भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० भक्तिसुधा चुम्बनकर इन्हें भगवल्लीलाओंका पाठ पढ़ाया करती थीं। भावुकोंका ऐसा कथन है कि भगवान् श्रीकृष्णकी कृपाका पात्र वही होता है, जिसपर श्रीवृषभानुसुताकी कृपा होती है; उनकी कृपा ललितादि प्रधान यूथेश्वरियोंके कृपापात्रोंपर हुआ करती है और ललितादिकी कृपा अपनी नित्यसहचरियोंके कृपापात्र आचार्योंके कृपाभाजनोंपर होती है। फिर जिनका चंचु स्वयं श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधर-सुधासे चुम्बित होता था, उन श्रीशुकके मुखारविन्दसे निःसृत इस लीलाके माधुर्यका तो कहना ही क्या है। अहो! जिनके अधरामृतका संयोग होनेके कारण उनका किया हुआ वेणुनाद सम्पूर्ण चराचर जीवोंको मन्त्रमुग्ध कर देता था, वे रसराजशिरोमणि श्रीमाधव भी जिसके लिये लालायित रहते थे, उस श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधरसुधाकी माधुरीका वर्णन कौन कर सकता है ? फिर उन श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अधरसुधासे पोषित परमहंस- शिरोमणि श्रीशुकदेवजीसे अधिक रसिक और कौन होगा ? श्रीवृषभानुनन्दिनीके कलवाक् नामक शुककी कथा आनन्दवृन्दावनचम्पूमें एक बड़ी सुन्दर कथा है कि श्रीवृषभानुनन्दिनीके सन्निधानमें एक कलवाक् नामक शुक रहता था। श्रीरासेश्वरीजी मणिपंजरसे उस शुकको निकालकर अपने श्रीहस्तारविन्दपर बिठलाकर उसे दाड़िमी-बीज खिलाती थीं। एक दिन शुकको दाड़िमी-बीज खिला रही थीं कि दुष्प्राप्य श्रीकृष्णचन्द्रमें उत्कट प्रीति, भूयसी लज्जा, गुरुक्ति-विषवर्षंणोंसे मतिकी विकलता, अपने वपुकी परवशता और कुलीनवंशमें जन्म आदि सोचते- सोचते श्रीश्रीरासेश्वरीके मुखारविन्दसे यह श्लोक निकल पड़ा— दुरापजनवर्त्तिनी रतिरपत्रपा भूयसी गुरुक्तिविषवर्षंणैर्मतिरतीव दौःस्थ्यं गता। वपुः परवशं जनुः परमिदं कुलीनान्वये न जीवति तथापि किं परमदुर्मरोऽयं जनः ॥ शुकने इस श्लोकको धारण कर लिया और श्रीवृषभानुदुलारीके श्रीहस्तकमलसे उड़कर जहाँ श्रीब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण खेल रहे थे, वहीं एक वृक्षकी शाखापर बैठकर 'दुरापजनवर्त्तिनी रतिः' इसी श्लोकको पढ़ा। श्रीकृष्णने शुकके मुखसे विनिःसृत श्लोकको श्रवणकर आश्चर्यसे यह किसी 'महानुरागवती' का शुक है, यह जानकर बड़े मधुर शब्दोंमें शुकसे अपने समीप आनेका अनुरोध किया। शुक शाखापरसे उड़कर श्रीकृष्णके श्रीहस्तकमलपर बैठ गया। श्रीश्यामसुन्दरने पुनः श्लोक पढ़नेको कहा, शुकने फिर उसी श्लोकको सुनाया। अपनी प्रेयसी श्रीवृषभानुदुलारीके प्रिय शुकद्वारा उनकी विरह- व्यथासे समन्वित भावमय श्लोकको धारण करके श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और शुकको धन्यवाद देने लगे। शुकने कहा—श्रीव्रजराजकुमार गाढ़ानुरागके भारसे निर्भरभंगुरा, बड़े स्नेहसे 'श्रीकृष्ण' 'श्रीकृष्ण' इस मधुमय नामको पढ़ाती हुई अपनी स्वामिनीके कराम्बुरुहसे मैं तो चंचलतावश च्युत हो गया हूँ, मुझ अधन्यको आप कैसे धन्य कहते हैं ? गाढानुरागभरनिर्भरभङ्गुरायाः कृष्णोति नाम मधुरं मृदु पाठयन्त्याः। धिङ्मामधन्यमतिचञ्चलजातिदोषा- त्तस्याः कराम्बुरुहकोरकतश्च्युतोऽस्मि ॥ इतनेमें ही श्रीकृष्णका सखा कुसुमासव आ गया। वह भी शुककी वाग्मितापर मुग्ध हुआ। इसी समय वृषभानुनन्दिनीकी सहचरी मधुरिका शुकको ढूँढ़ती हुई वहाँ आयी और कुसुमासवके पूछनेपर कहने लगी कि अपनी स्वामिनीका क्रीड़ाशुक ढूँढ़नेके लिये मैं आयी हूँ। कुसुमासवने झगड़ते हुए कहा कि यह शुक तो हमारे सखा श्रीव्रजराजकुमारका ही है, तुम्हारी स्वामिनीका यह तब समझा जायगा, जब तुम्हारे हाथपर आ जाय। मधुरिकाने हँसते हुए कहा कि कुसुमासव, तुम्हारे सखाके श्रीहस्तकमलके संस्पर्श- सुखका अनुभव करके शुष्क वंशकी वंशी भी संगत्याग नहीं करती, फिर यह चेतन पक्षी श्यामसुन्दरके