भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ भक्तिसुधा ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७४) अर्थात् समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र ज्ञान और समग्र वैराग्य—इन छः गुणोंका नाम 'भग' है। ये छः जिसमें हों, वही भगवान् है। ये सब-के-सब जीवमें तो अल्प मात्रामें हुआ करते हैं, किंतु भगवान्में निरतिशय होते हैं। यहाँ 'भगवान्' शब्दमें जो 'मतुप्' प्रत्यय है, वह नित्ययोग या अतिशयनमें है।* तात्पर्य यह है कि भगवान्में जो भग है, वह आगन्तुक नहीं है, बल्कि उनका नित्ययोग है और वह निरतिशय है। अच्छा, यदि भगवान्में नित्य निरतिशय ऐश्वर्य हो भी तो तुम्हें क्या लाभ ? इसपर हमें यही कहना है कि यह हमारे ही काम तो आयेगा और इसका प्रयोजन ही क्या हो सकता है? वस्तुतः भगवान्को तो इसकी कोई अपेक्षा है नहीं; क्योंकि वे तो आप्तकाम हैं। ऐश्वर्यका काम क्या होता है? यही न कि वह अपने आश्रयमें महत्त्वातिशय या सौख्यातिशयका आधान करे। जितने गुण हैं उनकी सफलता तभी होती है, जब वे अपने आश्रयमें सौख्यातिशय-महत्त्वातिशयका आधान करें; अतः भगवान्का ऐश्वर्य भी यदि उनमें इस प्रकारके किसी अतिशयका आधान नहीं करते तो वे भले ही अप्राकृत हों, व्यर्थ हैं। ये गुणगण शेष हैं और भगवान् उनके शेषी हैं तथा शेष शेषीके लिये हुआ ही करता है। अतः अब यह देखना है कि जिसमें ये गुण हैं, वह निरतिशय है या सातिशय? यदि सातिशय है, तब तो ऐश्वर्यादि गुण उसमें कुछ अतिशयताका आधान कर सकते हैं और यदि निरतिशय ज्ञान और आनन्द ही भगवान्का स्वरूप है तो किसी अतिशयताका आधान करनेमें असमर्थ होनेके कारण इन गुणोंका कोई प्रयोजन ही नहीं हो सकता। वेदान्तप्रक्रियाके अनुसार महत्त्वातिशयका भी आधान ब्रह्ममें नहीं हो सकता; क्योंकि ब्रह्म शब्दकी व्युत्पत्ति है 'बृहत्त्वाद्ब्रह्म'—बड़ा होनेके कारण वह ब्रह्म है। बृहत्, अनल्प, भूमा ये सब एक ही अर्थके वाचक हैं। जहाँ कोई संकोचक प्रमाण होता है, वहाँ तो अनल्पत्व सातिशय होता है। जैसे 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः' इस वाक्यके अनुसार समस्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना सम्भव न होनेके कारण 'सर्व' शब्दका संकोच करके केवल समस्त निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भोजन कराना ही समझा जाता है। यहाँ कोई प्रमाण नहीं है, जिससे ब्रह्मका अनल्पत्व सातिशय निश्चय किया जाय। अतः संकोचकप्रमाणका अभाव होनेके कारण यहाँ वही अर्थ करना चाहिये कि जो निरतिशय बृहत् है अर्थात् जिससे बड़ा और कोई नहीं है, वह भूमा ब्रह्म है। जो देश, काल या वस्तुसे परिच्छिन्न हो अर्थात् अन्योन्याभावादि चार प्रकारके अभावोंमेंसे किसीका प्रतियोगी हो, वह अपरिच्छिन्न (निरतिशय) अनल्प नहीं हो सकता। अतः सब प्रकारके परिच्छेदसे रहित सच्चिदानन्द तत्त्व ही ब्रह्म है। ऐसा अपरिच्छिन्न तत्त्व सब प्रकारके बाधका अधिष्ठान होनेके कारण अबाध्य सत् है। यदि वह अबाध्य जड़ हो तो उसके भानके लिये किसी दूसरी वस्तुकी अपेक्षा होगी और ऐसा होनेपर द्वैत होनेके कारण वस्तुपरिच्छेद अनिवार्य होगा। इसके सिवा अभिज्ञोंकी दृष्टिमें जड़ वस्तु निरतिशय बृहत् हो भी नहीं सकती। अतः ब्रह्म सत् और स्वयंप्रकाश है अर्थात् वह अपनेसे भिन्न किसी प्रकाशान्तरकी अपेक्षासे रहित निरपेक्ष प्रकाशस्वरूप है। इस प्रकार अपनेसे भिन्न द्वैतादि उपद्रव-शून्य होनेके कारण वह निरुपद्रुत परमानन्दस्वरूप है और अनन्त भी है। इससे भी ब्रह्मकी निरतिशयता सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये एक ही तत्त्वके नाम बतलाये हैं। 'ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥' (श्रीमद्भा० १।२।११) श्रीश्रीधर स्वामीका भी यही मत है, किंतु कुछ लोगोंका इससे मतभेद है। श्रीजीव
- भूमिनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने। सम्बन्धेऽस्ति विवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