भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

कोई कर्तव्य नहीं हुआ करता। ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। न चास्ति किञ्चित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्॥ (श्रीजाबालदर्शनोपनिषद् १।२३) तथापि वे भगवच्चर्चामें लगे ही रहते हैं। उन्हें स्वयं भी इस बातका पता नहीं लगता कि हमारा चित्त उसमें क्यों आसक्त है। बहुत हुआ तो कह देंगे— 'इत्थम्भूतगुणो हरिः' (श्रीमद्भा० १।७।१०)— भाई, भगवान् हैं ही ऐसे गुणवाले, किंतु युक्तियुक्त विचारसे तो यही सिद्ध होता है कि आत्मारामको किसी भी गुणसे आकर्षित नहीं होना चाहिये। यदि कहो कि वे इसलिये भजन-ध्यानमें लगे रहते होंगे, जिससे कोई ग्रन्थि न रह जाय तो ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि वे निर्ग्रन्थ होते हैं—'निर्ग्रन्था अपि।' यद्यपि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि बिना प्रयोजनके कोई भी प्रवृत्ति नहीं होती तथापि इनका कोई प्रयोजन भी नहीं होता। वस्तुतः भगवान्में यह गुण ही है। जिस प्रकार लोहेको आकर्षित करना अयस्कान्तमणिका स्वभाव है, उसी प्रकार भगवान् भी आत्मारामोंके चित्तोंको अपनी ओर खींच लिया करते हैं। अयस्कान्तमणि यद्यपि सभी प्रकारके लोहेको खींच लेती है तथापि जो लोहा जितना निर्दोष होता है, उतना शीघ्र आकृष्ट होता है। इसी प्रकार भगवान् भी तत्त्ववेत्ताओंके निर्मल चित्तोंको अधिक आकर्षित करते हैं। यह भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यका महत्त्वातिशय है। इसी प्रकार यद्यपि भगवान् आप्तकाम हैं, पूर्ण हैं, निरतिशय हैं तथापि यह गोपांगनाओंका प्रेमातिशय ही था कि जिसने भगवान्‌को भी आकर्षित कर लिया, इससे भगवान्‌के माधुर्य एवं सौन्दर्यातिशयकी अपेक्षा भी व्रजांगनाओंके प्रेमातिशयकी उत्कृष्टता सिद्ध होती है। सनकादि और शुकादि भी आत्मरत थे और भगवान् भी आत्मरत हैं; परंतु भगवान्‌की आत्मरतिमें और उनकी आत्मरतिमें अन्तर है; क्योंकि समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य और समग्र ऐश्वर्य तो एकमात्र भगवान्में ही है और किसीमें नहीं है तथापि भगवान्ने तो अपने सौन्दर्यातिशयसे असमग्र ज्ञान-वैराग्यपूर्ण सनकादिको ही मोहित किया, परंतु गोपांगनाओंने अपने प्रेमातिशयसे समग्रज्ञान-वैराग्य- सम्पन्न भगवान्‌को भी मोहित कर लिया। इसीसे यहाँ 'अपि' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'चक्रे' में आत्मनेपद और 'अपि' तथा 'भगवान्' पदका स्वारस्य प्रदर्शित करनेके लिये ही 'ताः रात्रीः वीक्ष्य' ऐसा कहा गया है। 'तत्' पद प्रायः प्रसिद्ध अर्थका द्योतक हुआ करता है। यहाँ 'ताः' ऐसा विशेषण देनेसे मालूम होता है कि वे रात्रियाँ कोई विलक्षण ही थीं। ये वे रात्रियाँ थीं, जिन्हें गोपांगनाओंने 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७)— इस वरदानसे प्राप्त किया था, जिन्हें उन्होंने व्रताचरणद्वारा कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करके और फिर उनकी कृपासे श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रसन्नता प्राप्त करके उनसे वरदानरूपमें प्राप्त किया था। इस प्रकार भगवान् और कात्यायनीदेवी, इन दोनोंकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुई वे रात्रियाँ अवश्य कुछ विलक्षण ही होनी चाहिये थीं। जैसे श्रीकृष्ण-सम्मिलनके लिये व्रजांगनाओंको श्रीकात्यायनीका अर्चन करना पड़ा था, वैसे ही श्रीकृष्णको भी अपनी प्रेयसियोंके मिलनेके लिये महारूद्ररूपा वंशीका आराधन युक्त ही था। श्रीकृष्ण, उस रुद्ररूपा वंशीको अपने अमृतमय मुखचन्द्रमें अधर-पल्लवपर लिटा, अधरसुधाका भोग लगाकर सुकोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं। सुन्दर मुकुटका छत्र और कुण्डलोंकी आभासे उसकी आरती करके श्रीकृष्ण रुद्ररूपा वंशीका सांगोपांग आराधन करते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि भगवान्‌की यह लीला कामवश नहीं थी; क्योंकि यदि भगवान् कामुक होते तो इतने दिन पीछेकी रात्रियोंका निर्देश क्यों करते? कामुकोंका तो एक क्षण युगके समान बीता करता है, वे तो दैवकृत कालव्यवधानको भी सहन करनेमें असमर्थ होते हैं, फिर स्वयं अपनी इच्छासे ही एक वर्षकी अवधि बढ़ाना तो उनके लिये सम्भव ही