भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य १९९

उनका उद्धार हो नहीं सकेगा। उन्हें भी इसे ऐसे वक्तासे श्रवण करना चाहिये, जो पूर्ण तत्त्वनिष्ठ हो तथा जो श्रोताके कामभावकी निवृत्ति करनेमें सर्वथा समर्थ हो। तब तो अवश्य इसके द्वारा भगवान्‌के प्रति स्थायी रतिका आविर्भाव होगा और उस भगवद्रतिके कारण कामका कदापि प्रभाव न होगा। पहले यह कहा जा चुका है कि इस प्रकरणके आरम्भमें जो ‘श्रीबादरायणिरुवाच’ है, उसका क्या रहस्य है। किंतु किसी-किसी प्रतिमें इसके स्थानपर ‘श्रीशुक उवाच’ भी है। भगवान् शुककी तत्त्वज्ञता सुप्रसिद्ध है और इधर श्रोता भी सर्वसाधनसम्पन्न कुरुकुल-भूषण महाराज परीक्षित् हैं। यदि ऐसे श्रोता-वक्ता हों तो अवश्य इसका महान् फल हो सकता है। ‘शुक उवाच’ इस वाक्यका एक और भी तात्पर्य हो सकता है। प्रायः शुकतुण्डसे सम्बन्धित होनेपर फलमें और भी अधिक मधुरता आ जाती है। इसीसे कहा है— निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ (श्रीमद्भा० १।१।३) जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद्रूप गौओंका अमृतमय दुग्ध होनेसे ही परम आदरणीय है, उसी प्रकार यह भागवतपुराण भी वेदमूलक होनेके कारण ही प्रमाण है। यह साक्षात् कल्पवृक्षका फल है और वह कल्पवृक्ष भी प्राकृत नहीं, बल्कि स्वयं शब्द- ब्रह्मरूप वेद है और यह उससे तोड़ा हुआ भी नहीं है, इसलिये इसके विषयमें कच्चे या अम्ल होनेकी भी आशंका नहीं की जा सकती। यह तो स्वयं पककर गिरा हुआ है। इसलिये इसमें अत्यन्त मधुरता और सुगन्ध आ गयी है। इसपर भी शुकके मुखका संयोग हो जानेसे तो यह और भी अधिक सरस हो गया है। इसीसे कहा है—‘पिबत’, इसे पिओ। यद्यपि फल खाया जाता है; परंतु इसे तो पीनेके लिये कहा है। इसका तात्पर्य यही है कि अन्य फलोंके समान इसमें गुठली या छिलका आदि कोई हेय अंश नहीं है; क्योंकि यह तो एकमात्र सुमधुर रसस्वरूप ही है। इसलिये इसका पान ही करना चाहिये। कबतक पान करें? ‘आलयम्’ अर्थात् मोक्ष पाकर भी। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ (रा०च०मा० ७।५३।२) इस प्रकार जब शुकतुण्डच्युत श्रीमद्भागवत ही पेय है तो उसके सारातिसारभूत ‘रासपंचाध्यायी’ के विषयमें तो कहना ही क्या है? यही ‘शुक उवाच’ का गूढ़ रहस्य है। इसके सिवा व्रजमें हमने एक और बात भी सुनी थी। वहाँके लोग कहा करते हैं—‘महाराज, महलकी बात माहिलिहि जाने’ अर्थात् महलके भीतर क्या- क्या होता है? इस रहस्यको तो महलके भीतर रहनेवाले ही जान सकते हैं; बाहर जो घास खोदनेवाला है, उसे अन्तःपुरकी बातोंका क्या पता लग सकता है? यह रासक्रीड़ा भगवान्‌की परम अन्तरंग लीला है। इसका मर्म तो वे ही जान सकते हैं, जो श्रीराधारानी और नन्दनन्दनके अत्यन्त कृपापात्र हैं; अन्य निष्ठावाले इसका रहस्य नहीं समझ सकते। इसका वक्ता भी वही हो सकता है, जो परम अन्तरंग हो। अतः यह देखना चाहिये कि इसका वक्ता कौन है? कोई कितना ही आत्मनिष्ठ हो, किंतु यदि वह इस रससे अनभिज्ञ हो तो कम-से-कम रसिकोंकी प्रवृत्ति तो उसके वाक्य-श्रवणमें हो नहीं सकती। अतः यह देखना चाहिये कि इसके वक्ताका रसमें प्रवेश है या नहीं। इसपर वे कहते हैं—‘श्रीशुक उवाच’ यहाँ जो शुक हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनीके क्रीड़ाशुक हैं। जिस समय श्रीनन्दनन्दन उनके पाससे चले जाते थे, उस समय श्रीरासेश्वरीजी इन्हें पढ़ाया करती थीं—‘कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा मति कहु रे’। वे अपने अमृतमय अधरपटसे इनकी चंचुको