भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २०१ श्रीहस्तारविन्दके स्पर्श-सुखको कैसे त्याग सकता है? इसी समय श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीने आकर कहा— ललन, भोजनको देर हो रही है; क्यों नहीं आते? कुसुमासव कहने लगा—अम्बा! देखो, यह मधुरिका व्यर्थ ही झगड़ती है। हमारे सखाके शुकको अपनी स्वामिनीका बतलाती है। मधुरिकाने नन्दरानीको अभिवादन किया। यशोदाने स्नेहसे मधुरिकाका स्पर्श करते हुए कहा—क्यों बेटी, क्या है? मधुरिकाने कहा—देवि, कोई बात नहीं। यह शुक मेरी स्वामिनी वृषभानुकुमारीका है। इसके बिना वे व्याकुल हैं। मैं तो यही कह रही थी। श्रीव्रजेश्वरीने कहा—बेटी, तुम जाओ। कुमारके खेलने जानेपर मैं भेज दूँगी। यह सुनकर मधुरिका प्रणामकर चली गयी। श्रीकृष्ण और कुसुमासव दोनोंने ही प्रसन्न होकर शुकको दाड़िमी- बीज आदि दिव्य पदार्थ खिलाये और फिर कुछ भोजनकर खेलने चले गये। इधर श्रीयशूमतिने अपनी दूतीसे शुकको भेजवा दिया। शुकने अपनी स्वामिनीसे उनके प्रियतमका सब समाचार सुनाया था। अतः यहाँ जो 'श्रीशुक' कहा गया है, उसका तात्पर्य 'श्रियः शुकः' श्रीजीका शुक समझना चाहिये। ये वे श्रीजी हैं, जिनके दिव्यातिदिव्य स्वरूपपर मुग्ध होकर सौन्दर्य-माधुर्य आदि गुणगण सर्वदा उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। 'श्रीयते सर्वैर्गुणैरिति श्रीः' अतः ये शुकदेवजी भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधिकाजीके अत्यन्त स्नेह-भाजन और परम अन्तरंग हैं। हमने ऐसा सुना है कि श्रीराधिकाजी तो उन्हें श्रीकृष्णनामका ही पाठ पढ़ाती थीं, किंतु जब वे चली जातीं तो श्रीश्यामसुन्दर प्रेमपूर्वक अपने मधुमय अधर-रसामृतसे पोषितकर उन्हें 'राधाकृष्ण राधाकृष्ण' ऐसा युगल नामका पाठ पढ़ाया करते थे। उस समय यदि राधिकाजी आ जातीं तो उन्हें बड़ा संकोच होता और वह फिर यही कहतीं—'कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा मति कहु रे'। इससे जान पड़ता है कि वे दोनोंहीके कृपापात्र थे। 'श्री' शब्दका अर्थ भगवान् भी है। 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्या सा श्रीः' अर्थात् जो सम्पूर्ण गुणोंद्वारा आश्रित हैं, वे श्री हैं। अतः वे जैसे श्रीराधिकाजीके लीलाशुक हैं, वैसे ही भगवान्के भी हैं। इसलिये वे इस रहस्यसे खूब अभिज्ञ हैं और उसका वर्णन करनेमें भी पटु हैं; क्योंकि शुककी बोली स्वभावतः ही मधुर होती है। इसीसे किसी प्रतिमें 'श्रीबादरायणिरुवाच' है और किसीमें 'श्रीशुक उवाच' है। जब श्रीशुकदेवजी इस कथाका वर्णन करने लगे तो उन्होंने सोचा कि यह तत्त्व तो परम दुरवगाह्य है; क्योंकि यह भगवत्स्वरूप है, परंतु यह है परम श्रेयस्कर और श्रेयमें बहुत विघ्न हुआ करते हैं, 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि'। तिसपर भी यह तो परम श्रेय है, इसलिये इसमें और भी अधिक विघ्नोंकी सम्भावना है। अतः इसके आरम्भमें कोई ऐसा मंगल करना चाहिये, जो सब प्रकारके विघ्नोंकी निवृत्ति करनेवाला हो। भगवान् मंगलोंके भी मंगल और देवोंके भी देव हैं— 'मङ्गलं मङ्गलानां च देवतानां च दैवतम्।' उनके द्वारा मंगलको भी मंगलत्व प्राप्त होता है तथा सारे संसारका मंगल उस मंगलसिन्धुका एक बिन्दु है। मंगलमें देवताका अनुस्मरण किया जाता है, परंतु वे तो देवताओंके भी देवताका स्मरण करते हैं। इसीसे वे मंगलोंका भी मंगल करते हुए इस प्रकार आरम्भ करते हैं— 'भगवान्' शब्दकी व्याख्या भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) यद्यपि 'भगवान्' शब्दका अर्थ आगे किया जाता है तथापि यह श्रवणमात्रसे मंगलकारक है, इसलिये यहाँ मंगलके लिये भी है। जैसे दूसरे प्रयोजनके लिये लाया हुआ भी जलपूर्ण घट अपने दर्शनमात्रसे यात्रीके लिये मंगलप्रद होता है, उसी प्रकार जिसमें नित्य-ऐश्वर्यका योग हो उसे 'भगवान्' कहते हैं। ऐश्वर्य छः हैं—