भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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होता है, उसीके वियोगमें दुःख हुआ करता है। बिना संयोगके तो प्रेम ही नहीं होता, फिर उसके अभावमें दुःख ही क्या होगा ? मनुष्यका जितना जिसके प्रति अधिक प्रेम होगा, उतना ही उसके वियोगमें दुःख होगा— यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान्। तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकंशङ्कवः॥ (श्रीविष्णुपुराण १।१७।६६) अतः जब गोपांगनाओंको भगवान्के श्रीअंगसे संस्पृष्ट वस्त्रद्वारा भगवान्का संयोग हो गया तो उसीने वियोग होनेपर उनके हृदयमें विरहाग्नि प्रज्वलित कर दी। वे जब कभी भगवान्की झाँकी करती थीं तो उनके हृदयमें परमानन्दकी बाढ़ आ जाती थी और उनके आँखोंसे ओझल होते ही विरहानल धधक उठता था। गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) जिस प्रकार सुवर्णादिके शोधनके लिये अग्निसंयोगकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गोपांगनाओंका रसमय शरीर भी तभी पुष्ट होगा, जब वह भगवद्विरहाग्निमें सन्तप्त हो लेगा। इसीसे जबसे भगवान्ने यह वर दिया कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तबसे उनके प्रति उनका जो प्रेमातिशय हुआ, उसके कारण उनकी वियोगाग्निसे उनका रसमय शरीर पुष्ट होने लगा तथा उनका जो प्राकृत शरीर था, वह उस वियोगकृत सन्तापसे दग्ध हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें वे पूर्णतया परिपक्व हो गयीं। किंतु सभी गोपांगनाएँ एक-सी अधिकारिणी नहीं थीं। उनमें जो भगवान्की आह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरी ललिता- विशाखा आदि हैं, वे तो नित्य-सिद्धा हैं। वे तो भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार अमृतमय समुद्रमें माधुर्य होता है, उसी प्रकार भगवान्के साथ उनका अभेद ही है। यह बात श्रुतिरूपा मुनिचरी और देवकन्या आदि अन्य गोपांगनाओंके विषयमें समझनी चाहिये, जो कि साधनसिद्धा थीं। वे ही इस प्रकार भगवद्विप्रयोगरूप अग्निसे रसमय शरीरका सम्पादन करती थीं। नित्यसिद्धा तो केवल लोक-संग्रहके लिये ही ऐसा करती थीं। उन्हें स्वयं इसकी कोई अपेक्षा नहीं थी। उनमें भी कोई-कोई गोपांगनाएँ ऐसी थीं, जो सालभरमें सिद्धा नहीं हुईं; उन्हींके विषयमें ऐसा कहा गया है— अन्तर्गृहगताः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।९-१०) जिस समय भगवान्ने अपनी मधुमय वेणुका वादन किया, उस समय उस वेणुनादरूप उद्दीपन- विभावद्वारा जब रससिन्धु भगवान् कृष्ण उन व्रजांगनाओंके अन्तःकरणोंमें प्रस्फुरित हुए तो उनका मनोमल सर्वथा नष्ट हो गया और उन्हें भगवान्के वियोगमें एक-एक पल असह्य हो गया, किंतु उस समय उनके पतियोंने उन्हें घरमें बन्द कर दिया था। इससे उनके हृदयमें जो सन्ताप हुआ, उसे देखकर संसारके सारे अशुभ काँप उठे; उन सबने मिलकर भी किसीको उतना कष्ट पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। किंतु साथ ही उन्होंने जो ध्यानयोगद्वारा भगवान्का एक क्षणके लिये आश्लेष किया, उससे उनके हृदयमें जो परमानन्दका उद्रेक हुआ, उसे देखकर भी अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत प्राणियोंके समस्त पुण्यार्जित सुख क्षीण हो गये। उन्होंने किसीको इतना सुख पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। इस प्रकार जिन गोपांगनाओंके अप्राकृत रसमय शरीरकी पुष्टि अभी नहीं हुई थी, वह अब हो गयी। भगवान्के विप्रयोगजनित सन्तापसे उनका गुणमय शरीर दग्ध हो गया, इसीसे कहा है—'जहुर्गुणमयं देहम्'। (श्रीमद्भा० १०।२९।११)