भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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२१० भक्तिसुधा उसमें अति कठोर कण्टकजननकी भी शक्ति है और अत्यन्त मनोज्ञ सौन्दर्य-माधुर्यमय पुष्प उत्पन्न करनेकी भी। इन दोनों प्रकारकी शक्तियोंमें कोई विलक्षणता है या नहीं ? जिस प्रकार इन दोनों शक्तियोंमें महान् अन्तर है, उसी प्रकार सुख-दुःख-मोहात्मक जगत्की उत्पत्ति करनेवाली गुणमयी शक्ति और अति अलौकिक दिव्य मंगलविग्रहको व्यक्त करनेवाली लीलाशक्तिमें भी बहुत बड़ा अन्तर है। यदि उनमें अन्तर नहीं था तो जिन सनकादिको प्रपंचकी कारणभूता कोई भी शक्ति मोहित नहीं कर सकती थी, उन्हें भगवान्‌के चरण-कमलोंसे लगी हुई तुलसीकी दिव्य गन्धने क्यों मोहित कर दिया ? अतः सिद्ध यह हुआ कि दिव्य भगवद्विग्रहको प्रकट करनेवाली लीलाशक्ति परा है और जगदुत्पादिनी गुणमयी शक्ति अपरा है। इससे अद्वैतवादमें भी कोई भेद नहीं आता। जिस प्रकार जलमें तरंगें रहती हैं और उनका जलसे अभेद रहता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें भी पराशक्ति अभिन्नरूपसे रहती है। यह बात शुद्धाद्वैतियोंको भी अभिमत है। जब उनसे पूछते हैं कि भला, शुद्ध ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति कैसे हुई तो वे कहते हैं कि भगवान्‌में एक अघटितघटनापटीयान् आत्मयोग है, उसीसे प्रपंचकी उत्पत्ति होती है। इस बातको सिद्ध करनेके लिये वे श्रीयशोदाजीके इस वाक्यका प्रमाण देते हैं। जिस समय माताको यह दिखानेके लिये कि मैंने मिट्टी नहीं खायी, भगवान्‌ने अपना मुँह खोलकर दिखलाया तो उसमें नन्दरानीको सारा ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। यह देखकर वे बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और सोचने लगीं कि यह क्या भेद है। क्या मुझे ही कोई भ्रम हो गया है, अथवा कोई राक्षसोंका उपद्रव है? ऐसी कोई बात तो है नहीं; अतः मालूम होता है कि यह मेरे इस बालकका ही कोई विलक्षण आत्मयोग है। उस जगह उन्होंने कहा है— 'अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः॥' (श्रीमद्भा० १०।८।४०) यहाँ जो 'यः कश्चन' पद है, वह उस आत्मयोगकी अनिर्वचनीयता द्योतित करनेके लिये है। ठीक यही बात अद्वैतवादी भी मानते हैं। यहाँ 'यः कश्चन' कहनेका क्या तात्पर्य है ? हम पूछते हैं कि यह आत्मयोग भगवान्‌से भिन्न है या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब तो अद्वैत न रहा और यदि अभिन्न है तो भगवान्‌की तरह यह कूटस्थ होगा और कूटस्थ होनेपर प्रपंचोत्पादनमें समर्थ नहीं होगा। इसलिये इसे न भिन्न कह सकते हैं और न अभिन्न ही। अतः वह भगवान्‌से अव्यतिरिक्त होनेपर भी भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य विग्रहके प्रादुर्भावका कारण है। इसलिये इस विषयमें कोई विशेष मतभेद नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्‌ने जो उसी समय रमण करनेकी अनुमति न देकर एक वर्षका व्यवधान किया, उसका यही तात्पर्य था कि वे एक साल मेरी प्रतीक्षामें रहकर रसमय विग्रह प्राप्त करें। भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यादि अप्राकृत हैं; अतः प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें ग्रहण नहीं कर सकतीं। उन्हें ग्रहण करनेके लिये तो अप्राकृत देह और इन्द्रियोंकी आवश्यकता है। किंतु उस अप्राकृत रसमय शरीरकी क्रमशः अभिवृद्धि होती है। प्राणी जितनी ही मात्रामें भगवदनु- सन्धानमें तत्पर होता है, उतनी ही उसके रसमय शरीरकी पुष्टि होती जाती है और प्राकृत शरीरका क्षय होता जाता है। जिस समय वह पूर्णतया भगवन्निष्ठ हो जाता है, उस समय उसे पूर्णतः रसमय शरीरकी प्राप्ति हो जाती है और भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है। कात्यायनी-पूजनसे गोपांगनाओंके रसमय शरीरका आरम्भ तो हुआ, किंतु उसकी ठीक पूर्णता नहीं हुई थी। इसीलिये भगवान्‌ने ऐसा नियम किया। जिस समय इष्ट वस्तु सुलभ मालूम होने लगती है, उसी समय उसकी प्राप्तिकी उत्सुकता बढ़ती है। कात्यायनी-पूजनके समय गोपांगनाओंको भगवान् सुलभ नहीं जान पड़ते थे; इसीसे उनके प्रति उनका उत्कट प्रेम भी नहीं था। यह नियम है कि पहले जिस वस्तुका संयोग