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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

१९८ भक्तिसुधा अब यह प्रश्न होता है कि एक ही ब्रह्मकी अनेकविध उपासना क्यों बतलायी गयी है ? इसका उत्तर यही है कि यह उपास्यका भेद उपासककी योग्यता और कामनाके अनुसार है। यहाँ रासलीलामें उपास्य कामविजयी है, इसलिये इसके द्वारा कामविजयरूप फल प्राप्त होगा। इसीसे यहाँ कहा गया है कि— विक्रीडितं व्रजवधूर्भिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।४०) अर्थात् जो पुरुष श्रद्धासम्पन्न होकर व्रजबालिकाओंके साथ की हुई भगवान् विष्णुकी इस क्रीड़ाका श्रवण या कीर्तन करेगा, वह परम धीर भगवान्‌में पराभक्ति प्राप्त करके शीघ्र ही मानसिक रोगरूप कामसे मुक्त हो जायगा। किंतु यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि कामलीलावर्णन या श्रवण करनेसे कामविजय कैसे होगी ? इसका उत्तर यह है कि यह कामलीला नहीं, बल्कि कामविजयलीला है। इसके श्रवण और कीर्तनद्वारा कामविजयी भगवान् ध्येय होंगे; इसलिये उपासकका चित्त कामविजयी हो जायगा। भगवान् पतंजलि कहते हैं—‘वीतरागविषयं वा चित्तम्॥’ (योगदर्शन १।३६) अर्थात् विरक्त पुरुषोंके विरक्त चित्तका चिन्तन करनेवाला चित्त भी स्थिरता प्राप्त करता है। इसका क्या तात्पर्य है ? यही कि विरक्त पुरुषोंका ध्यान करनेवाले पुरुषोंका चित्त भी क्रमशः उनकी आकृति और भावका आलम्बन करता हुआ विरक्त हो जाता है। इसी प्रकार भगवान्‌की मायाका वर्णन करनेसे उद्धार होना बतलाया गया है; जैसे— मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः। शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययात्मा न मुह्यति॥ (श्रीमद्भा० २।७।५३) इसका कारण यही है कि यहाँ मायाका वर्णन स्वतन्त्र रूपसे नहीं है, अपितु मायाके नियन्तारूपसे ईश्वरका ही वर्णन है। अतः मायाधीश भगवान्‌का चिन्तन होते रहनेसे हम भी मायासे मोहित न होंगे। इसी प्रकार यद्यपि कामवर्णनसे कामकी वृद्धि ही हुआ करती है तथापि यहाँ काम-वर्णनके व्याजसे काम- विजयी भगवान्‌का ही वर्णन होनेके कारण काम- विजयरूप फल ही प्राप्त होगा। रासलीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारीकी योग्यता किंतु इस लीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारी सभी लोग नहीं हो सकते। उनमें कुछ विलक्षणता होनी चाहिये। उनमें भी वर्णन करनेवाला तो बहुत ही विलक्षण होना चाहिये; क्योंकि भगवान्‌की जो दिव्यातिदिव्य लीलाएँ हैं, उनके श्रवण-मननसे अधिकारियोंपर प्रभाव पड़ता ही है। जिस प्रकार वीररसपूर्ण काव्य पढ़नेपर चित्तमें वीरताका संचार होता है तथा करुणरसप्रधान ग्रन्थका अनुशीलन करनेपर चित्त करुणार्द्र हो जाता है, उसी प्रकार इस शृंगाररसप्रधान लीलाके श्रवण या कीर्तनसे चित्तमें शृंगाररसका उद्रेक होना भी स्वाभाविक ही है। हम देखते हैं कि यह जानते हुए भी कि भगवान् श्रीराम साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, उनपर किसी प्रकारकी सम्पत्ति या विपत्तिका कोई अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ सकता। जिस समय उनके वनगमन आदि वर्णन सुनते हैं तो हठात् नेत्रोंमें जल आ ही जाता है। अतः भगवान्‌की इस मधुरातिमधुर लीलाके श्रवण-कीर्तनके मुख्य अधिकारी तो वे ही हैं, जो संसारकी समस्त वासनाओंको जीतकर मनोनिरोधपूर्वक परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर चुके हैं। किंतु यहाँ जो ऐसा कहा है कि 'हृद्रोगमाश्व- पहिनोत्यचिरेण धीरः' इससे यह भी सिद्ध होता है कि कामरूप हृद्रोगके रोगी भी इसका श्रवण कर सकते हैं। परंतु वे कम-से-कम उस हृद्रोगसे मुक्त होनेके पूर्ण इच्छुक तो होने ही चाहिये, विषयी होनेपर तो

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उनका उद्धार हो नहीं सकेगा। उन्हें भी इसे ऐसे वक्तासे श्रवण करना चाहिये, जो पूर्ण तत्त्वनिष्ठ हो तथा जो श्रोताके कामभावकी निवृत्ति करनेमें सर्वथा समर्थ हो। तब तो अवश्य इसके द्वारा भगवान्‌के प्रति स्थायी रतिका आविर्भाव होगा और उस भगवद्रतिके कारण कामका कदापि प्रभाव न होगा। पहले यह कहा जा चुका है कि इस प्रकरणके आरम्भमें जो ‘श्रीबादरायणिरुवाच’ है, उसका क्या रहस्य है। किंतु किसी-किसी प्रतिमें इसके स्थानपर ‘श्रीशुक उवाच’ भी है। भगवान् शुककी तत्त्वज्ञता सुप्रसिद्ध है और इधर श्रोता भी सर्वसाधनसम्पन्न कुरुकुल-भूषण महाराज परीक्षित् हैं। यदि ऐसे श्रोता-वक्ता हों तो अवश्य इसका महान् फल हो सकता है। ‘शुक उवाच’ इस वाक्यका एक और भी तात्पर्य हो सकता है। प्रायः शुकतुण्डसे सम्बन्धित होनेपर फलमें और भी अधिक मधुरता आ जाती है। इसीसे कहा है— निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ (श्रीमद्भा० १।१।३) जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद्रूप गौओंका अमृतमय दुग्ध होनेसे ही परम आदरणीय है, उसी प्रकार यह भागवतपुराण भी वेदमूलक होनेके कारण ही प्रमाण है। यह साक्षात् कल्पवृक्षका फल है और वह कल्पवृक्ष भी प्राकृत नहीं, बल्कि स्वयं शब्द- ब्रह्मरूप वेद है और यह उससे तोड़ा हुआ भी नहीं है, इसलिये इसके विषयमें कच्चे या अम्ल होनेकी भी आशंका नहीं की जा सकती। यह तो स्वयं पककर गिरा हुआ है। इसलिये इसमें अत्यन्त मधुरता और सुगन्ध आ गयी है। इसपर भी शुकके मुखका संयोग हो जानेसे तो यह और भी अधिक सरस हो गया है। इसीसे कहा है—‘पिबत’, इसे पिओ। यद्यपि फल खाया जाता है; परंतु इसे तो पीनेके लिये कहा है। इसका तात्पर्य यही है कि अन्य फलोंके समान इसमें गुठली या छिलका आदि कोई हेय अंश नहीं है; क्योंकि यह तो एकमात्र सुमधुर रसस्वरूप ही है। इसलिये इसका पान ही करना चाहिये। कबतक पान करें? ‘आलयम्’ अर्थात् मोक्ष पाकर भी। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ (रा०च०मा० ७।५३।२) इस प्रकार जब शुकतुण्डच्युत श्रीमद्भागवत ही पेय है तो उसके सारातिसारभूत ‘रासपंचाध्यायी’ के विषयमें तो कहना ही क्या है? यही ‘शुक उवाच’ का गूढ़ रहस्य है। इसके सिवा व्रजमें हमने एक और बात भी सुनी थी। वहाँके लोग कहा करते हैं—‘महाराज, महलकी बात माहिलिहि जाने’ अर्थात् महलके भीतर क्या- क्या होता है? इस रहस्यको तो महलके भीतर रहनेवाले ही जान सकते हैं; बाहर जो घास खोदनेवाला है, उसे अन्तःपुरकी बातोंका क्या पता लग सकता है? यह रासक्रीड़ा भगवान्‌की परम अन्तरंग लीला है। इसका मर्म तो वे ही जान सकते हैं, जो श्रीराधारानी और नन्दनन्दनके अत्यन्त कृपापात्र हैं; अन्य निष्ठावाले इसका रहस्य नहीं समझ सकते। इसका वक्ता भी वही हो सकता है, जो परम अन्तरंग हो। अतः यह देखना चाहिये कि इसका वक्ता कौन है? कोई कितना ही आत्मनिष्ठ हो, किंतु यदि वह इस रससे अनभिज्ञ हो तो कम-से-कम रसिकोंकी प्रवृत्ति तो उसके वाक्य-श्रवणमें हो नहीं सकती। अतः यह देखना चाहिये कि इसके वक्ताका रसमें प्रवेश है या नहीं। इसपर वे कहते हैं—‘श्रीशुक उवाच’ यहाँ जो शुक हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनीके क्रीड़ाशुक हैं। जिस समय श्रीनन्दनन्दन उनके पाससे चले जाते थे, उस समय श्रीरासेश्वरीजी इन्हें पढ़ाया करती थीं—‘कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा मति कहु रे’। वे अपने अमृतमय अधरपटसे इनकी चंचुको

२०० भक्तिसुधा चुम्बनकर इन्हें भगवल्लीलाओंका पाठ पढ़ाया करती थीं। भावुकोंका ऐसा कथन है कि भगवान् श्रीकृष्णकी कृपाका पात्र वही होता है, जिसपर श्रीवृषभानुसुताकी कृपा होती है; उनकी कृपा ललितादि प्रधान यूथेश्वरियोंके कृपापात्रोंपर हुआ करती है और ललितादिकी कृपा अपनी नित्यसहचरियोंके कृपापात्र आचार्योंके कृपाभाजनोंपर होती है। फिर जिनका चंचु स्वयं श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधर-सुधासे चुम्बित होता था, उन श्रीशुकके मुखारविन्दसे निःसृत इस लीलाके माधुर्यका तो कहना ही क्या है। अहो! जिनके अधरामृतका संयोग होनेके कारण उनका किया हुआ वेणुनाद सम्पूर्ण चराचर जीवोंको मन्त्रमुग्ध कर देता था, वे रसराजशिरोमणि श्रीमाधव भी जिसके लिये लालायित रहते थे, उस श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधरसुधाकी माधुरीका वर्णन कौन कर सकता है ? फिर उन श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधरसुधासे पोषित परमहंस- शिरोमणि श्रीशुकदेवजीसे अधिक रसिक और कौन होगा ? श्रीवृषभानुनन्दिनीके कलवाक् नामक शुककी कथा आनन्दवृन्दावनचम्पूमें एक बड़ी सुन्दर कथा है कि श्रीवृषभानुनन्दिनीके सन्निधानमें एक कलवाक् नामक शुक रहता था। श्रीरासेश्वरीजी मणिपंजरसे उस शुकको निकालकर अपने श्रीहस्तारविन्दपर बिठलाकर उसे दाड़िमी-बीज खिलाती थीं। एक दिन शुकको दाड़िमी-बीज खिला रही थीं कि दुष्प्राप्य श्रीकृष्णचन्द्रमें उत्कट प्रीति, भूयसी लज्जा, गुरुक्ति-विषवर्षंणोंसे मतिकी विकलता, अपने वपुकी परवशता और कुलीनवंशमें जन्म आदि सोचते- सोचते श्रीश्रीरासेश्वरीके मुखारविन्दसे यह श्लोक निकल पड़ा— दुरापजनवर्त्तिनी रतिरपत्रपा भूयसी गुरुक्तिविषवर्षंणैर्मतिरतीव दौःस्थ्यं गता। वपुः परवशं जनुः परमिदं कुलीनान्वये न जीवति तथापि किं परमदुर्मरोऽयं जनः ॥ शुकने इस श्लोकको धारण कर लिया और श्रीवृषभानुदुलारीके श्रीहस्तकमलसे उड़कर जहाँ श्रीब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण खेल रहे थे, वहीं एक वृक्षकी शाखापर बैठकर 'दुरापजनवर्त्तिनी रतिः' इसी श्लोकको पढ़ा। श्रीकृष्णने शुकके मुखसे विनिःसृत श्लोकको श्रवणकर आश्चर्यसे यह किसी 'महानुरागवती' का शुक है, यह जानकर बड़े मधुर शब्दोंमें शुकसे अपने समीप आनेका अनुरोध किया। शुक शाखापरसे उड़कर श्रीकृष्णके श्रीहस्तकमलपर बैठ गया। श्रीश्यामसुन्दरने पुनः श्लोक पढ़नेको कहा, शुकने फिर उसी श्लोकको सुनाया। अपनी प्रेयसी श्रीवृषभानुदुलारीके प्रिय शुकद्वारा उनकी विरह- व्यथासे समन्वित भावमय श्लोकको धारण करके श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और शुकको धन्यवाद देने लगे। शुकने कहा—श्रीव्रजराजकुमार गाढ़ानुरागके भारसे निर्भरभंगुरा, बड़े स्नेहसे 'श्रीकृष्ण' 'श्रीकृष्ण' इस मधुमय नामको पढ़ाती हुई अपनी स्वामिनीके कराम्बुरुहसे मैं तो चंचलतावश च्युत हो गया हूँ, मुझ अधन्यको आप कैसे धन्य कहते हैं ? गाढानुरागभरनिर्भरभङ्गुरायाः कृष्णोति नाम मधुरं मृदु पाठयन्त्याः। धिङ्मामधन्यमतिचञ्चलजातिदोषा- त्तस्याः कराम्बुरुहकोरकतश्च्युतोऽस्मि ॥ इतनेमें ही श्रीकृष्णका सखा कुसुमासव आ गया। वह भी शुककी वाग्मितापर मुग्ध हुआ। इसी समय वृषभानुनन्दिनीकी सहचरी मधुरिका शुकको ढूँढ़ती हुई वहाँ आयी और कुसुमासवके पूछनेपर कहने लगी कि अपनी स्वामिनीका क्रीड़ाशुक ढूँढ़नेके लिये मैं आयी हूँ। कुसुमासवने झगड़ते हुए कहा कि यह शुक तो हमारे सखा श्रीव्रजराजकुमारका ही है, तुम्हारी स्वामिनीका यह तब समझा जायगा, जब तुम्हारे हाथपर आ जाय। मधुरिकाने हँसते हुए कहा कि कुसुमासव, तुम्हारे सखाके श्रीहस्तकमलके संस्पर्श- सुखका अनुभव करके शुष्क वंशकी वंशी भी संगत्याग नहीं करती, फिर यह चेतन पक्षी श्यामसुन्दरके

