भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइससे सिद्ध हुआ कि गुणमय शरीरका त्याग किये बिना भगवदाश्लेष प्राप्त नहीं हो सकता। यही वेदान्तका भी सिद्धान्त है। वहाँ भी गुणमय शरीरमें अनासक्त होनेपर ही ब्रह्मसंस्पर्शकी प्राप्ति होती है और उसीसे परमानन्दका अनुभव होता है। श्रीमद्भगवद्गीता (५।२१)-का वचन है- बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ पुरुषका ब्रह्म-संस्पर्श प्राप्त करना क्या है? जिस समय श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा जीव अन्नमयादि कोशोंसे मुक्त होकर स्वरूपस्थ होता है, उसी समय उसे ब्रह्मके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव होता है। इसीलिये महावाक्यके तात्पर्यार्थमें 'तत्' और 'त्वम्' पदका लक्ष्यार्थ लिया जाता है, वाच्यार्थ नहीं लिया जाता। यदि अवच्छेदवादकी दृष्टिसे देखें तो उपाधिपरिच्छिन्न चेतन ही जीव है और उपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म है तथा उपाधिके रहते हुए उनकी एकताका अनुभव नहीं हो सकता। प्रतिबिम्बवादमें भी जलमें प्रतिबिम्बित आकाशके समान बुद्धिरूप उपाधिमें प्रतिबिम्बित चेतन ही जीव है। उसका महाकाशरूप ब्रह्मसे जलरूप उपाधिके कारण ही भेद है और उपाधिकी निवृत्ति होते ही दोनोंकी एकता हो जाती है। इस प्रकार उपाधिकृत परिच्छिन्नता आदि दोषोंका आरोप करनेसे ही एक अनन्त पूर्ण तत्त्व दोषवान्-सा प्रतीत होता है। इसीसे कहा है- एकमपि सन्तमनकमिव मन्यते। अतः जबतक जीव गुणमय शरीरसे संसक्त है, तबतक वह ब्रह्म-संस्पर्शका अधिकारी कभी नहीं हो सकता। जिसने उपाधिका बाध करके त्वंपदार्थका शोधन कर लिया है, वही तत्पदार्थसे अपना अभेद अनुभव करनेमें समर्थ हो सकता है। इसी प्रकार यहाँ गोपांगनाओंको भी अपने प्राकृत शरीरका अपनोदनकर शुद्ध रसमय शरीर प्राप्त करनेके लिये भगवान्ने एक वर्षका व्यवधान रखा।
उस समय भगवान्ने जो कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) अर्थात् तुम इन्हीं रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करोगी-इसमें भी एक संदेह होता है। वह यह कि चीरहरण-लीला तो दिनके समय हुई थी और 'इमाः' (इन) शब्द प्रस्तुत अर्थका द्योतक है; फिर भगवान्ने 'इमाः क्षपाः' इन रात्रियोंमें ऐसा निर्देश कैसे किया? यदि कहो कि वे रात्रियाँ भगवान्की बुद्धिमें स्थित थीं, इसलिये यह उक्ति अयुक्त नहीं है तो ठीक है, परंतु गोपियोंको तो इनका प्रत्यक्ष नहीं था। इससे मालूम होता है कि गोपियोंको वर देनेकी इच्छा करनेपर भगवान्की सत्यसंकल्पता शक्तिसे प्रेरित योगमायाने इन रात्रियोंको भगवान्के सामने उपस्थित कर दिया था। जैसे यदि कोई सम्राट् किसीको कोई वस्तु देना चाहता है तो उसका भाव समझनेवाले सेवकगण उस वस्तुको लाकर सामने उपस्थित कर देते हैं। इसके सिवा एक शंका यह भी होती है कि रासलीला तो केवल एक रात्रिमें ही हुई थी, फिर यह तथा चीरहरण-लीलाके अनन्तर वर-प्रदान करते समय भी बहुवचन 'इमाः'-का प्रयोग क्यों किया गया? उत्तर-भगवान् अनन्त-गुणमय हैं, उनके अचिन्त्य और अनन्त गुणोंका आस्वादन अल्प कालमें नहीं हो सकता। व्रजांगनाओंने भी किसी क्षुद्र फलके लिये कात्यायनी-पूजन आदि कठोर तपस्याका अनुष्ठान नहीं किया था। अतः यदि उन्हें थोड़े समयके लिये ही भगवत्सुखास्वादनका अवसर प्राप्त होता तो यह उनकी तपस्याका पूरा फल हुआ न समझा जाता। भगवान्के स्वरूप-रसास्वादनके विषयमें ही श्रीवृषभानुनन्दिनीका कथन था कि अरी सखियो! भगवान्के समग्र सौन्दर्य-माधुर्य-रसास्वादनकी बात तो दूर है, यदि हमें उसके एक कणका भी आस्वादन करना हो तो हमारे प्रत्येक रोममें कोटि-कोटि नेत्र होनेपर भी हम उसका सम्यक् आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं। जिस समय ये नेत्र भगवान्के एक अंगके