भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

२१० भक्तिसुधा उसमें अति कठोर कण्टकजननकी भी शक्ति है और अत्यन्त मनोज्ञ सौन्दर्य-माधुर्यमय पुष्प उत्पन्न करनेकी भी। इन दोनों प्रकारकी शक्तियोंमें कोई विलक्षणता है या नहीं ? जिस प्रकार इन दोनों शक्तियोंमें महान् अन्तर है, उसी प्रकार सुख-दुःख-मोहात्मक जगत्की उत्पत्ति करनेवाली गुणमयी शक्ति और अति अलौकिक दिव्य मंगलविग्रहको व्यक्त करनेवाली लीलाशक्तिमें भी बहुत बड़ा अन्तर है। यदि उनमें अन्तर नहीं था तो जिन सनकादिको प्रपंचकी कारणभूता कोई भी शक्ति मोहित नहीं कर सकती थी, उन्हें भगवान्‌के चरण-कमलोंसे लगी हुई तुलसीकी दिव्य गन्धने क्यों मोहित कर दिया ? अतः सिद्ध यह हुआ कि दिव्य भगवद्विग्रहको प्रकट करनेवाली लीलाशक्ति परा है और जगदुत्पादिनी गुणमयी शक्ति अपरा है। इससे अद्वैतवादमें भी कोई भेद नहीं आता। जिस प्रकार जलमें तरंगें रहती हैं और उनका जलसे अभेद रहता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें भी पराशक्ति अभिन्नरूपसे रहती है। यह बात शुद्धाद्वैतियोंको भी अभिमत है। जब उनसे पूछते हैं कि भला, शुद्ध ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति कैसे हुई तो वे कहते हैं कि भगवान्‌में एक अघटितघटनापटीयान् आत्मयोग है, उसीसे प्रपंचकी उत्पत्ति होती है। इस बातको सिद्ध करनेके लिये वे श्रीयशोदाजीके इस वाक्यका प्रमाण देते हैं। जिस समय माताको यह दिखानेके लिये कि मैंने मिट्टी नहीं खायी, भगवान्‌ने अपना मुँह खोलकर दिखलाया तो उसमें नन्दरानीको सारा ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। यह देखकर वे बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और सोचने लगीं कि यह क्या भेद है। क्या मुझे ही कोई भ्रम हो गया है, अथवा कोई राक्षसोंका उपद्रव है? ऐसी कोई बात तो है नहीं; अतः मालूम होता है कि यह मेरे इस बालकका ही कोई विलक्षण आत्मयोग है। उस जगह उन्होंने कहा है— 'अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः॥' (श्रीमद्भा० १०।८।४०) यहाँ जो 'यः कश्चन' पद है, वह उस आत्मयोगकी अनिर्वचनीयता द्योतित करनेके लिये है। ठीक यही बात अद्वैतवादी भी मानते हैं। यहाँ 'यः कश्चन' कहनेका क्या तात्पर्य है ? हम पूछते हैं कि यह आत्मयोग भगवान्‌से भिन्न है या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब तो अद्वैत न रहा और यदि अभिन्न है तो भगवान्‌की तरह यह कूटस्थ होगा और कूटस्थ होनेपर प्रपंचोत्पादनमें समर्थ नहीं होगा। इसलिये इसे न भिन्न कह सकते हैं और न अभिन्न ही। अतः वह भगवान्‌से अव्यतिरिक्त होनेपर भी भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य विग्रहके प्रादुर्भावका कारण है। इसलिये इस विषयमें कोई विशेष मतभेद नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्‌ने जो उसी समय रमण करनेकी अनुमति न देकर एक वर्षका व्यवधान किया, उसका यही तात्पर्य था कि वे