श्रीरासलीलारहस्य २०१ श्रीहस्तारविन्दके स्पर्श-सुखको कैसे त्याग सकता है? इसी समय श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीने आकर कहा— ललन, भोजनको देर हो रही है; क्यों नहीं आते? कुसुमासव कहने लगा—अम्बा! देखो, यह मधुरिका व्यर्थ ही झगड़ती है। हमारे सखाके शुकको अपनी स्वामिनीका बतलाती है। मधुरिकाने नन्दरानीको अभिवादन किया। यशोदाने स्नेहसे मधुरिकाका स्पर्श करते हुए कहा—क्यों बेटी, क्या है? मधुरिकाने कहा—देवि, कोई बात नहीं। यह शुक मेरी स्वामिनी वृषभानुकुमारीका है। इसके बिना वे व्याकुल हैं। मैं तो यही कह रही थी। श्रीव्रजेश्वरीने कहा—बेटी, तुम जाओ। कुमारके खेलने जानेपर मैं भेज दूँगी। यह सुनकर मधुरिका प्रणामकर चली गयी। श्रीकृष्ण और कुसुमासव दोनोंने ही प्रसन्न होकर शुकको दाड़िमी- बीज आदि दिव्य पदार्थ खिलाये और फिर कुछ भोजनकर खेलने चले गये। इधर श्रीयशूमतिने अपनी दूतीसे शुकको भेजवा दिया। शुकने अपनी स्वामिनीसे उनके प्रियतमका सब समाचार सुनाया था। अतः यहाँ जो 'श्रीशुक' कहा गया है, उसका तात्पर्य 'श्रियः शुकः' श्रीजीका शुक समझना चाहिये। ये वे श्रीजी हैं, जिनके दिव्यातिदिव्य स्वरूपपर मुग्ध होकर सौन्दर्य-माधुर्य आदि गुणगण सर्वदा उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। 'श्रीयते सर्वैर्गुणैरिति श्रीः' अतः ये शुकदेवजी भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधिकाजीके अत्यन्त स्नेह-भाजन और परम अन्तरंग हैं। हमने ऐसा सुना है कि श्रीराधिकाजी तो उन्हें श्रीकृष्णनामका ही पाठ पढ़ाती थीं, किंतु जब वे चली जातीं तो श्रीश्यामसुन्दर प्रेमपूर्वक अपने मधुमय अधर-रसामृतसे पोषितकर उन्हें 'राधाकृष्ण राधाकृष्ण' ऐसा युगल नामका पाठ पढ़ाया करते थे। उस समय यदि राधिकाजी आ जातीं तो उन्हें बड़ा संकोच होता और वह फिर यही कहतीं—'कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा मति कहु रे'। इससे जान पड़ता है कि वे दोनोंहीके कृपापात्र थे। 'श्री' शब्दका अर्थ भगवान् भी है। 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्या सा श्रीः' अर्थात् जो सम्पूर्ण गुणोंद्वारा आश्रित हैं, वे श्री हैं। अतः वे जैसे श्रीराधिकाजीके लीलाशुक हैं, वैसे ही भगवान्के भी हैं। इसलिये वे इस रहस्यसे खूब अभिज्ञ हैं और उसका वर्णन करनेमें भी पटु हैं; क्योंकि शुककी बोली स्वभावतः ही मधुर होती है। इसीसे किसी प्रतिमें 'श्रीबादरायणिरुवाच' है और किसीमें 'श्रीशुक उवाच' है। जब श्रीशुकदेवजी इस कथाका वर्णन करने लगे तो उन्होंने सोचा कि यह तत्त्व तो परम दुरवगाह्य है; क्योंकि यह भगवत्स्वरूप है, परंतु यह है परम श्रेयस्कर और श्रेयमें बहुत विघ्न हुआ करते हैं, 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि'। तिसपर भी यह तो परम श्रेय है, इसलिये इसमें और भी अधिक विघ्नोंकी सम्भावना है। अतः इसके आरम्भमें कोई ऐसा मंगल करना चाहिये, जो सब प्रकारके विघ्नोंकी निवृत्ति करनेवाला हो। भगवान् मंगलोंके भी मंगल और देवोंके भी देव हैं— 'मङ्गलं मङ्गलानां च देवतानां च दैवतम्।' उनके द्वारा मंगलको भी मंगलत्व प्राप्त होता है तथा सारे संसारका मंगल उस मंगलसिन्धुका एक बिन्दु है। मंगलमें देवताका अनुस्मरण किया जाता है, परंतु वे तो देवताओंके भी देवताका स्मरण करते हैं। इसीसे वे मंगलोंका भी मंगल करते हुए इस प्रकार आरम्भ करते हैं— 'भगवान्' शब्दकी व्याख्या भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) यद्यपि 'भगवान्' शब्दका अर्थ आगे किया जाता है तथापि यह श्रवणमात्रसे मंगलकारक है, इसलिये यहाँ मंगलके लिये भी है। जैसे दूसरे प्रयोजनके लिये लाया हुआ भी जलपूर्ण घट अपने दर्शनमात्रसे यात्रीके लिये मंगलप्रद होता है, उसी प्रकार जिसमें नित्य-ऐश्वर्यका योग हो उसे 'भगवान्' कहते हैं। ऐश्वर्य छः हैं—

२०२ भक्तिसुधा ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७४) अर्थात् समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र ज्ञान और समग्र वैराग्य—इन छः गुणोंका नाम 'भग' है। ये छः जिसमें हों, वही भगवान् है। ये सब-के-सब जीवमें तो अल्प मात्रामें हुआ करते हैं, किंतु भगवान्‌में निरतिशय होते हैं। यहाँ 'भगवान्' शब्दमें जो 'मतुप्' प्रत्यय है, वह नित्ययोग या अतिशयनमें है।* तात्पर्य यह है कि भगवान्‌में जो भग है, वह आगन्तुक नहीं है, बल्कि उनका नित्ययोग है और वह निरतिशय है। अच्छा, यदि भगवान्में नित्य निरतिशय ऐश्वर्य हो भी तो तुम्हें क्या लाभ ? इसपर हमें यही कहना है कि यह हमारे ही काम तो आयेगा और इसका प्रयोजन ही क्या हो सकता है? वस्तुतः भगवान्‌को तो इसकी कोई अपेक्षा है नहीं; क्योंकि वे तो आप्तकाम हैं। ऐश्वर्यका काम क्या होता है? यही न कि वह अपने आश्रयमें महत्त्वातिशय या सौख्यातिशयका आधान करे। जितने गुण हैं उनकी सफलता तभी होती है, जब वे अपने आश्रयमें सौख्यातिशय-महत्त्वातिशयका आधान करें; अतः भगवान्‌का ऐश्वर्य भी यदि उनमें इस प्रकारके किसी अतिशयका आधान नहीं करते तो वे भले ही अप्राकृत हों, व्यर्थ हैं। ये गुणगण शेष हैं और भगवान् उनके शेषी हैं तथा शेष शेषीके लिये हुआ ही करता है। अतः अब यह देखना है कि जिसमें ये गुण हैं, वह निरतिशय है या सातिशय? यदि सातिशय है, तब तो ऐश्वर्यादि गुण उसमें कुछ अतिशयताका आधान कर सकते हैं और यदि निरतिशय ज्ञान और आनन्द ही भगवान्‌का स्वरूप है तो किसी अतिशयताका आधान करनेमें असमर्थ होनेके कारण इन गुणोंका कोई प्रयोजन ही नहीं हो सकता। वेदान्तप्रक्रियाके अनुसार महत्त्वातिशयका भी आधान ब्रह्ममें नहीं हो सकता; क्योंकि ब्रह्म शब्दकी व्युत्पत्ति है 'बृहत्त्वाद्ब्रह्म'—बड़ा होनेके कारण वह ब्रह्म है। बृहत्, अनल्प, भूमा ये सब एक ही अर्थके वाचक हैं। जहाँ कोई संकोचक प्रमाण होता है, वहाँ तो अनल्पत्व सातिशय होता है। जैसे 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः' इस वाक्यके अनुसार समस्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना सम्भव न होनेके कारण 'सर्व' शब्दका संकोच करके केवल समस्त निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भोजन कराना ही समझा जाता है। यहाँ कोई प्रमाण नहीं है, जिससे ब्रह्मका अनल्पत्व सातिशय निश्चय किया जाय। अतः संकोचकप्रमाणका अभाव होनेके कारण यहाँ वही अर्थ करना चाहिये कि जो निरतिशय बृहत् है अर्थात् जिससे बड़ा और कोई नहीं है, वह भूमा ब्रह्म है। जो देश, काल या वस्तुसे परिच्छिन्न हो अर्थात् अन्योन्याभावादि चार प्रकारके अभावोंमेंसे किसीका प्रतियोगी हो, वह अपरिच्छिन्न (निरतिशय) अनल्प नहीं हो सकता। अतः सब प्रकारके परिच्छेदसे रहित सच्चिदानन्द तत्त्व ही ब्रह्म है। ऐसा अपरिच्छिन्न तत्त्व सब प्रकारके बाधका अधिष्ठान होनेके कारण अबाध्य सत् है। यदि वह अबाध्य जड़ हो तो उसके भानके लिये किसी दूसरी वस्तुकी अपेक्षा होगी और ऐसा होनेपर द्वैत होनेके कारण वस्तुपरिच्छेद अनिवार्य होगा। इसके सिवा अभिज्ञोंकी दृष्टिमें जड़ वस्तु निरतिशय बृहत् हो भी नहीं सकती। अतः ब्रह्म सत् और स्वयंप्रकाश है अर्थात् वह अपनेसे भिन्न किसी प्रकाशान्तरकी अपेक्षासे रहित निरपेक्ष प्रकाशस्वरूप है। इस प्रकार अपनेसे भिन्न द्वैतादि उपद्रव-शून्य होनेके कारण वह निरुपद्रुत परमानन्दस्वरूप है और अनन्त भी है। इससे भी ब्रह्मकी निरतिशयता सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये एक ही तत्त्वके नाम बतलाये हैं। 'ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥' (श्रीमद्भा० १।२।११) श्रीश्रीधर स्वामीका भी यही मत है, किंतु कुछ लोगोंका इससे मतभेद है। श्रीजीव

  • भूमिनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने। सम्बन्धेऽस्ति विवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥

श्रीरासलीलारहस्य २०३ गोस्वामीने तत्त्वसन्दर्भका आरम्भ इसी श्लोकसे किया है। उन्होंने ब्रह्मसे परमात्माको और परमात्मासे भगवान्‌को उत्कृष्ट माना है। उनका अभिप्राय कविवर माघके इस श्लोकसे स्फुट होता है— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ अर्थात् दूरसे नारदजी आ रहे थे। पहले तो समझा कि कोई तेजःपुंज आ रहा है; फिर आकृतिका भान होनेपर मालूम हुआ कि कोई शरीरी है। उसके पश्चात् अवयव-विभागकी प्रतीति होनेपर जाना कि कोई पुरुष है और फिर क्रमशः निश्चय हुआ कि नारदजी हैं। अतः श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि जबतक ब्रह्म दूर रहता है, तबतक लोग उसे निर्गुण निर्विशेष समझते हैं। फिर उसका विशेष अनुभव होनेपर उसे परमात्मरूपसे जाना जाता है; किंतु जो उसकी नित्यसन्निधिमें रहते हैं, उन्हें वह अचिन्त्यानन्त- कल्याणगुणगणोपेत जान पड़ता है। इस प्रकार अनुभवके उत्कर्षके साथ उत्तरोत्तर ब्रह्मके निर्विशेष, सविशेष और साकार स्वरूपका साक्षात्कार होता है। यहाँ अपने सिद्धान्तका पोषण करनेके लिये उन्होंने यह भी कहा है कि ये ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् क्रमशः ज्ञानी, योगी और भक्तोंकी अपेक्षासे हैं तथा इनमें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट है, परंतु इससे पूर्व तत्त्वका लक्षण करते हुए यह कहा गया है कि 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।' अर्थात् जो सजातीय-विजातीय स्वगतभेदशून्य अद्वय ज्ञान है, वही तत्त्व है। अतः यह बतलाना चाहिये कि लोग जो विशेषता दिखलाते हैं, वह तत्त्वमें है या केवल नामोंमें ही। यदि तत्त्वमें कोई भेद न हो तो नामान्तर होनेसे ही उसके लक्षणमें क्या अन्तर आ सकता है ? जिस प्रकार यदि घटका यह लक्षण कर दिया कि 'कम्बुग्रीवादिमान् घटः' तो 'कलश' कहनेसे भी उसमें क्या अन्तर आ सकता है ? अतः यदि तत्त्वका लक्षण 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' ऐसा है तो नामके भेदसे उसमें क्या भेद हो सकता है ? कोई लोग 'अद्वय' शब्दका अर्थ उपमारहित करते हैं। अतः उनके मतमें उपमारहित ज्ञान ही अद्वय है, किंतु 'अद्वय' शब्दका ऐसा अर्थ करना किसी प्रकार ठीक नहीं है। अद्वयका अर्थ तो देशकाल- वस्तुपरिच्छेदशून्य ही है 'नेह नानास्ति किञ्चन', (कठ० २।१।११) 'नात्र काचन भिदास्ति' इन वचनोंमें 'नाना' और 'भिदा' के साथ 'किंचन' और 'काचन' शब्दका प्रयोग सर्व प्रकारके नानात्व और भेदका निषेध करता है। अब यदि युक्तिसे विचार किया जाय तो भगवान्‌को अचिन्त्यानन्तकल्याणगुणगणसम्पन्न माननेपर उन गुणोंके कारण उनके शेषीमें कोई उपकार होना भी अवश्य मानना पड़ेगा। यदि आप शेषीको सातिशय मानते हैं, तब तो सिद्धान्तविरुद्ध होगा—ब्रह्मका सातिशयत्व तो किसी भी आस्तिकको मान्य नहीं हो सकता। आप जो कहते हैं कि उत्तरोत्तर सान्निध्यके बढ़नेपर भगवान्‌के उत्तरोत्तर विशेष रूपोंका अनुभव होता है, उन विशेषताओंका यही तात्पर्य है; न कि वे अपने आश्रयमें किसी अतिशयका आधान करें, किंतु यदि परब्रह्म स्वरूपसे ही निरतिशय है तो सान्निध्यसे उसमें क्या अन्तर पड़ेगा? यदि सान्निध्यको केवल उसकी विशेषताओंकी अभिव्यक्तिका कारण मानोगे तो यह बतलाओ कि तुम्हारा वह सान्निध्य क्रियाकृत है या ज्ञानकृत। यदि क्रियाकृत है तो ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आ जायगी और यदि ज्ञानकृत है तो मायावादका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, जो आपको अभीष्ट नहीं है। ब्रह्म निरतिशय बृहत् है। बृहत्ताकी कल्पना करते-करते जहाँ तुम शान्त हो जाओ वह ब्रह्म है और सान्निध्यके द्वारा तुम जिस अतिशयताका आधान करना चाहते हो, उसे तो हम सर्वदेशी मानते हैं। यदि कहो कि जिस प्रकार 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः'— समस्त ब्रह्मणोंको भोजन कराना चाहिये इत्यादि वाक्योंमें समस्त पदसे केवल निमन्त्रित ब्राह्मण ही

ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कुछ संकोच कर लिया जायगा तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ संसारके सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको भोजन कराना अभिप्रेत ही नहीं है: अतः संकोच तो केवल वहीं किया जाता है, जहाँ कोई संकोचक प्रमाण होता है। जो वस्तु देशपरिच्छिन्न, कालपरिच्छिन्न अथवा वस्तुपरिच्छिन्न होती है, उसीमें संकोच किया जाना सम्भव है। निरतिशय वस्तुमें कोई परिच्छेद नहीं होता, इसलिये उसमें संकोच भी नहीं किया जा सकता- 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्य- द्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्य- न्यद्विजानाति तदल्पम्...।' (छान्दोग्य० ७।२४।१) अतः ये 'भग' निरतिशय भगवान्‌में किसी सौख्यातिशय या महत्त्वातिशयका आधान नहीं कर सकते। भगवान्‌में किसी प्रकारके अनर्थकी सम्भावना नहीं, अतः अनर्थ-निवृत्तिमें भी गुणोंका उपयोग नहीं हो सकता। भगवान्‌ने यह ऐश्वर्य भक्तोंके लिये ही धारण किया है। उनकी यह काम-विजयलीला भी भक्तोंके ही लिये थी। इसलिये भगवान् जो अचिन्त्यानन्त-कल्याणगुणगण धारण करते हैं, वे उपासकोंके लिये ही हैं, जिससे कि उनकी उपासनाद्वारा वे उन गुणोंको प्राप्त कर सकें। हमने यह विचार इसीलिये किया है कि जो लोग भगवान्‌को निरतिशय बृहत् आनन्दस्वरूप नहीं मानते, उनके मतमें वह ब्रह्म भी नहीं हो सकता; क्योंकि ब्रह्म, भूमा इन शब्दोंका एक ही अर्थ है। इनका तात्पर्य एक ही वस्तुमें है। अतः भूमा कौन है? 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति' न कोई और देखता है, न सुनता है और न जानता है, जहाँ कोई अन्य है, वह तो अल्प ही है-'यदल्पं तन्मर्त्यम्।' (छान्दोग्य० ७।२४।१)। इसलिये जहाँ भूमा है, वहाँ द्वैत नहीं; क्योंकि द्वैत तो वस्तुकृत परिच्छेदमें ही हो सकता है। इस प्रकार जहाँ द्वैतका अभाव है, वहीं अद्वैत है, इसीसे कहा है- यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत्... केन कं विजानीयाद्० (बृहदारण्यक० ४।५।१५) इत्यादि। अब यदि आप ब्रह्मको अनल्प मानते हैं तो गुणगण कैसे? और यदि गुणगण हैं तो गुणगण और उनके आश्रयका तथा गुणोंका स्वगत भेद है या नहीं? यदि उनमें भेद है तो ब्रह्म परिच्छिन्न सिद्ध होगा और इससे उसका ब्रह्मत्व ही बाधित हो जायगा। यदि कहो कि हम ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌में भेद मानते हैं; हमारे मतमें भगवान् परम अन्तरंग सात्वतोंके प्राप्य हैं; परमात्मा योगियोंके प्राप्तव्य हैं तथा ब्रह्म अत्यन्त बहिरंग ज्ञानियोंका ध्येय है। इसीसे भगवान्‌ने भी योगीको ज्ञानियोंसे भी बड़ा माना है-'ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।' (गीता ६।४६) और भक्तोंको समस्त योगियोंसे उत्कृष्ट माना है। योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ (गीता ६।४७) तो ऐसा माननेसे भी उनकी अल्पता सिद्ध होती है; क्योंकि तीन होनेके कारण उनमें वस्तुकृत परिच्छेद तो है ही। इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं। हम यह तो पहले कह ही चुके हैं कि लक्ष्यका भेद लक्षण-भेदसे होता है, नामसे नहीं होता। जैसा कम्बुग्रीवादि पृथुबुध्नोदरत्वादि लक्षण एक होनेसे घट, कलश-इन नामोंका भेद होते हुए भी वस्तुका भेद नहीं होता, ठीक वैसे ही जब लक्षणमें भेद नहीं है तो ब्रह्म या भगवान् आदि नामोंके भेदसे लक्ष्यका भेद कैसे होगा? यहाँ तत्त्वका लक्षण 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' ऐसा किया है। इसलिये उसमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं हो सकता। अतः आश्रय, जो कि तत्त्व है, अनन्त है, निरतिशय है और अद्वय है; गुणगण उसमें किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं कर सकते। वे तो अपनी सिद्धिके लिये ही

श्रीरासलीलारहस्य २०५ भगवान्‌का आश्रय लिये हुए हैं। भगवान् कहते हैं— 'मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।' (श्रीमद्भा० ११।१३।४०) इस प्रकार गुणोंने यद्यपि अपनी सिद्धिके लिये ही भगवान्‌का आश्रय लिया है और भगवान्‌ने भी उनपर कृपा करके उन्हें स्वीकार कर लिया है तथापि इसका कोई अन्तरंग प्रयोजन भी होना ही चाहिये। वह प्रयोजन यही है कि लोग उन अचिन्त्यगुण- गणविशिष्ट भगवान्‌की आराधना करेंगे और उन्हें उन गुणोंकी प्राप्ति होगी। इसीसे श्रीशुकदेवजीने इस लीलाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये 'भगवान्' शब्दसे मंगलोंका भी मंगल किया है। इसके सिवा उन्होंने यह भी सोचा होगा कि यह लीला अत्यन्त दुरवगाह्य है, हम इसका अवगाहन करनेमें समर्थ नहीं हैं; परंतु भगवान्‌का स्मरण करनेसे हम इस दुरवगाह्यका भी अवगाहन कर सकेंगे। भगवत्स्मरणसे हमें भगवदैश्वर्यकी प्राप्ति होगी और उससे हमें इसके वर्णनका सामर्थ्य प्राप्त होगा तथा लोकमें यह भी देखा जाता है कि वक्ताकी रुक्षताके कारण एक अत्यन्त मधुर-प्रसंग भी रूखा जान पड़ता है और वक्ताके माधुर्यसे ही किसी रूखी बातमें भी सरसता आ जाती है। इसीसे कहा है— 'कवीनां रसविद्धः'। हम पहले कह चुके हैं कि भगवान् शुकदेवजीको स्वयं श्रीवृषभानुदुलारी और भगवान् श्यामसुन्दरने अपनी अधर-सुधाका पान कराकर पढ़ाया था। उस युगलमूर्तिके अधरामृतपानसे उनकी वाणीमें कितना माधुर्य आ गया था, इसका कौन वर्णन कर सकता है? फिर भी प्रसंगको दुरवगाह्य समझकर उन्होंने भगवान्‌का स्मरण किया। इस प्रकार 'भगवान्' शब्दसे यह तो मंगल और वक्ताका तात्पर्य-सूचन हुआ, परंतु 'भगवान्' शब्दका यह अर्थ तो ऐसा है, जैसे किसी अन्य कार्यके लिये लाये हुए जलके घड़ेको देखकर उसे शुभ शकुनका सूचक मानकर देखनेवालेको आनन्द होता है। इसका मुख्य प्रयोजन तो दूसरा ही है। रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या अब हम रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या आरम्भ करते हैं— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) अर्थात् उन रात्रियोंमें शरत्कालीन मल्लिकाको विकसित हुई देखकर भगवान्‌ने भी योगमायाका आश्रय लेकर रमण करनेके लिये मन किया। विचार करनेपर मालूम होता है कि इस श्लोकका तात्पर्य विरोधद्योतनमें है। रमण करनेकी इच्छा तो अनाप्तकामोंको हुआ करती है, किंतु जब भगवान्‌के चरणारविन्दमकरन्दका रसास्वादन करनेवाले तत्त्वज्ञ भी आत्माराम हुआ करते हैं अर्थात् वे भी रमणके लिये आत्मातिरिक्त साधनकी अपेक्षा नहीं करते तो भगवान्‌को रमण करनेकी इच्छा होना तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। यदि भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की तो अवश्य यह बहुत विरुद्ध बात है। रमणकर्ताकी भगवत्ता और भगवान्‌का रमण करना— दोनों ही सर्वथा अनुपपन्न हैं। यदि कहो कि स्वरूपसे तो सभी जीव आप्तकाम हैं—वेदान्त-सिद्धान्तानुसार तो जितना भोक्तृ-भोग्य- वर्ग है, वह सब ब्रह्म ही है; परंतु जीव तो रमण करनेकी इच्छा करता ही है। परमात्मासे विमुख होनेके कारण इसका ऐश्वर्य तिरोहित हो रहा है, भगवदुन्मुख होनेपर उसका ऐश्वर्य अभिव्यक्त हो जाता है। ब्रह्मादि भी तो वस्तुतः जीव ही हैं। अतः यदि भगवान्‌ने भी रमणकी इच्छा की तो क्या आश्चर्य है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उनमें 'भग' है। उनमें समग्र ऐश्वर्य है, समग्र ज्ञान है, समग्र वैराग्य है, और समग्र श्री है। जिनमें ऐश्वर्य एवं ज्ञानादिकी कमी होती है, उन्हींमें वासना होनी सम्भव है, किंतु जिसमें इनकी पूर्णता है, उसमें किसी प्रकारकी वासनाका प्रादुर्भूत होना सम्भव नहीं मालूम

