भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

श्रीरासलीलारहस्य २०३ गोस्वामीने तत्त्वसन्दर्भका आरम्भ इसी श्लोकसे किया है। उन्होंने ब्रह्मसे परमात्माको और परमात्मासे भगवान्‌को उत्कृष्ट माना है। उनका अभिप्राय कविवर माघके इस श्लोकसे स्फुट होता है— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ अर्थात् दूरसे नारदजी आ रहे थे। पहले तो समझा कि कोई तेजःपुंज आ रहा है; फिर आकृतिका भान होनेपर मालूम हुआ कि कोई शरीरी है। उसके पश्चात् अवयव-विभागकी प्रतीति होनेपर जाना कि कोई पुरुष है और फिर क्रमशः निश्चय हुआ कि नारदजी हैं। अतः श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि जबतक ब्रह्म दूर रहता है, तबतक लोग उसे निर्गुण निर्विशेष समझते हैं। फिर उसका विशेष अनुभव होनेपर उसे परमात्मरूपसे जाना जाता है; किंतु जो उसकी नित्यसन्निधिमें रहते हैं, उन्हें वह अचिन्त्यानन्त- कल्याणगुणगणोपेत जान पड़ता है। इस प्रकार अनुभवके उत्कर्षके साथ उत्तरोत्तर ब्रह्मके निर्विशेष, सविशेष और साकार स्वरूपका साक्षात्कार होता है। यहाँ अपने सिद्धान्तका पोषण करनेके लिये उन्होंने यह भी कहा है कि ये ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् क्रमशः ज्ञानी, योगी और भक्तोंकी अपेक्षासे हैं तथा इनमें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट है, परंतु इससे पूर्व तत्त्वका लक्षण करते हुए यह कहा गया है कि 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।' अर्थात् जो सजातीय-विजातीय स्वगतभेदशून्य अद्वय ज्ञान है, वही तत्त्व है। अतः यह बतलाना चाहिये कि लोग जो विशेषता दिखलाते हैं, वह तत्त्वमें है या केवल नामोंमें ही। यदि तत्त्वमें कोई भेद न हो तो नामान्तर होनेसे ही उसके लक्षणमें क्या अन्तर आ सकता है ? जिस प्रकार यदि घटका यह लक्षण कर दिया कि 'कम्बुग्रीवादिमान् घटः' तो 'कलश' कहनेसे भी उसमें क्या अन्तर आ सकता है ? अतः यदि तत्त्वका लक्षण 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' ऐसा है तो नामके भेदसे उसमें क्या भेद हो सकता है ? कोई लोग 'अद्वय' शब्दका अर्थ उपमारहित करते हैं। अतः उनके मतमें उपमारहित ज्ञान ही अद्वय है, किंतु 'अद्वय' शब्दका ऐसा अर्थ करना किसी प्रकार ठीक नहीं है। अद्वयका अर्थ तो देशकाल- वस्तुपरिच्छेदशून्य ही है 'नेह नानास्ति किञ्चन', (कठ० २।१।११) 'नात्र काचन भिदास्ति' इन वचनोंमें 'नाना' और 'भिदा' के साथ 'किंचन' और 'काचन' शब्दका प्रयोग सर्व प्रकारके नानात्व और भेदका निषेध करता है। अब यदि युक्तिसे विचार किया जाय तो भगवान्‌को अचिन्त्यानन्तकल्याणगुणगणसम्पन्न माननेपर उन गुणोंके कारण उनके शेषीमें कोई उपकार होना भी अवश्य मानना पड़ेगा। यदि आप शेषीको सातिशय मानते हैं, तब तो सिद्धान्तविरुद्ध होगा—ब्रह्मका सातिशयत्व तो किसी भी आस्तिकको मान्य नहीं हो सकता। आप जो कहते हैं कि उत्तरोत्तर सान्निध्यके बढ़नेपर भगवान्‌के उत्तरोत्तर विशेष रूपोंका अनुभव होता है, उन विशेषताओंका यही तात्पर्य है; न कि वे अपने आश्रयमें किसी अतिशयका आधान करें, किंतु यदि परब्रह्म स्वरूपसे ही निरतिशय है तो सान्निध्यसे उसमें क्या अन्तर पड़ेगा? यदि सान्निध्यको केवल उसकी विशेषताओंकी अभिव्यक्तिका कारण मानोगे तो यह बतलाओ कि तुम्हारा वह सान्निध्य क्रियाकृत है या ज्ञानकृत। यदि क्रियाकृत है तो ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आ जायगी और यदि ज्ञानकृत है तो मायावादका प्रसंग उपस्थित हो जायगा, जो आपको अभीष्ट नहीं है। ब्रह्म निरतिशय बृहत् है। बृहत्ताकी कल्पना करते-करते जहाँ तुम शान्त हो जाओ वह ब्रह्म है और सान्निध्यके द्वारा तुम जिस अतिशयताका आधान करना चाहते हो, उसे तो हम सर्वदेशी मानते हैं। यदि कहो कि जिस प्रकार 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्याः'— समस्त ब्रह्मणोंको भोजन कराना चाहिये इत्यादि वाक्योंमें समस्त पदसे केवल निमन्त्रित ब्राह्मण ही