एक साल मेरी प्रतीक्षामें रहकर रसमय विग्रह प्राप्त करें। भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यादि अप्राकृत हैं; अतः प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें ग्रहण नहीं कर सकतीं। उन्हें ग्रहण करनेके लिये तो अप्राकृत देह और इन्द्रियोंकी आवश्यकता है। किंतु उस अप्राकृत रसमय शरीरकी क्रमशः अभिवृद्धि होती है। प्राणी जितनी ही मात्रामें भगवदनु- सन्धानमें तत्पर होता है, उतनी ही उसके रसमय शरीरकी पुष्टि होती जाती है और प्राकृत शरीरका क्षय होता जाता है। जिस समय वह पूर्णतया भगवन्निष्ठ हो जाता है, उस समय उसे पूर्णतः रसमय शरीरकी प्राप्ति हो जाती है और भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है। कात्यायनी-पूजनसे गोपांगनाओंके रसमय शरीरका आरम्भ तो हुआ, किंतु उसकी ठीक पूर्णता नहीं हुई थी। इसीलिये भगवान्‌ने ऐसा नियम किया। जिस समय इष्ट वस्तु सुलभ मालूम होने लगती है, उसी समय उसकी प्राप्तिकी उत्सुकता बढ़ती है। कात्यायनी-पूजनके समय गोपांगनाओंको भगवान् सुलभ नहीं जान पड़ते थे; इसीसे उनके प्रति उनका उत्कट प्रेम भी नहीं था। यह नियम है कि पहले जिस वस्तुका संयोग

होता है, उसीके वियोगमें दुःख हुआ करता है। बिना संयोगके तो प्रेम ही नहीं होता, फिर उसके अभावमें दुःख ही क्या होगा ? मनुष्यका जितना जिसके प्रति अधिक प्रेम होगा, उतना ही उसके वियोगमें दुःख होगा— यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान्। तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकंशङ्कवः॥ (श्रीविष्णुपुराण १।१७।६६) अतः जब गोपांगनाओंको भगवान्के श्रीअंगसे संस्पृष्ट वस्त्रद्वारा भगवान्का संयोग हो गया तो उसीने वियोग होनेपर उनके हृदयमें विरहाग्नि प्रज्वलित कर दी। वे जब कभी भगवान्की झाँकी करती थीं तो उनके हृदयमें परमानन्दकी बाढ़ आ जाती थी और उनके आँखोंसे ओझल होते ही विरहानल धधक उठता था। गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) जिस प्रकार सुवर्णादिके शोधनके लिये अग्निसंयोगकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गोपांगनाओंका रसमय शरीर भी तभी पुष्ट होगा, जब वह भगवद्विरहाग्निमें सन्तप्त हो लेगा। इसीसे जबसे भगवान्ने यह वर दिया कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तबसे उनके प्रति उनका जो प्रेमातिशय हुआ, उसके कारण उनकी वियोगाग्निसे उनका रसमय शरीर पुष्ट होने लगा तथा उनका जो प्राकृत शरीर था, वह उस वियोगकृत सन्तापसे दग्ध हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें वे पूर्णतया परिपक्व हो गयीं। किंतु सभी गोपांगनाएँ एक-सी अधिकारिणी नहीं थीं। उनमें जो भगवान्की आह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरी ललिता- विशाखा आदि हैं, वे तो नित्य-सिद्धा हैं। वे तो भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार अमृतमय समुद्रमें माधुर्य होता है, उसी प्रकार भगवान्के