२. द्वितीय तरंग: भाव-भक्ति, प्रेमा-भक्ति एवं भगवद्-रस स्वरूप निरूपण

२०६ भक्तिसुधा होता। इसके सिवा 'भगवान्' का एक दूसरा लक्षण भी है— उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७८) अर्थात् जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति, नाश, आना, जाना तथा ज्ञान और अज्ञानको जानता है, उसे 'भगवान्' कहना चाहिये। अतः जीव और भगवान्में तो बड़ा अन्तर है। इसीसे ऐसा माना गया है कि जीव ब्रह्म तो हो जाता है; परंतु भगवान्* नहीं हो सकता; क्योंकि स्वरूपतः निर्विशेष ब्रह्मसे तो उसका अभेद है ही, किंतु निरतिशय ऐश्वर्य तो केवल ईश्वरमें ही है, यह उसमें नहीं हो सकता। संसारमें दो ईश्वर नहीं हो सकते। अतः भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा क्यों की, यह प्रश्न तो खड़ा ही रहता है। देखो, एक ही पदार्थके लिये पंकज, जलज, अरविन्द एवं कमल आदि कई शब्दोंका प्रयोग होता है। उसके ये नाम गुण-विशेषोंकी अपेक्षासे हैं। जैसे तापापनोदकरूपसे उसे 'जलज' कहेंगे तथा उद्भवस्थानसे वैलक्षण्य प्रदर्शित करना होगा तो पंकज कहेंगे। इसी प्रकार अन्य शब्दोंके प्रयोगके विषयमें समझो। यही बात भ्रमर, मधुप, मधुकर, अलि एवं षट्पद आदि शब्दोंके विषयमें भी कही जा सकती है। ये भी यद्यपि एक ही व्यक्तिके वाचक हैं तथापि 'भ्रमर' शब्दसे उसकी अस्थिरताका द्योतन होता है और 'मधुप' शब्दसे मिष्टप्रियताका। इसी तरह यद्यपि भगवान् ब्रह्म एवं परमात्मा स्वरूपतः तो एक ही हैं; परंतु इन शब्दोंसे उसके विशेष-विशेष पक्षोंका द्योतन होता है। यहाँ 'भगवान्' शब्द अवश्य रमणके साथ विरोध- प्रदर्शनके लिये ही है। 'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'—भगवान्ने भी रमण करनेके लिये मन किया—यह बात उनके औत्सुक्यातिशयका द्योतन करती है अर्थात् भगवान्को रमण करनेकी ऐसी उत्सुकता हुई कि उन्होंने मन बना डाला; वस्तुतः तो वे 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः' ही थे। किंतु रमण तो बिना मनके हो ही नहीं सकता। भगवान्का रमण क्या था? यही न कि अपने सौन्दर्य-माधुर्यको गोपांगनाओंकी इन्द्रियोंसे उपभोग कराना और गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यातिशयको अपनी इन्द्रियोंसे भोगना, परंतु यदि भगवान् सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित हों तो यह भोग कैसे बन सकता है? उसका मुख्य साधन तो मन है। इसीसे गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणोंका समास्वादन करनेके लिये भगवान्ने मन बनाया। यदि कहो कि उन्होंने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही मन बनाया था तो यह ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ 'चक्रे' इस क्रियामें आत्मनेपद है। आत्मनेपद वहीं हुआ करता है, जहाँ क्रियाका फल अपने लिये होता है। जहाँ क्रिया-फल दूसरेके लिये होता है, वहाँ परस्मैपद हुआ करता है। इसलिये यदि भगवान्का यह कर्म भक्तोंके लिये होता तो यहाँ 'चक्रे' के स्थानमें 'चकार' होता। परंतु भगवान्को रमणकी उत्सुकता होना तो सर्वथा असम्भव है; क्योंकि 'भगवान्' तो कहते ही उसे हैं, जिसमें ऐश्वर्य, ज्ञान एवं वैराग्यादिकी निरतिशयता हो। इस प्रकार जिसमें नित्य और निरतिशय ऐश्वर्यादि हैं और जो अपने नित्यस्वरूपमें सर्वथा तृप्त है, उसे ऐसी रमणेच्छा होना तो अनुपपन्न ही है। इस अनुपपत्तिको सूचित करनेके लिये ही यहाँ 'अपि' शब्द दिया है अर्थात् यद्यपि ऐसा करना था तो अयुक्त ही, परंतु ऐसा हो ही गया। इसका अनौचित्य हम भी स्वीकार करते हैं। यह गोपांगनाओंके सौभाग्यातिशयकी ही महिमा है। यदि कहो कि इसका हेतु क्या है तो हमारा यही कथन है कि हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखा ही जाता है कि आत्माराम मुनिजन भी भगवान्की माधुरीपर आकर्षित हो जाया करते हैं। वास्तवमें तो उन्हें भी

  • यहाँ 'भगवान्' शब्द परम ऐश्वर्यशाली परमेश्वरका बोधक है।

कोई कर्तव्य नहीं हुआ करता। ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। न चास्ति किञ्चित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्॥ (श्रीजाबालदर्शनोपनिषद् १।२३) तथापि वे भगवच्चर्चामें लगे ही रहते हैं। उन्हें स्वयं भी इस बातका पता नहीं लगता कि हमारा चित्त उसमें क्यों आसक्त है। बहुत हुआ तो कह देंगे— 'इत्थम्भूतगुणो हरिः' (श्रीमद्भा० १।७।१०)— भाई, भगवान् हैं ही ऐसे गुणवाले, किंतु युक्तियुक्त विचारसे तो यही सिद्ध होता है कि आत्मारामको किसी भी गुणसे आकर्षित नहीं होना चाहिये। यदि कहो कि वे इसलिये भजन-ध्यानमें लगे रहते होंगे, जिससे कोई ग्रन्थि न रह जाय तो ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि वे निर्ग्रन्थ होते हैं—'निर्ग्रन्था अपि।' यद्यपि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि बिना प्रयोजनके कोई भी प्रवृत्ति नहीं होती तथापि इनका कोई प्रयोजन भी नहीं होता। वस्तुतः भगवान्में यह गुण ही है। जिस प्रकार लोहेको आकर्षित करना अयस्कान्तमणिका स्वभाव है, उसी प्रकार भगवान् भी आत्मारामोंके चित्तोंको अपनी ओर खींच लिया करते हैं। अयस्कान्तमणि यद्यपि सभी प्रकारके लोहेको खींच लेती है तथापि जो लोहा जितना निर्दोष होता है, उतना शीघ्र आकृष्ट होता है। इसी प्रकार भगवान् भी तत्त्ववेत्ताओंके निर्मल चित्तोंको अधिक आकर्षित करते हैं। यह भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यका महत्त्वातिशय है। इसी प्रकार यद्यपि भगवान् आप्तकाम हैं, पूर्ण हैं, निरतिशय हैं तथापि यह गोपांगनाओंका प्रेमातिशय ही था कि जिसने भगवान्‌को भी आकर्षित कर लिया, इससे भगवान्‌के माधुर्य एवं सौन्दर्यातिशयकी अपेक्षा भी व्रजांगनाओंके प्रेमातिशयकी उत्कृष्टता सिद्ध होती है। सनकादि और शुकादि भी आत्मरत थे और भगवान् भी आत्मरत हैं; परंतु भगवान्‌की आत्मरतिमें और उनकी आत्मरतिमें अन्तर है; क्योंकि समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य और समग्र ऐश्वर्य तो एकमात्र भगवान्में ही है और किसीमें नहीं है तथापि भगवान्ने तो अपने सौन्दर्यातिशयसे असमग्र ज्ञान-वैराग्यपूर्ण सनकादिको ही मोहित किया, परंतु गोपांगनाओंने अपने प्रेमातिशयसे समग्रज्ञान-वैराग्य- सम्पन्न भगवान्‌को भी मोहित कर लिया। इसीसे यहाँ 'अपि' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'चक्रे' में आत्मनेपद और 'अपि' तथा 'भगवान्' पदका स्वारस्य प्रदर्शित करनेके लिये ही 'ताः रात्रीः वीक्ष्य' ऐसा कहा गया है। 'तत्' पद प्रायः प्रसिद्ध अर्थका द्योतक हुआ करता है। यहाँ 'ताः' ऐसा विशेषण देनेसे मालूम होता है कि वे रात्रियाँ कोई विलक्षण ही थीं। ये वे रात्रियाँ थीं, जिन्हें गोपांगनाओंने 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७)— इस वरदानसे प्राप्त किया था, जिन्हें उन्होंने व्रताचरणद्वारा कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करके और फिर उनकी कृपासे श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रसन्नता प्राप्त करके उनसे वरदानरूपमें प्राप्त किया था। इस प्रकार भगवान् और कात्यायनीदेवी, इन दोनोंकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुई वे रात्रियाँ अवश्य कुछ विलक्षण ही होनी चाहिये थीं। जैसे श्रीकृष्ण-सम्मिलनके लिये व्रजांगनाओंको श्रीकात्यायनीका अर्चन करना पड़ा था, वैसे ही श्रीकृष्णको भी अपनी प्रेयसियोंके मिलनेके लिये महारूद्ररूपा वंशीका आराधन युक्त ही था। श्रीकृष्ण, उस रुद्ररूपा वंशीको अपने अमृतमय मुखचन्द्रमें अधर-पल्लवपर लिटा, अधरसुधाका भोग लगाकर सुकोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। सुन्दर मुकुटका छत्र और कुण्डलोंकी आभासे उसकी आरती करके श्रीकृष्ण रुद्ररूपा वंशीका सांगोपांग आराधन करते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि भगवान्‌की यह लीला कामवश नहीं थी; क्योंकि यदि भगवान् कामुक होते तो इतने दिन पीछेकी रात्रियोंका निर्देश क्यों करते? कामुकोंका तो एक क्षण युगके समान बीता करता है, वे तो दैवकृत कालव्यवधानको भी सहन करनेमें असमर्थ होते हैं, फिर स्वयं अपनी इच्छासे ही एक वर्षकी अवधि बढ़ाना तो उनके लिये सम्भव ही

