो अपनी योग्यताके अनुसार हो, उसीका आचरण करना उचित है। भगवान् शंकर हलाहल विषका पान कर गये थे, इसलिये क्या सभीको विष-पान करना चाहिये ? तैत्तिरीयोपनिषद् (१।११)-में आचार्य अपने शिष्योंसे कहते हैं— 'यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयो- पास्यानि। नो इतराणि।' यह बहुत सम्भव है कि कोई चरित्र महापुरुषोंके लिये उचित हो, किंतु साधारण पुरुषोंके लिये उचित न हो। संन्यासीलोग सन्ध्योपासन नहीं करते, इसलिये क्या गृहस्थोंको भी उसे छोड़ देना चाहिये ? फिर यहाँ तो अलौकिक लीलाकारी भगवान्की बात है, जिसका अनुकरण करना तो दूर रहा, समझना भी महा कठिन है। इस प्रकार भगवान्की यह रासलीला उच्चकोटिके योगारूढ़ोंके लिये ही एक उच्च आदर्श है। इसके श्रवणमात्रसे पुण्य होता है। सो कैसे ?—उत्तरमीमांसामें ब्रह्मकी उपासना कई प्रकारसे बतलायी गयी है। वहाँ कहा है—'सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥' (ब्रह्मसूत्र ३।३) इस सूत्रपर ऐसा विचार हुआ है कि ब्रह्म तो एक ही है, फिर किस प्रकारकी उपासनाको किस उपासनामें समन्वित करना चाहिये ? वहाँ बतलाया गया है कि यद्यपि उपास्य ब्रह्म तो एक ही है तथापि गुणगणके भेदसे उसमें भेद हो जाता है और उपासनाका फल तत्तद्गुणविशिष्ट उपास्यके अनुरूप ही मिलता है। जैसे यदि हमारा उपास्य सत्यकामादि- गुणविशिष्ट ब्रह्म होगा तो वह हमें सत्यकामादिरूप फल देगा और यदि वामनीत्वादिगुण-गणविशिष्ट ब्रह्म होगा तो उसमें हमें वामनीत्वादि फल प्राप्त होगा।