साथ उनका अभेद ही है। यह बात श्रुतिरूपा मुनिचरी और देवकन्या आदि अन्य गोपांगनाओंके विषयमें समझनी चाहिये, जो कि साधनसिद्धा थीं। वे ही इस प्रकार भगवद्विप्रयोगरूप अग्निसे रसमय शरीरका सम्पादन करती थीं। नित्यसिद्धा तो केवल लोक-संग्रहके लिये ही ऐसा करती थीं। उन्हें स्वयं इसकी कोई अपेक्षा नहीं थी। उनमें भी कोई-कोई गोपांगनाएँ ऐसी थीं, जो सालभरमें सिद्धा नहीं हुईं; उन्हींके विषयमें ऐसा कहा गया है— अन्तर्गृहगताः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।९-१०) जिस समय भगवान्ने अपनी मधुमय वेणुका वादन किया, उस समय उस वेणुनादरूप उद्दीपन- विभावद्वारा जब रससिन्धु भगवान् कृष्ण उन व्रजांगनाओंके अन्तःकरणोंमें प्रस्फुरित हुए तो उनका मनोमल सर्वथा नष्ट हो गया और उन्हें भगवान्के वियोगमें एक-एक पल असह्य हो गया, किंतु उस समय उनके पतियोंने उन्हें घरमें बन्द कर दिया था। इससे उनके हृदयमें जो सन्ताप हुआ, उसे देखकर संसारके सारे अशुभ काँप उठे; उन सबने मिलकर भी किसीको उतना कष्ट पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। किंतु साथ ही उन्होंने जो ध्यानयोगद्वारा भगवान्का एक क्षणके लिये आश्लेष किया, उससे उनके हृदयमें जो परमानन्दका उद्रेक हुआ, उसे देखकर भी अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत प्राणियोंके समस्त पुण्यार्जित सुख क्षीण हो गये। उन्होंने किसीको इतना सुख पहुँचानेमें अपनेको असमर्थ पाया। इस प्रकार जिन गोपांगनाओंके अप्राकृत रसमय शरीरकी पुष्टि अभी नहीं हुई थी, वह अब हो गयी। भगवान्के विप्रयोगजनित सन्तापसे उनका गुणमय शरीर दग्ध हो गया, इसीसे कहा है—'जहुर्गुणमयं देहम्'। (श्रीमद्भा० १०।२९।११)

इससे सिद्ध हुआ कि गुणमय शरीरका त्याग किये बिना भगवदाश्लेष प्राप्त नहीं हो सकता। यही वेदान्तका भी सिद्धान्त है। वहाँ भी गुणमय शरीरमें अनासक्त होनेपर ही ब्रह्मसंस्पर्शकी प्राप्ति होती है और उसीसे परमानन्दका अनुभव होता है। श्रीमद्भगवद्गीता (५।२१)-का वचन है- बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ पुरुषका ब्रह्म-संस्पर्श प्राप्त करना क्या है? जिस समय श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा जीव अन्नमयादि कोशोंसे मुक्त होकर स्वरूपस्थ होता है, उसी समय उसे ब्रह्मके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव होता है। इसीलिये महावाक्यके तात्पर्यार्थमें 'तत्' और 'त्वम्' पदका लक्ष्यार्थ लिया जाता है, वाच्यार्थ नहीं लिया जाता। यदि अवच्छेदवादकी दृष्टिसे देखें तो उपाधिपरिच्छिन्न चेतन ही जीव है और उपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म है तथा उपाधिके रहते हुए उनकी एकताका अनुभव नहीं हो सकता। प्रतिबिम्बवादमें भी जलमें प्रतिबिम्बित आकाशके समान बुद्धिरूप उपाधिमें प्रतिबिम्बित चेतन ही जीव है। उसका महाकाशरूप ब्रह्मसे जलरूप उपाधिके कारण ही भेद है और उपाधिकी निवृत्ति होते ही