होता। इसके सिवा 'भगवान्' का एक दूसरा लक्षण भी है— उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७८) अर्थात् जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति, नाश, आना, जाना तथा ज्ञान और अज्ञानको जानता है, उसे 'भगवान्' कहना चाहिये। अतः जीव और भगवान्में तो बड़ा अन्तर है। इसीसे ऐसा माना गया है कि जीव ब्रह्म तो हो जाता है; परंतु भगवान्* नहीं हो सकता; क्योंकि स्वरूपतः निर्विशेष ब्रह्मसे तो उसका अभेद है ही, किंतु निरतिशय ऐश्वर्य तो केवल ईश्वरमें ही है, यह उसमें नहीं हो सकता। संसारमें दो ईश्वर नहीं हो सकते। अतः भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा क्यों की, यह प्रश्न तो खड़ा ही रहता है। देखो, एक ही पदार्थके लिये पंकज, जलज, अरविन्द एवं कमल आदि कई शब्दोंका प्रयोग होता है। उसके ये नाम गुण-विशेषोंकी अपेक्षासे हैं। जैसे तापापनोदकरूपसे उसे 'जलज' कहेंगे तथा उद्भवस्थानसे वैलक्षण्य प्रदर्शित करना होगा तो पंकज कहेंगे। इसी प्रकार अन्य शब्दोंके प्रयोगके विषयमें समझो। यही बात भ्रमर, मधुप, मधुकर, अलि एवं षट्पद आदि शब्दोंके विषयमें भी कही जा सकती है। ये भी यद्यपि एक ही व्यक्तिके वाचक हैं तथापि 'भ्रमर' शब्दसे उसकी अस्थिरताका द्योतन होता है और 'मधुप' शब्दसे मिष्टप्रियताका। इसी तरह यद्यपि भगवान् ब्रह्म एवं परमात्मा स्वरूपतः तो एक ही हैं; परंतु इन शब्दोंसे उसके विशेष-विशेष पक्षोंका द्योतन होता है। यहाँ 'भगवान्' शब्द अवश्य रमणके साथ विरोध- प्रदर्शनके लिये ही है। 'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'— भगवान्ने भी रमण करनेके लिये मन किया—यह बात उनके औत्सुक्यातिशयका द्योतन करती है अर्थात् भगवान्को रमण करनेकी ऐसी उत्सुकता हुई कि उन्होंने मन बना डाला; वस्तुतः तो वे 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः' ही थे। किंतु रमण तो बिना मनके हो ही नहीं सकता। भगवान्का रमण क्या था? यही न कि अपने सौन्दर्य-माधुर्यको गोपांगनाओंकी इन्द्रियोंसे उपभोग कराना और गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यातिशयको अपनी इन्द्रियोंसे भोगना, परंतु यदि भगवान् सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित हों तो यह भोग कैसे बन सकता है? उसका मुख्य साधन तो मन है। इसीसे गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणोंका समास्वादन करनेके लिये भगवान्ने मन बनाया। यदि कहो कि उन्होंने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही मन बनाया था तो यह ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ 'चक्रे' इस क्रियामें आत्मनेपद है। आत्मनेपद वहीं हुआ करता है, जहाँ क्रियाका फल अपने लिये होता है। जहाँ क्रिया-फल दूसरेके लिये होता है, वहाँ परस्मैपद हुआ करता है। इसलिये यदि भगवान्का यह कर्म भक्तोंके लिये होता तो यहाँ 'चक्रे' के स्थानमें 'चकार' होता। परंतु भगवान्को रमणकी उत्सुकता होना तो सर्वथा असम्भव है; क्योंकि 'भगवान्' तो कहते ही उसे हैं, जिसमें ऐश्वर्य, ज्ञान एवं वैराग्यादिकी निरतिशयता हो। इस प्रकार जिसमें नित्य और निरतिशय ऐश्वर्यादि हैं और जो अपने नित्यस्वरूपमें सर्वथा तृप्त है, उसे ऐसी रमणेच्छा होना तो अनुपपन्न ही है। इस अनुपपत्ति को सूचित करनेके लिये ही यहाँ 'अपि' शब्द दिया है अर्थात् यद्यपि ऐसा करना था तो अयुक्त ही, परंतु ऐसा हो ही गया। इसका अनौचित्य हम भी स्वीकार करते हैं। यह गोपांगनाओंके सौभाग्यातिशयकी ही महिमा है। यदि कहो कि इसका हेतु क्या है तो हमारा यही कथन है कि हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखा ही जाता है कि आत्माराम मुनिजन भी भगवान्‌की माधुरीपर आकर्षित हो जाया करते हैं। वास्तवमें तो उन्हें भी


  • यहाँ 'भगवान्' शब्द परम ऐश्वर्यशाली परमेश्वरका बोधक है।

श्रीरासलीलारहस्य २०७ कोई कर्तव्य नहीं हुआ करता। ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। न चास्ति किञ्चित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्॥ (श्रीजाबालदर्शनोपनिषद् १।२३) तथापि वे भगवच्चर्चामें लगे ही रहते हैं। उन्हें स्वयं भी इस बातका पता नहीं लगता कि हमारा चित्त उसमें क्यों आसक्त है। बहुत हुआ तो कह देंगे— ‘इत्थम्भूतगुणो हरिः’ (श्रीमद्भा० १।७।१०)— भाई, भगवान् हैं ही ऐसे गुणवाले, किंतु युक्तियुक्त विचारसे तो यही सिद्ध होता है कि आत्मारामको किसी भी गुणसे आकर्षित नहीं होना चाहिये। यदि कहो कि वे इसलिये भजन-ध्यानमें लगे रहते होंगे, जिससे कोई ग्रन्थि न रह जाय तो ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि वे निर्ग्रन्थ होते हैं—‘निर्ग्रन्था अपि।' यद्यपि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि बिना प्रयोजनके कोई भी प्रवृत्ति नहीं होती तथापि इनका कोई प्रयोजन भी नहीं होता। वस्तुतः भगवान्‌में यह गुण ही है। जिस प्रकार लोहेको आकर्षित करना अयस्कान्तमणिका स्वभाव है, उसी प्रकार भगवान् भी आत्मारामोंके चित्तोंको अपनी ओर खींच लिया करते हैं। अयस्कान्तमणि यद्यपि सभी प्रकारके लोहेको खींच लेती है तथापि जो लोहा जितना निर्दोष होता है, उतना शीघ्र आकृष्ट होता है। इसी प्रकार भगवान् भी तत्त्ववेत्ताओंके निर्मल चित्तोंको अधिक आकर्षित करते हैं। यह भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यका महत्त्वातिशय है। इसी प्रकार यद्यपि भगवान् आप्तकाम हैं, पूर्ण हैं, निरतिशय हैं तथापि यह गोपांगनाओंका प्रेमातिशय ही था कि जिसने भगवान्‌को भी आकर्षित कर लिया, इससे भगवान्‌के माधुर्य एवं सौंदर्यातिशयकी अपेक्षा भी व्रजांगनाओंके प्रेमातिशयकी उत्कृष्टता सिद्ध होती है। सनकादि और शुकादि भी आत्मरत थे और भगवान् भी आत्मरत हैं; परंतु भगवान्‌की आत्मरतिमें और उनकी आत्मरतिमें अन्तर है; क्योंकि समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य और समग्र ऐश्वर्य तो एकमात्र भगवान्‌में ही है और किसीमें नहीं है तथापि भगवान्ने तो अपने सौंदर्यातिशयसे असमग्र ज्ञान-वैराग्यपूर्ण सनकादिको ही मोहित किया, परंतु गोपांगनाओंने अपने प्रेमातिशयसे समग्रज्ञान-वैराग्य- सम्पन्न भगवान्‌को भी मोहित कर लिया। इसीसे यहाँ ‘अपि’ शब्दका प्रयोग किया गया है। ‘चक्रे’ में आत्मनेपद और ‘अपि’ तथा ‘भगवान्’ पदका स्वारस्य प्रदर्शित करनेके लिये ही ‘ताः रात्रीः वीक्ष्य’ ऐसा कहा गया है। ‘तत्’ पद प्रायः प्रसिद्ध अर्थका द्योतक हुआ करता है। यहाँ ‘ताः’ ऐसा विशेषण देनेसे मालूम होता है कि वे रात्रियाँ कोई विलक्षण ही थीं। ये वे रात्रियाँ थीं, जिन्हें गोपांगनाओंने ‘मयेमा रंस्यथ क्षपाः’ (श्रीमद्भा० १०।२२।२७)— इस वरदानसे प्राप्त किया था, जिन्हें उन्होंने व्रताचरणद्वारा कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करके और फिर उनकी कृपासे श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रसन्नता प्राप्त करके उनसे वरदानरूपमें प्राप्त किया था। इस प्रकार भगवान् और कात्यायनीदेवी, इन दोनोंकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुई वे रात्रियाँ अवश्य कुछ विलक्षण ही होनी चाहिये थीं। जैसे श्रीकृष्ण-सम्मिलनके लिये व्रजांगनाओंको श्रीकात्यायनीका अर्चन करना पड़ा था, वैसे ही श्रीकृष्णको भी अपनी प्रेयसियोंके मिलनेके लिये महारूद्ररूपा वंशीका आराधन युक्त ही था। श्रीकृष्ण, उस रूद्ररूपा वंशीको अपने अमृतमय मुखचन्द्रमें अधर-पल्लवपर लिटा, अधरसुधाका भोग लगाकर सुकोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। सुन्दर मुकुटका छत्र और कुण्डलोंकी आभासे उसकी आरती करके श्रीकृष्ण रुद्ररूपा वंशीका सांगोपांग आराधन करते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि भगवान्‌की यह लीला कामवश नहीं थी; क्योंकि यदि भगवान् कामुक होते तो इतने दिन पीछेकी रात्रियोंका निर्देश क्यों करते? कामुकोंका तो एक क्षण युगके समान बीता करता है, वे तो दैवकृत कालव्यवधानको भी सहन करनेमें असमर्थ होते हैं, फिर स्वयं अपनी इच्छासे ही एक वर्षकी अवधि बढ़ाना तो उनके लिये सम्भव ही

