भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २१३ दर्शनमें लग जायँगे, उस समय इनका सामर्थ्य नहीं कि वहाँसे आगे बढ़ सकें। इस विषयमें ऐसी ही बात अन्यत्र कही गयी है। जिस समय भगवान् रामचन्द्रका विवाहोत्सव हुआ, उस समय उस अपूर्व शोभाको निहारनेके लिये ब्रह्मा, शिव, षडानन एवं इन्द्रादि सभी देवगण वहाँ उपस्थित हो गये। भगवान्‌का वरवेश देखकर वे अपनेको अत्यन्त बड़भागी मानने लगे। उस रूप-माधुरीका पान करनेके लिये उन्हें अपने नेत्र पर्याप्त न जान पड़े; उस समय जिसके जितने अधिक नेत्र थे, उसने अपनेको उतना ही अधिक भाग्यशाली समझा। ब्रह्मादि सभी देवताओंकी अपेक्षा अधिक नेत्र होनेके कारण देवराज इन्द्रको सबसे अधिक आनन्द हुआ और उन्होंने गौतमऋषिके शापको, जिसके कारण उन्हें सहस्र भग प्राप्त हुए थे और जो बादमें मुनिके प्रसन्न होनेपर सहस्र नेत्र हो गये थे, अपने लिये परम हितकर माना। उनकी मनोवृत्तिको व्यक्त करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराजने कहा है— रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ (रा०च०मा० १।३१७।६) यह बात तो इन्द्रादि देवताओंकी है, परंतु गोपांगनाएँ तो प्रेममार्गकी आचार्या हैं, उनमें भी श्रीराधिकाजी तो साक्षात् भगवान्‌की आह्लादिनीशक्ति हैं, उनके प्रेमकी तुलना देवताओंके साथ क्या की जा सकती है? इसीसे इन्द्रादि तो भगवान्‌की रूपमाधुरीका अधिक-से-अधिक सहस्र नेत्रोंसे ही पान करके तृप्त हो गये, किंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो कहती हैं कि हमारे प्रत्येक रोमकूपमें कोटि-कोटि नेत्र हों, तब भी हम श्रीश्यामसुन्दरके सौन्दर्यके एक कणका भी यथेष्ट रसास्वादन नहीं कर सकतीं। भला, प्रेममें कभी तृप्ति होती है? यह नियम है कि वस्तु चाहे एक ही हो; किंतु उसका जो जितना अधिक रसज्ञ होगा, उसे वह उतनी ही अधिक सरस प्रतीत होगी। अरसिकोंको रसमय पदार्थ भी उतना सरस प्रतीत नहीं होता। देखो, ब्रह्म सर्वत्र ही है तथापि उसके परमानन्दकी सबको समान अनुभूति नहीं होती। उसकी स्फुट प्रतीति तो भावुक भक्तगण तथा आत्माराम मुनिजनको ही होती है। एक चित्रकारने एक चित्र तैयार किया और उसे वह किसी राजाके यहाँ ले गया, परंतु राजाने उसका कोई विशेष रहस्य नहीं समझा; केवल उदासीन भावसे उसका १०,००० रुपये मूल्य देनेको कहा, किंतु चित्रकारने इस मूल्यमें चित्र देना स्वीकार न किया। जिस समय वह उसे लौटाकर ले जा रहा था, बीचमें उसे एक राजसेवक मिला। उसने आग्रहपूर्वक वह चित्र दिखानेको कहा। जब चित्रकारने उसे खोलकर दिखलाया तो वह राजसेवक उसका हस्तकौशल देखकर दंग रह गया, किंतु उसके पास उस चित्रको मोल लेनेयोग्य द्रव्य नहीं था। उस समय वह केवल एक धोती बाँधे हुए था। उसने उसमेंसे लँगोटीभर फाड़कर वह धोती उस चित्रकारको दे दी। चित्रकारने भी उस धोतीके बदलेमें ही वह चित्र उसे दे दिया। धीरे-धीरे यह समाचार राजाके कानोंतक पहुँचा। राजाने उसे बुलाकर पूछा कि तुमने जो चित्र हमें १०,००० रुपयेमें भी नहीं दिया, वही हमारे एक साधारण सेवकको केवल उसकी धोती लेकर ही कैसे दे दिया? तब चित्रकारने कहा—राजन्! आपने उसका महत्त्व नहीं समझा था; इसलिये आप जो कुछ देते थे, वह भी इसका पर्याप्त मूल्य नहीं था; किंतु आपके सेवकने उसका महत्त्व जाना और जो कुछ अधिक-से-अधिक वह दे सकता था, वही दे भी दिया। इसलिये मैंने आपके १०,००० रुपयेकी अपेक्षा भी उसकी धोतीका अधिक मूल्य समझा था। एक दिन हमने भी एक चित्र देखा था। उसमें बिल्कुल एक ही रूपकी दो स्त्रियाँ बनायी गयी थीं। उन दोनोंके आकार-प्रकार एवं वेश-भूषामें कोई भी अन्तर नहीं था। दोनों ही आमने-सामने शोकमुद्रामें बैठी थीं। उस चित्रको देखकर समझमें नहीं आता था कि इसका क्या रहस्य है। बहुत विचार करनेपर मालूम हुआ कि इसका प्रसंग इस प्रकार है—एक