दोनोंकी एकता हो जाती है। इस प्रकार उपाधिकृत परिच्छिन्नता आदि दोषोंका आरोप करनेसे ही एक अनन्त पूर्ण तत्त्व दोषवान्-सा प्रतीत होता है। इसीसे कहा है- एकमपि सन्तमनकमिव मन्यते। अतः जबतक जीव गुणमय शरीरसे संसक्त है, तबतक वह ब्रह्म-संस्पर्शका अधिकारी कभी नहीं हो सकता। जिसने उपाधिका बाध करके त्वंपदार्थका शोधन कर लिया है, वही तत्पदार्थसे अपना अभेद अनुभव करनेमें समर्थ हो सकता है। इसी प्रकार यहाँ गोपांगनाओंको भी अपने प्राकृत शरीरका अपनोदनकर शुद्ध रसमय शरीर प्राप्त करनेके लिये भगवान्ने एक वर्षका व्यवधान रखा।

उस समय भगवान्ने जो कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) अर्थात् तुम इन्हीं रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करोगी-इसमें भी एक संदेह होता है। वह यह कि चीरहरण-लीला तो दिनके समय हुई थी और 'इमाः' (इन) शब्द प्रस्तुत अर्थका द्योतक है; फिर भगवान्ने 'इमाः क्षपाः' इन रात्रियोंमें ऐसा निर्देश कैसे किया? यदि कहो कि वे रात्रियाँ भगवान्की बुद्धिमें स्थित थीं, इसलिये यह उक्ति अयुक्त नहीं है तो ठीक है, परंतु गोपियोंको तो इनका प्रत्यक्ष नहीं था। इससे मालूम होता है कि गोपियोंको वर देनेकी इच्छा करनेपर भगवान्की सत्यसंकल्पता शक्तिसे प्रेरित योगमायाने इन रात्रियोंको भगवान्के सामने उपस्थित कर दिया था। जैसे यदि कोई सम्राट् किसीको कोई वस्तु देना चाहता है तो उसका भाव समझनेवाले सेवकगण उस वस्तुको लाकर सामने उपस्थित कर देते हैं। इसके सिवा एक शंका यह भी होती है कि रासलीला तो केवल एक रात्रिमें ही हुई थी, फिर यह तथा चीरहरण-लीलाके अनन्तर वर-प्रदान करते समय भी बहुवचन 'इमाः'-का प्रयोग क्यों किया गया? उत्तर-भगवान् अनन्त-गुणमय हैं, उनके अचिन्त्य और अनन्त गुणोंका आस्वादन अल्प कालमें नहीं हो सकता। व्रजांगनाओंने भी किसी क्षुद्र फलके लिये कात्यायनी-पूजन आदि कठोर तपस्याका अनुष्ठान नहीं किया था। अतः यदि उन्हें थोड़े समयके लिये ही भगवत्सुखास्वादनका अवसर प्राप्त होता तो यह उनकी तपस्याका पूरा फल हुआ न समझा जाता। भगवान्के स्वरूप-रसास्वादनके विषयमें ही श्रीवृषभानुनन्दिनीका कथन था कि अरी सखियो! भगवान्के समग्र सौन्दर्य-माधुर्य-रसास्वादनकी बात तो दूर है, यदि हमें उसके एक कणका भी आस्वादन करना हो तो हमारे प्रत्येक रोममें कोटि-कोटि नेत्र होनेपर भी हम उसका सम्यक् आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं। जिस समय ये नेत्र भगवान्के एक अंगके

श्रीरासलीलारहस्य २१३ दर्शनमें लग जायँगे, उस समय इनका सामर्थ्य नहीं कि वहाँसे आगे बढ़ सकें। इस विषयमें ऐसी ही बात अन्यत्र कही गयी है। जिस समय भगवान् रामचन्द्रका विवाहोत्सव हुआ, उस समय उस अपूर्व शोभाको निहारनेके लिये ब्रह्मा, शिव, षडानन एवं इन्द्रादि सभी देवगण वहाँ उपस्थित हो गये। भगवान्‌का वरवेश देखकर वे अपनेको अत्यन्त बड़भागी मानने लगे। उस रूप-माधुरीका पान करनेके लिये उन्हें अपने नेत्र