कैसे होता ? किंतु भगवान्‌ने ऐसा किया क्यों ? इसका उत्तर यही है कि उनका यह अवधिनिर्देश व्रजांगनाओंकी निष्ठाके परिपाकके लिये था। अभीतक तो उन्हें भगवान्‌की प्राप्ति ही बहुत दुर्लभ जान पड़ती थी; क्योंकि यदि वे भगवान्‌को सुलभ समझतीं तो कात्यायनी-पूजन और व्रतादि तपस्याका कष्ट सहन क्यों करतीं ? तपस्या तो सर्वदा दुर्लभ वस्तुके लिये ही की जाती है और जो वस्तु दुर्लभ होती है, उसके प्रति विशेष प्रेम नहीं हुआ करता। देखो, साधारण मनुष्योंको मोक्ष और साम्राज्यादिकी प्राप्तिके लिये भी इतनी इच्छा नहीं होती, जितनी दस-बीस रुपये और स्त्री- रमणादि प्राकृत भोगोंकी हुआ करती है; क्योंकि वे तो उन्हें अपने सामर्थ्यसे बाहर जान पड़ती हैं। जिस वस्तुके मिलनेकी सम्भावना नहीं होती, उसके लिये उत्कट इच्छा भी नहीं हुआ करती। अतः जबतक उन्हें भगवान् दुर्लभ प्रतीत होते थे, तबतक उनके प्रति उनका उत्कट प्रेम नहीं था और भगवत्प्राप्तिका साधन एकमात्र उत्कट प्रेम ही है। अब, जब भगवान्‌ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया तो उनको भगवद्दर्शनकी योग्यता तो प्राप्त हो गयी थी, परंतु रमणकी योग्यता नहीं थी। रमणकी योग्यता तो तभी होगी जब भगवान्‌को सुलभ समझकर उनके प्रति उत्कट प्रेम हो। अतः भगवान्‌ने उन्हें वही साधन दिया, जिससे कि वे उन्हें सुलभ समझने लगें। भगवान्‌के वर देनेसे उन्हें भगवान्‌की सुलभता अनुभव होने लगी और उन्हें विश्वास हो गया कि अब तो भगवान् अवश्य रमण करेंगे। जब किसी इष्ट वस्तुकी प्राप्तिकी सम्भावना हो जाती है तो उसकी प्रतीक्षा असह्य हो जाया करती है। अतः भगवान्‌के इस वरदानसे उनका प्रेम इतना उत्कट हो गया जितना कि अबतक कभी न हुआ था। इसीलिये भगवान्‌ने एक वर्षका व्यवधान रखा था। इसका एक और भी कारण है। यह सिद्धान्त है कि प्राकृत गुणमय शरीरके साथ रमण करनेकी योग्यता नहीं रखता। इसके लिये अप्राकृत रसमय शरीर होना चाहिये, किंतु इसकी प्राप्ति कैसे होती है ? उसका प्रकार यह है—जिस दिनसे प्राणी करुणासिन्धु श्रीभगवान्‌की कृपाका अनुसन्धान करता है, उसी दिनसे उसका अप्राकृत रसमय शरीर बनना आरम्भ हो जाता है। इसे स्पष्टतया समझनेके लिये एक बातपर ध्यान देना चाहिये। लोकमें यह देखा जाता है कि ग्राह्य-ग्राहक भावोंमें साजात्य रहा करता है। तैजस नेत्रसे तैजस रूपका ज्ञान होता है तथा आकाशीय श्रोत्रसे ही आकाशीय शब्दका ज्ञान होता है। मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका कार्य है, इसीलिये उससे पाँचों भूतोंके गुणोंका ग्रहण हो सकता है। इसी प्रकार यहाँ भी देखना चाहिये। भगवान् प्राकृत हैं या अप्राकृत ? वे तो सत्यज्ञानानन्तानन्दमूर्ति ही हैं। सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) उनके महान् माहात्म्यको समझनेमें तो वेदान्तविद् भी असमर्थ हैं। उनमें प्राकृत भावका लेश भी नहीं है। दीपकलिका क्या है ? वह शुद्ध अग्निमात्र ही तो है। जिस प्रकार बत्ती और तैलको निमित्त बनाकर अग्नि ही दाहकत्व-प्रकाशकत्व विशिष्टरूपमें परिणत हुआ करता है, उसी प्रकार परमान्तरंग अचिन्त्य- दिव्यातिदिव्य लीलाशक्तिको ही निमित्त बनाकर वह शुद्ध परमानन्दघन परब्रह्म ही भगवान् कृष्णरूपमें प्रकट होता है। जिस समय भगवान् ऊखलमें बँध गये थे, उस समय ऐसा कहा गया है—'बबन्ध प्राकृतं यथा'॥ (श्रीमद्भा० १०।९।१४) यहाँ 'प्राकृतं यथा' इस उक्तिका क्या तात्पर्य है? इसका यही रहस्य है कि भगवान् प्राकृत-भिन्न हैं। गीता (४।९)-में भगवान्‌ने कहा है— जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ इस प्रकार जब स्वयं भगवान् ही कह रहे हैं

कि जो पुरुष मेरे दिव्य जन्म-कर्मको जानता है, वह पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता; तो भगवान्‌की अप्राकृतताके विषयमें किसी सन्देहका अवकाश ही कहाँ है? वामनपुराणका वचन है— सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः। हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित्॥ इसी प्रकारकी और भी बहुत-सी उक्तियोंसे सिद्ध होता है कि भगवान्‌का दिव्य मंगल-विग्रह अप्राकृत ही है। जो लोग युक्तिवादसे उसे अनित्य या भौतिक सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, उन्हींसे श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं—'ये तु भगवतो विग्रहं लक्षीकृत्य युक्तिशरानादित्सवस्ते घोरे नरके निपतिष्यन्ति अलं तैः सहा़लापेन।' अर्थात् जो लोग भगवान्‌की दिव्य मंगलमयी मूर्तिको लक्ष्य करके युक्तिरूप बाणोंको ग्रहण करना चाहते हैं, वे घोर नरकमें गिरेंगे, उनके साथ बात करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। ऐसा क्यों है? जिस प्रकार 'परदारान्नाभिगच्छेत्' इत्यादि निषेध वाक्योंका अतिलंघन करनेसे जीव नरकगामी होता है, उसी प्रकार भगवदीय रहस्यके विषयमें कुछ भी वाद-विवाद करनेवाले पुरुषको अवश्य उसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है; क्योंकि भगवान्‌की गति अचिन्त्य है और अचिन्त्य विषयोंके सम्बन्धमें तर्क करना सर्वथा निन्दनीय है—'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।' अतः भगवद्विग्रहके अप्राकृतत्वके विषयमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये। उसमें उसका अनित्यत्व सिद्ध करनेवाले सावयवत्वादि हेतुओंका अभाव है; क्योंकि वह प्राकृतत्व आदि दोषोंसे रहित है। इस क्रमसे देखें तो भगवान् अप्राकृत होनेके कारण नित्य हैं। यदि कहो कि भगवद्विग्रहको अप्राकृत और नित्य माननेपर तो अद्वैतवाद भी सिद्ध न हो सकेगा तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रकृतिकी सत्ता वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार नहीं, बल्कि सांख्यमतसम्मत है। वेदान्तियोंने तो 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' इत्यादि सूत्रोंसे उसका खण्डन किया है। यहाँ सांख्यवादी यह आपत्ति करता है कि 'सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्' इस उक्तिके अनुसार जब कि चेतनको सत्त्वगुणके संसर्गसे ही ज्ञान होता है तो सत्त्वगुणवाली प्रकृतिको भी ज्ञान हो ही सकता है; अतः 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' इस सूत्रके अनुसार भी वही जगत्‌का उपादान कारण होना चाहिये। यदि कहो कि सत्त्वकी अपेक्षासे रहित चेतनमें ही ज्ञान (ईक्षण) होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि यह प्रश्न होता है कि चेतनमें नित्य ज्ञान है या अनित्य? यदि नित्य कहें, तब तो पुरुषकी स्वतन्त्रताका व्याघात होगा। कारण, नित्यवस्तुका कर्ताके अधीन होना असम्भव है और तुम्हारे कथनानुसार ज्ञान चेतन कर्ताके अधीन होना चाहिये; इसके विपरीत यदि उसमें अनित्य ज्ञान माना जाय तो वह सहेतुक ही होना चाहिये। ऐसी अवस्थामें हेतुके सम्बन्धमें भी ऐसा विकल्प होगा कि वह नित्य है या अनित्य। यदि हेतु नित्य है तो उससे नित्य ज्ञान होना चाहिये और यदि अनित्य है तो उसका भी कोई अन्य हेतु होना चाहिये, इससे अनवस्था दोष उपस्थित होगा। इन सब आपत्तियोंका वेदान्ती इस प्रकार उत्तर देते हैं—प्रकृतिमें ज्ञान (ईक्षण) नहीं हो सकता; क्योंकि उसमें जिस प्रकार ज्ञानका हेतु सत्त्वगुण है, उसी प्रकार उसका निरोध करनेवाला तमोगुण भी है। अतः केवल चेतनमें ही ईक्षण हो सकता है; क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप है। इस प्रकार यद्यपि उसमें नित्यज्ञान ही सिद्ध होता है तथापि आगन्तुक विषयके संसर्गसे उसका आगन्तुक होना भी सम्भव है ही। जैसे नित्य प्रकाशस्वरूप सूर्यमें आगन्तुक प्रकाश्यके संसर्गसे सूर्य प्रकाशित करता है, इस प्रकार आगन्तुक प्रकाशनका व्यपदेश होता है। यहाँ जो प्रकाश्य है, वह अनादि और अनिर्वाच्य तत्त्व है। सांख्यवादीकी गुणमयी प्रकृति भी उसीके अन्तर्गत है, परंतु भगवच्छक्ति परम दिव्य और शुद्ध है तथा मूलप्रकृति त्रिगुणमयी एवं जड़ है। देखो, एक वृक्षके बीजमें कितनी शक्तियाँ रहती हैं।

२१० भक्तिसुधा उसमें अति कठोर कण्टकजननकी भी शक्ति है और अत्यन्त मनोज्ञ सौन्दर्य-माधुर्यमय पुष्प उत्पन्न करनेकी भी। इन दोनों प्रकारकी शक्तियोंमें कोई विलक्षणता है या नहीं ? जिस प्रकार इन दोनों शक्तियोंमें महान् अन्तर है, उसी प्रकार सुख-दुःख-मोहात्मक जगत्की उत्पत्ति करनेवाली गुणमयी शक्ति और अति अलौकिक दिव्य मंगलविग्रहको व्यक्त करनेवाली लीलाशक्तिमें भी बहुत बड़ा अन्तर है। यदि उनमें अन्तर नहीं था तो जिन सनकादिको प्रपंचकी कारणभूता कोई भी शक्ति मोहित नहीं कर सकती थी, उन्हें भगवान्‌के चरण-कमलोंसे लगी हुई तुलसीकी दिव्य गन्धने क्यों मोहित कर दिया ? अतः सिद्ध यह हुआ कि दिव्य भगवद्विग्रहको प्रकट करनेवाली लीलाशक्ति परा है और जगदुत्पादिनी गुणमयी शक्ति अपरा है। इससे अद्वैतवादमें भी कोई भेद नहीं आता। जिस प्रकार जलमें तरंगें रहती हैं और उनका जलसे अभेद रहता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें भी पराशक्ति अभिन्नरूपसे रहती है। यह बात शुद्धाद्वैतियोंको भी अभिमत है। जब उनसे पूछते हैं कि भला, शुद्ध ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति कैसे हुई तो वे कहते हैं कि भगवान्‌में एक अघटितघटनापटीयान् आत्मयोग है, उसीसे प्रपंचकी उत्पत्ति होती है। इस बातको सिद्ध करनेके लिये वे श्रीयशोदाजीके इस वाक्यका प्रमाण देते हैं। जिस समय माताको यह दिखानेके लिये कि मैंने मिट्टी नहीं खायी, भगवान्‌ने अपना मुँह खोलकर दिखलाया तो उसमें नन्दरानीको सारा ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। यह देखकर वे बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और सोचने लगीं कि यह क्या भेद है। क्या मुझे ही कोई भ्रम हो गया है, अथवा कोई राक्षसोंका उपद्रव है? ऐसी कोई बात तो है नहीं; अतः मालूम होता है कि यह मेरे इस बालकका ही कोई विलक्षण आत्मयोग है। उस जगह उन्होंने कहा है— 'अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः॥' (श्रीमद्भा० १०।८।४०) यहाँ जो 'यः कश्चन' पद है, वह उस आत्मयोगकी अनिर्वचनीयता द्योतित करनेके लिये है। ठीक यही बात अद्वैतवादी भी मानते हैं। यहाँ 'यः कश्चन' कहनेका क्या तात्पर्य है ? हम पूछते हैं कि यह आत्मयोग भगवान्‌से भिन्न है या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब तो अद्वैत न रहा और यदि अभिन्न है तो भगवान्‌की तरह यह कूटस्थ होगा और कूटस्थ होनेपर प्रपंचोत्पादनमें समर्थ नहीं होगा। इसलिये इसे न भिन्न कह सकते हैं और न अभिन्न ही। अतः वह भगवान्‌से अव्यतिरिक्त होनेपर भी भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य विग्रहके प्रादुर्भावका कारण है। इसलिये इस विषयमें कोई विशेष मतभेद नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्‌ने जो उसी समय रमण करनेकी अनुमति न देकर एक वर्षका व्यवधान किया, उसका यही तात्पर्य था कि वे एक साल मेरी प्रतीक्षामें रहकर रसमय विग्रह प्राप्त करें। भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यादि अप्राकृत हैं; अतः प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें ग्रहण नहीं कर सकतीं। उन्हें ग्रहण करनेके लिये तो अप्राकृत देह और इन्द्रियोंकी आवश्यकता है। किंतु उस अप्राकृत रसमय शरीरकी क्रमशः अभिवृद्धि होती है। प्राणी जितनी ही मात्रामें भगवदनु- सन्धानमें तत्पर होता है, उतनी ही उसके रसमय शरीरकी पुष्टि होती जाती है और प्राकृत शरीरका क्षय होता जाता है। जिस समय वह पूर्णतया भगवन्निष्ठ हो जाता है, उस समय उसे पूर्णतः रसमय शरीरकी प्राप्ति हो जाती है और भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है। कात्यायनी-पूजनसे गोपांगनाओंके रसमय शरीरका आरम्भ तो हुआ, किंतु उसकी ठीक पूर्णता नहीं हुई थी। इसीलिये भगवान्‌ने ऐसा नियम किया। जिस समय इष्ट वस्तु सुलभ मालूम होने लगती है, उसी समय उसकी प्राप्तिकी उत्सुकता बढ़ती है। कात्यायनी-पूजनके समय गोपांगनाओंको भगवान् सुलभ नहीं जान पड़ते थे; इसीसे उनके प्रति उनका उत्कट प्रेम भी नहीं था। यह नियम है कि पहले जिस वस्तुका संयोग

