भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ भक्तिसुधा होता। इसके सिवा 'भगवान्' का एक दूसरा लक्षण भी है— उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।५।७८) अर्थात् जो समस्त प्राणियोंके उत्पत्ति, नाश, आना, जाना तथा ज्ञान और अज्ञानको जानता है, उसे 'भगवान्' कहना चाहिये। अतः जीव और भगवान्में तो बड़ा अन्तर है। इसीसे ऐसा माना गया है कि जीव ब्रह्म तो हो जाता है; परंतु भगवान्* नहीं हो सकता; क्योंकि स्वरूपतः निर्विशेष ब्रह्मसे तो उसका अभेद है ही, किंतु निरतिशय ऐश्वर्य तो केवल ईश्वरमें ही है, यह उसमें नहीं हो सकता। संसारमें दो ईश्वर नहीं हो सकते। अतः भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा क्यों की, यह प्रश्न तो खड़ा ही रहता है। देखो, एक ही पदार्थके लिये पंकज, जलज, अरविन्द एवं कमल आदि कई शब्दोंका प्रयोग होता है। उसके ये नाम गुण-विशेषोंकी अपेक्षासे हैं। जैसे तापापनोदकरूपसे उसे 'जलज' कहेंगे तथा उद्भवस्थानसे वैलक्षण्य प्रदर्शित करना होगा तो पंकज कहेंगे। इसी प्रकार अन्य शब्दोंके प्रयोगके विषयमें समझो। यही बात भ्रमर, मधुप, मधुकर, अलि एवं षट्पद आदि शब्दोंके विषयमें भी कही जा सकती है। ये भी यद्यपि एक ही व्यक्तिके वाचक हैं तथापि 'भ्रमर' शब्दसे उसकी अस्थिरताका द्योतन होता है और 'मधुप' शब्दसे मिष्टप्रियताका। इसी तरह यद्यपि भगवान् ब्रह्म एवं परमात्मा स्वरूपतः तो एक ही हैं; परंतु इन शब्दोंसे उसके विशेष-विशेष पक्षोंका द्योतन होता है। यहाँ 'भगवान्' शब्द अवश्य रमणके साथ विरोध- प्रदर्शनके लिये ही है। 'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'—भगवान्ने भी रमण करनेके लिये मन किया—यह बात उनके औत्सुक्यातिशयका द्योतन करती है अर्थात् भगवान्को रमण करनेकी ऐसी उत्सुकता हुई कि उन्होंने मन बना डाला; वस्तुतः तो वे 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः' ही थे। किंतु रमण तो बिना मनके हो ही नहीं सकता। भगवान्का रमण क्या था? यही न कि अपने सौन्दर्य-माधुर्यको गोपांगनाओंकी इन्द्रियोंसे उपभोग कराना और गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यातिशयको अपनी इन्द्रियोंसे भोगना, परंतु यदि भगवान् सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित हों तो यह भोग कैसे बन सकता है? उसका मुख्य साधन तो मन है। इसीसे गोपांगनाओंके सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणोंका समास्वादन करनेके लिये भगवान्ने मन बनाया। यदि कहो कि उन्होंने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही मन बनाया था तो यह ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ 'चक्रे' इस क्रियामें आत्मनेपद है। आत्मनेपद वहीं हुआ करता है, जहाँ क्रियाका फल अपने लिये होता है। जहाँ क्रिया-फल दूसरेके लिये होता है, वहाँ परस्मैपद हुआ करता है। इसलिये यदि भगवान्का यह कर्म भक्तोंके लिये होता तो यहाँ 'चक्रे' के स्थानमें 'चकार' होता। परंतु भगवान्को रमणकी उत्सुकता होना तो सर्वथा असम्भव है; क्योंकि 'भगवान्' तो कहते ही उसे हैं, जिसमें ऐश्वर्य, ज्ञान एवं वैराग्यादिकी निरतिशयता हो। इस प्रकार जिसमें नित्य और निरतिशय ऐश्वर्यादि हैं और जो अपने नित्यस्वरूपमें सर्वथा तृप्त है, उसे ऐसी रमणेच्छा होना तो अनुपपन्न ही है। इस अनुपपत्तिको सूचित करनेके लिये ही यहाँ 'अपि' शब्द दिया है अर्थात् यद्यपि ऐसा करना था तो अयुक्त ही, परंतु ऐसा हो ही गया। इसका अनौचित्य हम भी स्वीकार करते हैं। यह गोपांगनाओंके सौभाग्यातिशयकी ही महिमा है। यदि कहो कि इसका हेतु क्या है तो हमारा यही कथन है कि हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखा ही जाता है कि आत्माराम मुनिजन भी भगवान्की माधुरीपर आकर्षित हो जाया करते हैं। वास्तवमें तो उन्हें भी
- यहाँ 'भगवान्' शब्द परम ऐश्वर्यशाली परमेश्वरका बोधक है।