पर्याप्त न जान पड़े; उस समय जिसके जितने अधिक नेत्र थे, उसने अपनेको उतना ही अधिक भाग्यशाली समझा। ब्रह्मादि सभी देवताओंकी अपेक्षा अधिक नेत्र होनेके कारण देवराज इन्द्रको सबसे अधिक आनन्द हुआ और उन्होंने गौतमऋषिके शापको, जिसके कारण उन्हें सहस्र भग प्राप्त हुए थे और जो बादमें मुनिके प्रसन्न होनेपर सहस्र नेत्र हो गये थे, अपने लिये परम हितकर माना। उनकी मनोवृत्तिको व्यक्त करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराजने कहा है— रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ (रा०च०मा० १।३१७।६) यह बात तो इन्द्रादि देवताओंकी है, परंतु गोपांगनाएँ तो प्रेममार्गकी आचार्या हैं, उनमें भी श्रीराधिकाजी तो साक्षात् भगवान्‌की आह्लादिनीशक्ति हैं, उनके प्रेमकी तुलना देवताओंके साथ क्या की जा सकती है? इसीसे इन्द्रादि तो भगवान्‌की रूपमाधुरीका अधिक-से-अधिक सहस्र नेत्रोंसे ही पान करके तृप्त हो गये, किंतु श्रीवृषभानुनन्दिनी तो कहती हैं कि हमारे प्रत्येक रोमकूपमें कोटि-कोटि नेत्र हों, तब भी हम श्रीश्यामसुन्दरके सौन्दर्यके एक कणका भी यथेष्ट रसास्वादन नहीं कर सकतीं। भला, प्रेममें कभी तृप्ति होती है? यह नियम है कि वस्तु चाहे एक ही हो; किंतु उसका जो जितना अधिक रसज्ञ होगा, उसे वह उतनी ही अधिक सरस प्रतीत होगी। अरसिकोंको रसमय पदार्थ भी उतना सरस प्रतीत नहीं होता। देखो, ब्रह्म सर्वत्र ही है तथापि उसके परमानन्दकी सबको समान अनुभूति नहीं होती। उसकी स्फुट प्रतीति तो भावुक भक्तगण तथा आत्माराम मुनिजनको ही होती है। एक चित्रकारने एक चित्र तैयार किया और उसे वह किसी राजाके यहाँ ले गया, परंतु राजाने उसका कोई विशेष रहस्य नहीं समझा; केवल उदासीन भावसे उसका १०,००० रुपये मूल्य देनेको कहा, किंतु चित्रकारने इस मूल्यमें चित्र देना स्वीकार न किया। जिस समय वह उसे लौटाकर ले जा रहा था, बीचमें उसे एक राजसेवक मिला। उसने आग्रहपूर्वक वह चित्र दिखानेको कहा। जब चित्रकारने उसे खोलकर दिखलाया तो वह राजसेवक उसका हस्तकौशल देखकर दंग रह गया, किंतु उसके पास उस चित्रको मोल लेनेयोग्य द्रव्य नहीं था। उस समय वह केवल एक धोती बाँधे हुए था। उसने उसमेंसे लँगोटीभर फाड़कर वह धोती उस चित्रकारको दे दी। चित्रकारने भी उस धोतीके बदलेमें ही वह चित्र उसे दे दिया। धीरे-धीरे यह समाचार राजाके कानोंतक पहुँचा। राजाने उसे बुलाकर पूछा कि तुमने जो चित्र हमें १०,००० रुपयेमें भी नहीं दिया, वही हमारे एक साधारण सेवकको केवल उसकी धोती लेकर ही कैसे दे दिया? तब चित्रकारने कहा—राजन्! आपने उसका महत्त्व नहीं समझा था; इसलिये आप जो कुछ देते थे, वह भी इसका पर्याप्त मूल्य नहीं था; किंतु आपके सेवकने उसका महत्त्व जाना और जो कुछ अधिक-से-अधिक वह दे सकता था, वही दे भी दिया। इसलिये मैंने आपके १०,००० रुपयेकी अपेक्षा भी उसकी धोतीका अधिक मूल्य समझा था। एक दिन हमने भी एक चित्र देखा था। उसमें बिल्कुल एक ही रूपकी दो स्त्रियाँ बनायी गयी थीं। उन दोनोंके आकार-प्रकार एवं वेश-भूषामें कोई भी अन्तर नहीं था। दोनों ही आमने-सामने शोकमुद्रामें बैठी थीं। उस चित्रको देखकर समझमें नहीं आता था कि इसका क्या रहस्य है। बहुत विचार करनेपर मालूम हुआ कि इसका प्रसंग इस प्रकार है—एक