होता है, उसीके वियोगमें दुःख हुआ करता है। बिना संयोगके तो प्रेम ही नहीं होता, फिर उसके अभावमें दुःख ही क्या होगा ? मनुष्यका जितना जिसके प्रति अधिक प्रेम होगा, उतना ही उसके वियोगमें दुःख होगा— यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान्। तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकंशङ्कवः॥ (श्रीविष्णुपुराण १।१७।६६) अतः जब गोपांगनाओंको भगवान्के श्रीअंगसे संस्पृष्ट वस्त्रद्वारा भगवान्का संयोग हो गया तो उसीने वियोग होनेपर उनके हृदयमें विरहाग्नि प्रज्वलित कर दी। वे जब कभी भगवान्की झाँकी करती थीं तो उनके हृदयमें परमानन्दकी बाढ़ आ जाती थी और उनके आँखोंसे ओझल होते ही विरहानल धधक उठता था। गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) जिस प्रकार सुवर्णादिके शोधनके लिये अग्निसंयोगकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गोपांगनाओंका रसमय शरीर भी तभी पुष्ट होगा, जब वह भगवद्विरहाग्निमें सन्तप्त हो लेगा। इसीसे जबसे भगवान्ने यह वर दिया कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तबसे उनके प्रति उनका जो प्रेमातिशय हुआ, उसके कारण उनकी वियोगाग्निसे उनका रसमय शरीर पुष्ट होने लगा तथा उनका जो प्राकृत शरीर था, वह उस वियोगकृत सन्तापसे दग्ध हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें वे पूर्णतया परिपक्व हो गयीं। किंतु सभी गोपांगनाएँ एक-सी अधिकारिणी नहीं थीं। उनमें जो भगवान्की आह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरी ललिता- विशाखा आदि हैं, वे तो नित्य-सिद्धा हैं। वे तो भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार अमृतमय समुद्रमें माधुर्य होता है, उसी प्रकार भगवान्के साथ उनका अभेद ही है। यह बात श्रुतिरूपा मुनिचरी और देवकन्या आदि अन्य गोपांगनाओंके विषयमें समझनी चाहिये, जो कि साधनसिद्धा थीं। वे ही इस प्रकार भगवद्विप्रयोगरूप अग्निसे रसमय शरीरका सम्पादन करती थीं। नित्यसिद्धा तो केवल लोक-संग्रहके लिये ही ऐसा करती थीं। उन्हें स्वयं इसकी कोई अपेक्षा नहीं थी। उनमें भी कोई-कोई गोपांगनाएँ ऐसी थीं, जो सालभरमें सिद्धा नहीं हुईं; उन्हींके विषयमें ऐसा कहा गया है— अन्तर्गृहगताः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।९-१०) जिस समय भगवान्ने अपनी मधुमय वेणुका वादन किया, उस समय उस वेणुनादरूप उद्दीपन- विभावद्वारा जब रससिन्धु भगवान् कृष्ण उन व्रजांगनाओंके अन्तःकरणोंमें प्रस्फुरित हुए तो उनका मनोमल सर्वथा नष्ट हो गया और उन्हें भगवान्के वियोगमें एक-एक पल असह्य हो गया, किंतु उस समय उनके पतियोंने उन्हें घरमें बन्द कर दिया था। इससे उनके हृदयमें जो सन्ताप हुआ, उसे देखकर संसारके सारे अशुभ काँप उठे; उन सबने मिलकर भी किसीको उतना कष्ट पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। किंतु साथ ही उन्होंने जो ध्यानयोगद्वारा भगवान्का एक क्षणके लिये आश्लेष किया, उससे उनके हृदयमें जो परमानन्दका उद्रेक हुआ, उसे देखकर भी अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत प्राणियोंके समस्त पुण्यार्जित सुख क्षीण हो गये। उन्होंने किसीको इतना सुख पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। इस प्रकार जिन गोपांगनाओंके अप्राकृत रसमय शरीरकी पुष्टि अभी नहीं हुई थी, वह अब हो गयी। भगवान्के विप्रयोगजनित सन्तापसे उनका गुणमय शरीर दग्ध हो गया, इसीसे कहा है—'जहुर्गुणमयं देहम्'। (श्रीमद्भा० १०।२९।११)

इससे सिद्ध हुआ कि गुणमय शरीरका त्याग किये बिना भगवदाश्लेष प्राप्त नहीं हो सकता। यही वेदान्तका भी सिद्धान्त है। वहाँ भी गुणमय शरीरमें अनासक्त होनेपर ही ब्रह्मसंस्पर्शकी प्राप्ति होती है और उसीसे परमानन्दका अनुभव होता है। श्रीमद्भगवद्गीता (५।२१)-का वचन है- बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ पुरुषका ब्रह्म-संस्पर्श प्राप्त करना क्या है? जिस समय श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा जीव अन्नमयादि कोशोंसे मुक्त होकर स्वरूपस्थ होता है, उसी समय उसे ब्रह्मके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव होता है। इसीलिये महावाक्यके तात्पर्यार्थमें 'तत्' और 'त्वम्' पदका लक्ष्यार्थ लिया जाता है, वाच्यार्थ नहीं लिया जाता। यदि अवच्छेदवादकी दृष्टिसे देखें तो उपाधिपरिच्छिन्न चेतन ही जीव है और उपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म है तथा उपाधिके रहते हुए उनकी एकताका अनुभव नहीं हो सकता। प्रतिबिम्बवादमें भी जलमें प्रतिबिम्बित आकाशके समान बुद्धिरूप उपाधिमें प्रतिबिम्बित चेतन ही जीव है। उसका महाकाशरूप ब्रह्मसे जलरूप उपाधिके कारण ही भेद है और उपाधिकी निवृत्ति होते ही दोनोंकी एकता हो जाती है। इस प्रकार उपाधिकृत परिच्छिन्नता आदि दोषोंका आरोप करनेसे ही एक अनन्त पूर्ण तत्त्व दोषवान्-सा प्रतीत होता है। इसीसे कहा है- एकमपि सन्तमनकमिव मन्यते। अतः जबतक जीव गुणमय शरीरसे संसक्त है, तबतक वह ब्रह्म-संस्पर्शका अधिकारी कभी नहीं हो सकता। जिसने उपाधिका बाध करके त्वंपदार्थका शोधन कर लिया है, वही तत्पदार्थसे अपना अभेद अनुभव करनेमें समर्थ हो सकता है। इसी प्रकार यहाँ गोपांगनाओंको भी अपने प्राकृत शरीरका अपनोदनकर शुद्ध रसमय शरीर प्राप्त करनेके लिये भगवान्ने एक वर्षका व्यवधान रखा।

उस समय भगवान्ने जो कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) अर्थात् तुम इन्हीं रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करोगी-इसमें भी एक संदेह होता है। वह यह कि चीरहरण-लीला तो दिनके समय हुई थी और 'इमाः' (इन) शब्द प्रस्तुत अर्थका द्योतक है; फिर भगवान्ने 'इमाः क्षपाः' इन रात्रियोंमें ऐसा निर्देश कैसे किया? यदि कहो कि वे रात्रियाँ भगवान्की बुद्धिमें स्थित थीं, इसलिये यह उक्ति अयुक्त नहीं है तो ठीक है, परंतु गोपियोंको तो इनका प्रत्यक्ष नहीं था। इससे मालूम होता है कि गोपियोंको वर देनेकी इच्छा करनेपर भगवान्की सत्यसंकल्पता शक्तिसे प्रेरित योगमायाने इन रात्रियोंको भगवान्के सामने उपस्थित कर दिया था। जैसे यदि कोई सम्राट् किसीको कोई वस्तु देना चाहता है तो उसका भाव समझनेवाले सेवकगण उस वस्तुको लाकर सामने उपस्थित कर देते हैं। इसके सिवा एक शंका यह भी होती है कि रासलीला तो केवल एक रात्रिमें ही हुई थी, फिर यह तथा चीरहरण-लीलाके अनन्तर वर-प्रदान करते समय भी बहुवचन 'इमाः'-का प्रयोग क्यों किया गया? उत्तर-भगवान् अनन्त-गुणमय हैं, उनके अचिन्त्य और अनन्त गुणोंका आस्वादन अल्प कालमें नहीं हो सकता। व्रजांगनाओंने भी किसी क्षुद्र फलके लिये कात्यायनी-पूजन आदि कठोर तपस्याका अनुष्ठान नहीं किया था। अतः यदि उन्हें थोड़े समयके लिये ही भगवत्सुखास्वादनका अवसर प्राप्त होता तो यह उनकी तपस्याका पूरा फल हुआ न समझा जाता। भगवान्के स्वरूप-रसास्वादनके विषयमें ही श्रीवृषभानुनन्दिनीका कथन था कि अरी सखियो! भगवान्के समग्र सौन्दर्य-माधुर्य-रसास्वादनकी बात तो दूर है, यदि हमें उसके एक कणका भी आस्वादन करना हो तो हमारे प्रत्येक रोममें कोटि-कोटि नेत्र होनेपर भी हम उसका सम्यक् आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं। जिस समय ये नेत्र भगवान्के एक अंगके

श्रीरासलीलारहस्य २१३ दर्शनमें लग जायँगे, उस समय इनका सामर्थ्य नहीं कि वहाँसे आगे बढ़ सकें। इस विषयमें ऐसी ही बात अन्यत्र कही गयी है। जिस समय भगवान् रामचन्द्रका विवाहोत्सव हुआ, उस समय उस अपूर्व शोभाको निहारनेके लिये ब्रह्मा, शिव, षडानन एवं इन्द्रादि सभी देवगण वहाँ उपस्थित हो गये। भगवान्‌का वरवेश देखकर वे अपनेको अत्यन्त बड़भागी मानने लगे। उस रूप-माधुरीका पान करनेके लिये उन्हें अपने नेत्र पर्याप्त न जान पड़े; उस समय जिसके जितने अधिक नेत्र थे, उसने अपनेको उतना ही अधिक भाग्यशाली समझा। ब्रह्मादि सभी देवताओंकी अपेक्षा अधिक नेत्र होनेके कारण देवराज इन्द्रको सबसे अधिक आनन्द हुआ और उन्होंने गौतमऋषिके शापको, जिसके कारण उन्हें सहस्र भग प्राप्त हुए थे और जो बादमें मुनिके प्रसन्न होनेपर सहस्र नेत्र हो गये थे, अपने लिये परम हितकर माना। उनकी मनोवृत्तिको व्यक्त करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराजने कहा है— रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ (रा०च०मा० १।३१७।६) यह बात तो इन्द्रादि देवताओंकी है, परंतु गोपांगनाएँ तो प्रेममार्गकी आचार्या हैं, उनमें भी श्रीराधिकाजी तो साक्षात् भगवान्‌की आह्लादिनीशक्ति हैं, उनके प्रेमकी तुलना देवताओंके साथ क्या की जा सकती है? इसीसे इन्द्रादि तो भगवान्‌की रूपमाधुरीका अधिक-से-अधिक सहस्र नेत्रोंसे ही पान करके तृप्त हो गये, किंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो कहती हैं कि हमारे प्रत्येक रोमकूपमें कोटि-कोटि नेत्र हों, तब भी हम श्रीश्यामसुन्दरके सौन्दर्यके एक कणका भी यथेष्ट रसास्वादन नहीं कर सकतीं। भला, प्रेममें कभी तृप्ति होती है? यह नियम है कि वस्तु चाहे एक ही हो; किंतु उसका जो जितना अधिक रसज्ञ होगा, उसे वह उतनी ही अधिक सरस प्रतीत होगी। अरसिकोंको रसमय पदार्थ भी उतना सरस प्रतीत नहीं होता। देखो, ब्रह्म सर्वत्र ही है तथापि उसके परमानन्दकी सबको समान अनुभूति नहीं होती। उसकी स्फुट प्रतीति तो भावुक भक्तगण तथा आत्माराम मुनिजनको ही होती है। एक चित्रकारने एक चित्र तैयार किया और उसे वह किसी राजाके यहाँ ले गया, परंतु राजाने उसका कोई विशेष रहस्य नहीं समझा; केवल उदासीन भावसे उसका १०,००० रुपये मूल्य देनेको कहा, किंतु चित्रकारने इस मूल्यमें चित्र देना स्वीकार न किया। जिस समय वह उसे लौटाकर ले जा रहा था, बीचमें उसे एक राजसेवक मिला। उसने आग्रहपूर्वक वह चित्र दिखानेको कहा। जब चित्रकारने उसे खोलकर दिखलाया तो वह राजसेवक उसका हस्तकौशल देखकर दंग रह गया, किंतु उसके पास उस चित्रको मोल लेनेयोग्य द्रव्य नहीं था। उस समय वह केवल एक धोती बाँधे हुए था। उसने उसमेंसे लँगोटीभर फाड़कर वह धोती उस चित्रकारको दे दी। चित्रकारने भी उस धोतीके बदलेमें ही वह चित्र उसे दे दिया। धीरे-धीरे यह समाचार राजाके कानोंतक पहुँचा। राजाने उसे बुलाकर पूछा कि तुमने जो चित्र हमें १०,००० रुपयेमें भी नहीं दिया, वही हमारे एक साधारण सेवकको केवल उसकी धोती लेकर ही कैसे दे दिया? तब चित्रकारने कहा—राजन्! आपने उसका महत्त्व नहीं समझा था; इसलिये आप जो कुछ देते थे, वह भी इसका पर्याप्त मूल्य नहीं था; किंतु आपके सेवकने उसका महत्त्व जाना और जो कुछ अधिक-से-अधिक वह दे सकता था, वही दे भी दिया। इसलिये मैंने आपके १०,००० रुपयेकी अपेक्षा भी उसकी धोतीका अधिक मूल्य समझा था। एक दिन हमने भी एक चित्र देखा था। उसमें बिल्कुल एक ही रूपकी दो स्त्रियाँ बनायी गयी थीं। उन दोनोंके आकार-प्रकार एवं वेश-भूषामें कोई भी अन्तर नहीं था। दोनों ही आमने-सामने शोकमुद्रामें बैठी थीं। उस चित्रको देखकर समझमें नहीं आता था कि इसका क्या रहस्य है। बहुत विचार करनेपर मालूम हुआ कि इसका प्रसंग इस प्रकार है—एक

