भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

१९८ भक्तिसुधा अब यह प्रश्न होता है कि एक ही ब्रह्मकी अनेकविध उपासना क्यों बतलायी गयी है ? इसका उत्तर यही है कि यह उपास्यका भेद उपासककी योग्यता और कामनाके अनुसार है। यहाँ रासलीलामें उपास्य कामविजयी है, इसलिये इसके द्वारा कामविजयरूप फल प्राप्त होगा। इसीसे यहाँ कहा गया है कि— विक्रीडितं व्रजवधूर्भिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।४०) अर्थात् जो पुरुष श्रद्धासम्पन्न होकर व्रजबालिकाओंके साथ की हुई भगवान् विष्णुकी इस क्रीड़ाका श्रवण या कीर्तन करेगा, वह परम धीर भगवान्‌में पराभक्ति प्राप्त करके शीघ्र ही मानसिक रोगरूप कामसे मुक्त हो जायगा। किंतु यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि कामलीलावर्णन या श्रवण करनेसे कामविजय कैसे होगी ? इसका उत्तर यह है कि यह कामलीला नहीं, बल्कि कामविजयलीला है। इसके श्रवण और कीर्तनद्वारा कामविजयी भगवान् ध्येय होंगे; इसलिये उपासकका चित्त कामविजयी हो जायगा। भगवान् पतंजलि कहते हैं—‘वीतरागविषयं वा चित्तम्॥’ (योगदर्शन १।३६) अर्थात् विरक्त पुरुषोंके विरक्त चित्तका चिन्तन करनेवाला चित्त भी स्थिरता प्राप्त करता है। इसका क्या तात्पर्य है ? यही कि विरक्त पुरुषोंका ध्यान करनेवाले पुरुषोंका चित्त भी क्रमशः उनकी आकृति और भावका आलम्बन करता हुआ विरक्त हो जाता है। इसी प्रकार भगवान्‌की मायाका वर्णन करनेसे उद्धार होना बतलाया गया है; जैसे— मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः। शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययात्मा न मुह्यति॥ (श्रीमद्भा० २।७।५३) इसका कारण यही है कि यहाँ मायाका वर्णन स्वतन्त्र रूपसे नहीं है, अपितु मायाके नियन्तारूपसे ईश्वरका ही वर्णन है। अतः मायाधीश भगवान्‌का चिन्तन होते रहनेसे हम भी मायासे मोहित न होंगे। इसी प्रकार यद्यपि कामवर्णनसे कामकी वृद्धि ही हुआ करती है तथापि यहाँ काम-वर्णनके व्याजसे काम- विजयी भगवान्‌का ही वर्णन होनेके कारण काम- विजयरूप फल ही प्राप्त होगा। रासलीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारीकी योग्यता किंतु इस लीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारी सभी लोग नहीं हो सकते। उनमें कुछ विलक्षणता होनी चाहिये। उनमें भी वर्णन करनेवाला तो बहुत ही विलक्षण होना चाहिये; क्योंकि भगवान्‌की जो दिव्यातिदिव्य लीलाएँ हैं, उनके श्रवण-मननसे अधिकारियोंपर प्रभाव पड़ता ही है। जिस प्रकार वीररसपूर्ण काव्य पढ़नेपर चित्तमें वीरताका संचार होता है तथा करुणरसप्रधान ग्रन्थका अनुशीलन करनेपर चित्त करुणार्द्र हो जाता है, उसी प्रकार इस शृंगाररसप्रधान लीलाके श्रवण या कीर्तनसे चित्तमें शृंगाररसका उद्रेक होना भी स्वाभाविक ही है। हम देखते हैं कि यह जानते हुए भी कि भगवान् श्रीराम साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, उनपर किसी प्रकारकी सम्पत्ति या विपत्तिका कोई अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ सकता। जिस समय उनके वनगमन आदि वर्णन सुनते हैं तो हठात् नेत्रोंमें जल आ ही जाता है। अतः भगवान्‌की इस मधुरातिमधुर लीलाके श्रवण-कीर्तनके मुख्य अधिकारी तो वे ही हैं, जो संसारकी समस्त वासनाओंको जीतकर मनोनिरोधपूर्वक परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर चुके हैं। किंतु यहाँ जो ऐसा कहा है कि 'हृद्रोगमाश्व- पहिनोत्यचिरेण धीरः' इससे यह भी सिद्ध होता है कि कामरूप हृद्रोगके रोगी भी इसका श्रवण कर सकते हैं। परंतु वे कम-से-कम उस हृद्रोगसे मुक्त होनेके पूर्ण इच्छुक तो होने ही चाहिये, विषयी होनेपर तो