दिन श्रीवृषभानुनन्दिनी अपने मणिमय प्रांगणमें बैठी थीं; उस समय उन्हें अपना ही प्रतिबिम्ब दिखायी दिया। उसे कोई अन्य नायिका समझकर उन्हें बड़ा खेद हुआ और उसका रूप-लावण्य देखकर वे सोचने लगीं कि यदि श्रीश्यामसुन्दरने इस नायिकाको देख लिया तो वे हमसे क्यों प्रीति करेंगे। वस्तुतः यह बात जो कही जाती है, ठीक ही है कि श्रीभगवान् और वृषभानुदुलारी परस्पर एक-दूसरेके सौंदर्यातिशयका तो समास्वादन कर सकते हैं, परंतु वे अपने-अपने सौन्दर्यका भोग करनेमें असमर्थ हैं। 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) उनका सौन्दर्य स्वयं उन्हींको विस्मयमें डाल देनेवाला है। यही भाव उस चित्रमें व्यक्त किया गया था, किंतु जिस प्रकार इस रहस्यको समझनेसे पूर्व हमें वह चित्र विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं जान पड़ता था, उसी प्रकार उस राजाको भी उस चित्रकारके लाये हुए चित्रमें कोई विशेषता नहीं जान पड़ी। तात्पर्य यह है कि वस्तु तो एक ही होती है; किंतु जो रसज्ञ हैं, उन्हें उसकी विशेष रसानुभूति होती है; अरसिकोंको तो आपातदृष्टिसे उसका कोई विशेष महत्त्व दिखायी नहीं देता। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भगवान्‌के सौन्दर्य-माधुर्यातिशयकी सबसे बड़ी रसज्ञा थीं; इसलिये उससे दीर्घकालमें भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती थी। वे कात्यायनी-पूजन और विविधविध व्रताचरणरूप तपस्या करके योगारूढ़ हुई थीं। उससे यदि उन्हें एक रात्रिके लिये ही भगवत्सान्निध्यकी प्राप्ति होती तो वह उन्हें किसी प्रकार सन्तुष्ट न कर सकता। उन्हें जो महान् फल प्राप्त होनेवाला था, वह तो पूर्ण ब्रह्मसंस्पर्श था और ब्रह्मसंस्पर्श ही पूर्ण योगारोहण है, किंतु यदि यह अल्पकालके लिये होता तो उससे कैसे तृप्ति हो सकती थी? अतः उन्हें उनकी तपस्याका पूर्ण फल प्रदान करनेके लिये भगवान्‌की योगमायाने एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया था। इसीसे 'इमाः क्षपाः' और 'ता रात्रीः' इन बहुवचनोंका प्रयोग किया गया है। वेदान्तका यह सिद्धान्त है कि अल्पकालमें अनन्त कालका और अल्प देशमें अनन्त देशका समावेश किया जा सकता है। स्वप्नमें हम देखते ही हैं कि एक क्षणमें ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव हो जाता है। योगवासिष्ठमें पाषाणोपाख्यानमें एक शिलाके भीतर ही ब्रह्माण्डका प्रदर्शन कराया गया है तथा राजा लवणके उपाख्यानमें भी दो-ढाई घड़ीके भीतर ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव कराया गया है। इसी प्रकार यहाँ भी प्रहरचतुष्टयवती एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया गया है, जिससे उनकी चिरकालीन भगवत्सम्भोग- लालसाकी पूर्णतया पूर्ति हो। भगवान्‌के आलिंगनका कितना महत्त्व है? इसका वर्णन हम कहाँतक कर सकते हैं। हनुमान्‌जीकी अद्भुत सेवाओंसे सन्तुष्ट होकर भगवान्‌ने कहा था— एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ (वा०रा० ७।