दिन श्रीवृषभानुनन्दिनी अपने मणिमय प्रांगणमें बैठी थीं; उस समय उन्हें अपना ही प्रतिबिम्ब दिखायी दिया। उसे कोई अन्य नायिका समझकर उन्हें बड़ा खेद हुआ और उसका रूप-लावण्य देखकर वे सोचने लगीं कि यदि श्रीश्यामसुन्दरने इस नायिकाको देख लिया तो वे हमसे क्यों प्रीति करेंगे। वस्तुतः यह बात जो कही जाती है, ठीक ही है कि श्रीभगवान् और वृषभानुदुलारी परस्पर एक-दूसरेके सौंदर्यातिशयका तो समास्वादन कर सकते हैं, परंतु वे अपने-अपने सौन्दर्यका भोग करनेमें असमर्थ हैं। 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) उनका सौन्दर्य स्वयं उन्हींको विस्मयमें डाल देनेवाला है। यही भाव उस चित्रमें व्यक्त किया गया था, किंतु जिस प्रकार इस रहस्यको समझनेसे पूर्व हमें वह चित्र विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं जान पड़ता था, उसी प्रकार उस राजाको भी उस चित्रकारके लाये हुए चित्रमें कोई विशेषता नहीं जान पड़ी। तात्पर्य यह है कि वस्तु तो एक ही होती है; किंतु जो रसज्ञ हैं, उन्हें उसकी विशेष रसानुभूति होती है; अरसिकोंको तो आपातदृष्टिसे उसका कोई विशेष महत्त्व दिखायी नहीं देता। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यातिशयकी सबसे बड़ी रसज्ञा थीं; इसलिये उससे दीर्घकालमें भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती थी। वे कात्यायनी-पूजन और विविधविध व्रताचरणरूप तपस्या करके योगारूढ़ हुई थीं। उससे यदि उन्हें एक रात्रिके लिये ही भगवत्सान्निध्यकी प्राप्ति होती तो वह उन्हें किसी प्रकार सन्तुष्ट न कर सकता। उन्हें जो महान् फल प्राप्त होनेवाला था, वह तो पूर्ण ब्रह्मसंस्पर्श था और ब्रह्मसंस्पर्श ही पूर्ण योगारोहण है, किंतु यदि यह अल्पकालके लिये होता तो उससे कैसे तृप्ति हो सकती थी? अतः उन्हें उनकी तपस्याका पूर्ण फल प्रदान करनेके लिये भगवान्‌की योगमायाने एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया था। इसीसे 'इमाः क्षपाः' और 'ता रात्रीः' इन बहुवचनोंका प्रयोग किया गया है। वेदान्तका यह सिद्धान्त है कि अल्पकालमें अनन्त कालका और अल्प देशमें अनन्त देशका समावेश किया जा सकता है। स्वप्नमें हम देखते ही हैं कि एक क्षणमें ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव हो जाता है। योगवासिष्ठमें पाषाणोपाख्यानमें एक शिलाके भीतर ही ब्रह्माण्डका प्रदर्शन कराया गया है तथा राजा लवणके उपाख्यानमें भी दो-ढाई घड़ीके भीतर ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव कराया गया है। इसी प्रकार यहाँ भी प्रहरचतुष्टयवती एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया गया है, जिससे उनकी चिरकालीन भगवत्सम्भोग- लालसाकी पूर्णतया पूर्ति हो। भगवान्‌के आलिंगनका कितना महत्त्व है? इसका वर्णन हम कहाँतक कर सकते हैं। हनुमान्‌जीकी अद्भुत सेवाओंसे सन्तुष्ट होकर भगवान्‌ने कहा था— एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ (वा०रा० ७।४०।२३) अर्थात् हे कपे! मैं तुम्हारे एक-एक उपकारके बदले अपने प्राणोंका समर्पण कर सकता हूँ; फिर भी वे बचे ही रहेंगे और उनके लिये हमें ऋणी रहना पड़ेगा। उन्हीं हनुमान्‌जीको उन्होंने अपना अद्भुत आश्लेष प्रदान करते हुए कहा था— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) भक्तोंका सर्वस्वभूत यह भगवदाश्लेष वस्तुतः अत्यन्त दुर्लभ है। यह तो ब्रह्मा एवं सनकादिको भी प्राप्त होना कठिन है। इसीको ब्रह्मसंस्पर्श भी कहते हैं। किंतु यदि यह ब्रह्मसंस्पर्श बाह्यस्पशोंके समान क्षणिक ही हुआ तो इसमें विशेषता ही क्या हुई! भगवत्सम्मिलन कभी अस्थायी नहीं हुआ करता; भगवान्‌की प्राप्ति हो जानेपर तो फिर पुनरावृत्ति ही नहीं होती 'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥'

श्रीरामलीलारहस्य २१५ (गीता ८।१६) इसी दृष्टिसे भगवान्ने एक रात्रिमें प्राकृत पदार्थोंसे उनका रमण होना असम्भव है। जैसे ही अनन्त ब्राह्म रात्रियोंका समावेश करके उन्हें वृन्दावन भगवद्रूप है, वैसे ही वहाँकी रात्रियाँ भी अगणित रात्रियोंका अनुभव कराया। भगवद्रूपा हैं। ‘रात्री:’ शब्दका अर्थ निशा तो है ही, किंतु वे रात्रियाँ कैसी हैं? ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका:’ इसके सिवा इसका दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। (श्रीमद्भा० १०।२९।१) - शारदायामपि उत्फुल्लानि ‘रा दाने’ इस कोशके अनुसार ‘रा’ धातुका अर्थ मल्लिकोपलक्षितानि अशेषपुष्पाणि यासु ताः। ‘देना’ है, उसमें ‘तृन्’ प्रत्यय जोड़नेपर ‘रात्री’ शब्द अर्थात् शरत्कालमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त सिद्ध होता है, जिसका अर्थ ‘देनेवाली’ है। अर्थात् पुष्प खिले हुए हैं, वे रात्रियाँ। नियम तो ऐसा है कि गोपांगनाओंको अभीष्ट भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका सौन्दर्य- कई तरहके पुष्प दिनमें खिलते हैं, कई रात्रिमें तथा समास्वादन, उसे देनेवाली रात्रियाँ। ‘रात्री:’ शब्दके कई ग्रीष्ममें खिलते हैं और कई शरद्-ऋतुमें। किंतु पहले जो ‘ता:’ विशेषण है, वह उन रात्रियोंकी उस शरद्-ऋतुकी रात्रिमें सभी पुष्प अपने नियमोंको विलक्षणता द्योतित करता है। ‘ता: रात्री:’ अर्थात् छोड़कर खिल गये थे। इसी प्रकार चित्रकूटपर जिनके चरणोंका आश्रय लेनेवाले योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भगवान् रामके निवास करते समय वहाँके फलोंने भी अपने अभीष्ट तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उन्हीं अपनी ऋतुओंका नियम छोड़ दिया था। श्रीगोसाईंजी गोपांगनाओंकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली होनेके महाराज कहते हैं- कारण वे रात्रियाँ विलक्षण थीं। सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥ ये दानशीला रात्रियाँ इसलिये अत्यन्त विलक्षण (रा०च०मा० ६।५।५) हैं; क्योंकि पात्र और देय के महत्त्वसे दानका महत्त्व उसी प्रकार इस समय मानो सभी पुष्पोंने यही होता है। श्रीव्रजांगना-जैसे सर्ववन्द्य पात्रोंके लिये निखिल सोचा था कि हमारी शोभा और सुगन्धकी सार्थकता रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णतत्त्वको प्रदान करनेवाली हैं और इसीमें है कि हम श्रीभगवान्की प्रसन्नता-सम्पादन श्रीकृष्ण-जैसे परमपावन पात्रके लिये उन श्रीवृषभानु- करनेमें समर्थ हो सकें। जहाँ सारी प्रकृति अपनी नन्दिनीको प्रदान किया, जिनके लिये श्रीकृष्ण उत्सुक प्रजाओंके साथ प्रभुकी सेवामें उपस्थित होना चाहती और लालायित थे। अन्न, वस्त्र, रत्न, भूमि आदि समस्त है, वहाँ ये पुष्पादि उद्दीपन विभाव भी प्रभुकी दानोंसे ब्रह्मदान सर्वोत्कृष्ट है, समस्त पात्रोंमें ब्रह्मवित् प्रसन्नता-सम्पादन करनेको उत्सुक हो रहे हैं। अतः ही सर्वश्रेष्ठ पात्र है। इसके सिवा जो अधिकारी भी हो मानो अपनी सार्थकताके लिये ही वे भावोद्दीपनमें और जिसके लिये लालायित हो, उसके लिये उस सहायक हो रहे हैं। वस्तुका दान बहुत प्रशस्त होता है। यहाँ व्रजांगना ऐसी रात्रियोंको देखकर भगवान्ने रमण करनेको सर्वोत्कृष्ट पात्र हैं और श्रीकृष्ण-रसके लिये उत्कण्ठित मन किया अर्थात् उचित काल और उद्दीपन-सामग्री हैं। अतः उन्हें श्रीकृष्ण-जैसे दिव्य-रसका प्रदान करनेवाली देखकर ही भगवान्ने अपनी प्रियतमाओंके साथ रमण वे रात्रियाँ धन्य हैं। उनसे भी उत्कृष्ट पात्र सर्वाराध्य श्रीकृष्ण करनेके लिये उनका स्मरण किया। यहाँ ‘वीक्ष्य’ हैं और वे श्रीरासेश्वरी-सम्मिलनके लिये लालायित भी शब्दसे साभिलाष दर्शन अभिप्रेत है; क्योंकि ये सब हैं। अतः उनके लिये भी यह दान महत्त्वका है। सामग्रियाँ भावोद्दीपन करनेवाली थीं। अतः इसका ‘ता:’ का तात्पर्य ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवद्रूपा यह तात्पर्य भी हो सकता है- ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका भी हो सकता है; क्योंकि भगवान्‌का रमण और रात्री: ताश्च वीक्ष्य।' अर्थात् शरदोत्फुल्लमल्लिका रमणसामग्री जो कुछ भी होगा, अप्राकृत ही होगा; रात्रियोंको और उन्हींके द्वारा प्रियतमा गोपांगनाओंको