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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

श्रीरासलीलारहस्य २०५ भगवान्‌का आश्रय लिये हुए हैं। भगवान् कहते हैं— 'मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।' (श्रीमद्भा० ११।१३।४०) इस प्रकार गुणोंने यद्यपि अपनी सिद्धिके लिये ही भगवान्‌का आश्रय लिया है और भगवान्‌ने भी उनपर कृपा करके उन्हें स्वीकार कर लिया है तथापि इसका कोई अन्तरंग प्रयोजन भी होना ही चाहिये। वह प्रयोजन यही है कि लोग उन अचिन्त्यगुण- गणविशिष्ट भगवान्‌की आराधना करेंगे और उन्हें उन गुणोंकी प्राप्ति होगी। इसीसे श्रीशुकदेवजीने इस लीलाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये 'भगवान्' शब्दसे मंगलोंका भी मंगल किया है। इसके सिवा उन्होंने यह भी सोचा होगा कि यह लीला अत्यन्त दुरवगाह्य है, हम इसका अवगाहन करनेमें समर्थ नहीं हैं; परंतु भगवान्‌का स्मरण करनेसे हम इस दुरवगाह्यका भी अवगाहन कर सकेंगे। भगवत्स्मरणसे हमें भगवदैश्वर्यकी प्राप्ति होगी और उससे हमें इसके वर्णनका सामर्थ्य प्राप्त होगा तथा लोकमें यह भी देखा जाता है कि वक्ताकी रुक्षताके कारण एक अत्यन्त मधुर-प्रसंग भी रूखा जान पड़ता है और वक्ताके माधुर्यसे ही किसी रूखी बातमें भी सरसता आ जाती है। इसीसे कहा है— 'कवीनां रसविद्धः'। हम पहले कह चुके हैं कि भगवान् शुकदेवजीको स्वयं श्रीवृषभानुदुलारी और भगवान् श्यामसुन्दरने अपनी अधर-सुधाका पान कराकर पढ़ाया था। उस युगलमूर्तिके अधरामृतपानसे उनकी वाणीमें कितना माधुर्य आ गया था, इसका कौन वर्णन कर सकता है? फिर भी प्रसंगको दुरवगाह्य समझकर उन्होंने भगवान्‌का स्मरण किया। इस प्रकार 'भगवान्' शब्दसे यह तो मंगल और वक्ताका तात्पर्य-सूचन हुआ, परंतु 'भगवान्' शब्दका यह अर्थ तो ऐसा है, जैसे किसी अन्य कार्यके लिये लाये हुए जलके घड़ेको देखकर उसे शुभ शकुनका सूचक मानकर देखनेवालेको आनन्द होता है। इसका मुख्य प्रयोजन तो दूसरा ही है। रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या अब हम रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या आरम्भ करते हैं— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) अर्थात् उन रात्रियोंमें शरत्कालीन मल्लिकाको विकसित हुई देखकर भगवान्‌ने भी योगमायाका आश्रय लेकर रमण करनेके लिये मन किया। विचार करनेपर मालूम होता है कि इस श्लोकका तात्पर्य विरोधद्योतनमें है। रमण करनेकी इच्छा तो अनाप्तकामोंको हुआ करती है, किंतु जब भगवान्‌के चरणारविन्दमकरन्दका रसास्वादन करनेवाले तत्त्वज्ञ भी आत्माराम हुआ करते हैं अर्थात् वे भी रमणके लिये आत्मातिरिक्त साधनकी अपेक्षा नहीं करते तो भगवान्‌को रमण करनेकी इच्छा होना तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है। यदि भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की तो अवश्य यह बहुत विरुद्ध बात है। रमणकर्ताकी भगवत्ता और भगवान्‌का रमण करना— दोनों ही सर्वथा अनुपपन्न हैं। यदि कहो कि स्वरूपसे तो सभी जीव आप्तकाम हैं—वेदान्त-सिद्धान्तानुसार तो जितना भोक्तृ-भोग्य- वर्ग है, वह सब ब्रह्म ही है; परंतु जीव तो रमण करनेकी इच्छा करता ही है। परमात्मासे विमुख होनेके कारण इसका ऐश्वर्य तिरोहित हो रहा है, भगवदुन्मुख होनेपर उसका ऐश्वर्य अभिव्यक्त हो जाता है। ब्रह्मादि भी तो वस्तुतः जीव ही हैं। अतः यदि भगवान्‌ने भी रमणकी इच्छा की तो क्या आश्चर्य है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उनमें 'भग' है। उनमें समग्र ऐश्वर्य है, समग्र ज्ञान है, समग्र वैराग्य है, और समग्र श्री है। जिनमें ऐश्वर्य एवं ज्ञानादिकी कमी होती है, उन्हींमें वासना होनी सम्भव है, किंतु जिसमें इनकी पूर्णता है, उसमें किसी प्रकारकी वासनाका प्रादुर्भूत होना सम्भव नहीं मालूम

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