४०।२३) अर्थात् हे कपे! मैं तुम्हारे एक-एक उपकारके बदले अपने प्राणोंका समर्पण कर सकता हूँ; फिर भी वे बचे ही रहेंगे और उनके लिये हमें ऋणी रहना पड़ेगा। उन्हीं हनुमान्‌जीको उन्होंने अपना अद्भुत आश्लेष प्रदान करते हुए कहा था— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) भक्तोंका सर्वस्वभूत यह भगवदाश्लेष वस्तुतः अत्यन्त दुर्लभ है। यह तो ब्रह्मा एवं सनकादिको भी प्राप्त होना कठिन है। इसीको ब्रह्मसंस्पर्श भी कहते हैं। किंतु यदि यह ब्रह्मसंस्पर्श बाह्यस्पशोंके समान क्षणिक ही हुआ तो इसमें विशेषता ही क्या हुई! भगवत्सम्मिलन कभी अस्थायी नहीं हुआ करता; भगवान्‌की प्राप्ति हो जानेपर तो फिर पुनरावृत्ति ही नहीं होती 'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥'

श्रीरामलीलारहस्य २१५ (गीता ८।१६) इसी दृष्टिसे भगवान्ने एक रात्रिमें प्राकृत पदार्थोंसे उनका रमण होना असम्भव है। जैसे ही अनन्त ब्राह्म रात्रियोंका समावेश करके उन्हें वृन्दावन भगवद्रूप है, वैसे ही वहाँकी रात्रियाँ भी अगणित रात्रियोंका अनुभव कराया। भगवद्रूपा हैं। ‘रात्री:’ शब्दका अर्थ निशा तो है ही, किंतु वे रात्रियाँ कैसी हैं? ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका:’ इसके सिवा इसका दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। (श्रीमद्भा० १०।२९।१) - शारदायामपि उत्फुल्लानि ‘रा दाने’ इस कोशके अनुसार ‘रा’ धातुका अर्थ मल्लिकोपलक्षितानि अशेषपुष्पाणि यासु ताः। ‘देना’ है, उसमें ‘तृन्’ प्रत्यय जोड़नेपर ‘रात्री’ शब्द अर्थात् शरत्कालमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त सिद्ध होता है, जिसका अर्थ ‘देनेवाली’ है। अर्थात् पुष्प खिले हुए हैं, वे रात्रियाँ। नियम तो ऐसा है कि गोपांगनाओंको अभीष्ट भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका सौन्दर्य- कई तरहके पुष्प दिनमें खिलते हैं, कई रात्रिमें तथा समास्वादन, उसे देनेवाली रात्रियाँ। ‘रात्री:’ शब्दके कई ग्रीष्ममें खिलते हैं और कई शरद्-ऋतुमें। किंतु पहले जो ‘ता:’ विशेषण है, वह उन रात्रियोंकी उस शरद्-ऋतुकी रात्रिमें सभी पुष्प अपने नियमोंको विलक्षणता द्योतित करता है। ‘ता: रात्री:’ अर्थात् छोड़कर खिल गये थे। इसी प्रकार चित्रकूटपर जिनके चरणोंका आश्रय लेनेवाले योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भगवान् रामके निवास करते समय वहाँके फलोंने भी अपने अभीष्ट तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उन्हीं अपनी ऋतुओंका नियम छोड़ दिया था। श्रीगोसाईंजी गोपांगनाओंकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली होनेके महाराज कहते हैं- कारण वे रात्रियाँ विलक्षण थीं। सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥ ये दानशीला रात्रियाँ इसलिये अत्यन्त विलक्षण (रा०च०मा० ६।