भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 778 में से

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ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी कुछ संकोच कर लिया जायगा तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ संसारके सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको भोजन कराना अभिप्रेत ही नहीं है: अतः संकोच तो केवल वहीं किया जाता है, जहाँ कोई संकोचक प्रमाण होता है। जो वस्तु देशपरिच्छिन्न, कालपरिच्छिन्न अथवा वस्तुपरिच्छिन्न होती है, उसीमें संकोच किया जाना सम्भव है। निरतिशय वस्तुमें कोई परिच्छेद नहीं होता, इसलिये उसमें संकोच भी नहीं किया जा सकता- 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्य- द्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्य- न्यद्विजानाति तदल्पम्...।' (छान्दोग्य० ७।२४।१) अतः ये 'भग' निरतिशय भगवान्‌में किसी सौख्यातिशय या महत्त्वातिशयका आधान नहीं कर सकते। भगवान्‌में किसी प्रकारके अनर्थकी सम्भावना नहीं, अतः अनर्थ-निवृत्तिमें भी गुणोंका उपयोग नहीं हो सकता। भगवान्‌ने यह ऐश्वर्य भक्तोंके लिये ही धारण किया है। उनकी यह काम-विजयलीला भी भक्तोंके ही लिये थी। इसलिये भगवान् जो अचिन्त्यानन्त-कल्याणगुणगण धारण करते हैं, वे उपासकोंके लिये ही हैं, जिससे कि उनकी उपासनाद्वारा वे उन गुणोंको प्राप्त कर सकें। हमने यह विचार इसीलिये किया है कि जो लोग भगवान्‌को निरतिशय बृहत् आनन्दस्वरूप नहीं मानते, उनके मतमें वह ब्रह्म भी नहीं हो सकता; क्योंकि ब्रह्म, भूमा इन शब्दोंका एक ही अर्थ है। इनका तात्पर्य एक ही वस्तुमें है। अतः भूमा कौन है? 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति' न कोई और देखता है, न सुनता है और न जानता है, जहाँ कोई अन्य है, वह तो अल्प ही है-'यदल्पं तन्मर्त्यम्।' (छान्दोग्य० ७।२४।१)। इसलिये जहाँ भूमा है, वहाँ द्वैत नहीं; क्योंकि द्वैत तो वस्तुकृत परिच्छेदमें ही हो सकता है। इस प्रकार जहाँ द्वैतका अभाव है, वहीं अद्वैत है, इसीसे कहा है- यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत्... केन कं विजानीयाद्० (बृहदारण्यक० ४।५।१५) इत्यादि। अब यदि आप ब्रह्मको अनल्प मानते हैं तो गुणगण कैसे? और यदि गुणगण हैं तो गुणगण और उनके आश्रयका तथा गुणोंका स्वगत भेद है या नहीं? यदि उनमें भेद है तो ब्रह्म परिच्छिन्न सिद्ध होगा और इससे उसका ब्रह्मत्व ही बाधित हो जायगा। यदि कहो कि हम ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌में भेद मानते हैं; हमारे मतमें भगवान् परम अन्तरंग सात्वतोंके प्राप्य हैं; परमात्मा योगियोंके प्राप्तव्य हैं तथा ब्रह्म अत्यन्त बहिरंग ज्ञानियोंका ध्येय है। इसीसे भगवान्‌ने भी योगीको ज्ञानियोंसे भी बड़ा माना है-'ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।' (गीता ६।४६) और भक्तोंको समस्त योगियोंसे उत्कृष्ट माना है। योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ (गीता ६।४७) तो ऐसा माननेसे भी उनकी अल्पता सिद्ध होती है; क्योंकि तीन होनेके कारण उनमें वस्तुकृत परिच्छेद तो है ही। इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं। हम यह तो पहले कह ही चुके हैं कि लक्ष्यका भेद लक्षण-भेदसे होता है, नामसे नहीं होता। जैसा कम्बुग्रीवादि पृथुबुध्नोदरत्वादि लक्षण एक होनेसे घट, कलश-इन नामोंका भेद होते हुए भी वस्तुका भेद नहीं होता, ठीक वैसे ही जब लक्षणमें भेद नहीं है तो ब्रह्म या भगवान् आदि नामोंके भेदसे लक्ष्यका भेद कैसे होगा? यहाँ तत्त्वका लक्षण 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' ऐसा किया है। इसलिये उसमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं हो सकता। अतः आश्रय, जो कि तत्त्व है, अनन्त है, निरतिशय है और अद्वय है; गुणगण उसमें किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं कर सकते। वे तो अपनी सिद्धिके लिये ही

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