५।५) हैं; क्योंकि पात्र और देय के महत्त्वसे दानका महत्त्व उसी प्रकार इस समय मानो सभी पुष्पोंने यही होता है। श्रीव्रजांगना-जैसे सर्ववन्द्य पात्रोंके लिये निखिल सोचा था कि हमारी शोभा और सुगन्धकी सार्थकता रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णतत्त्वको प्रदान करनेवाली हैं और इसीमें है कि हम श्रीभगवान्की प्रसन्नता-सम्पादन श्रीकृष्ण-जैसे परमपावन पात्रके लिये उन श्रीवृषभानु- करनेमें समर्थ हो सकें। जहाँ सारी प्रकृति अपनी नन्दिनीको प्रदान किया, जिनके लिये श्रीकृष्ण उत्सुक प्रजाओंके साथ प्रभुकी सेवामें उपस्थित होना चाहती और लालायित थे। अन्न, वस्त्र, रत्न, भूमि आदि समस्त है, वहाँ ये पुष्पादि उद्दीपन विभाव भी प्रभुकी दानोंसे ब्रह्मदान सर्वोत्कृष्ट है, समस्त पात्रोंमें ब्रह्मवित् प्रसन्नता-सम्पादन करनेको उत्सुक हो रहे हैं। अतः ही सर्वश्रेष्ठ पात्र है। इसके सिवा जो अधिकारी भी हो मानो अपनी सार्थकताके लिये ही वे भावोद्दीपनमें और जिसके लिये लालायित हो, उसके लिये उस सहायक हो रहे हैं। वस्तुका दान बहुत प्रशस्त होता है। यहाँ व्रजांगना ऐसी रात्रियोंको देखकर भगवान्ने रमण करनेको सर्वोत्कृष्ट पात्र हैं और श्रीकृष्ण-रसके लिये उत्कण्ठित मन किया अर्थात् उचित काल और उद्दीपन-सामग्री हैं। अतः उन्हें श्रीकृष्ण-जैसे दिव्य-रसका प्रदान करनेवाली देखकर ही भगवान्ने अपनी प्रियतमाओंके साथ रमण वे रात्रियाँ धन्य हैं। उनसे भी उत्कृष्ट पात्र सर्वाराध्य श्रीकृष्ण करनेके लिये उनका स्मरण किया। यहाँ ‘वीक्ष्य’ हैं और वे श्रीरासेश्वरी-सम्मिलनके लिये लालायित भी शब्दसे साभिलाष दर्शन अभिप्रेत है; क्योंकि ये सब हैं। अतः उनके लिये भी यह दान महत्त्वका है। सामग्रियाँ भावोद्दीपन करनेवाली थीं। अतः इसका ‘ता:’ का तात्पर्य ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवद्रूपा यह तात्पर्य भी हो सकता है- ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका भी हो सकता है; क्योंकि भगवान्‌का रमण और रात्री: ताश्च वीक्ष्य।' अर्थात् शरदोत्फुल्लमल्लिका रमणसामग्री जो कुछ भी होगा, अप्राकृत ही होगा; रात्रियोंको और उन्हींके द्वारा प्रियतमा गोपांगनाओंको

२१६ भक्तिसुधा देखकर (उन्होंने रमण करनेको मन किया)। घटका वाचक 'घट' शब्द भी मूलतः उसके कारण 'ताः' अर्थात् 'स्वस्वरूपभूता व्रजाङ्गनाः।' मृत्तिकाका ही बोधन करता है। इसी प्रकार जितने इनके दो भेद हैं-एक तो वे जो नित्यसिद्धा हैं शब्द हैं, वे सब अपने अभिधेय विभिन्न पदार्थोंके मूल और दूसरी वे जो भृङ्गीकीट-न्यायसे भगवद्रूपा हो कारण परब्रह्मके ही वाचक हैं। अतः अवान्तर गयी थीं। जिस प्रकार कीट भृङ्गीसे व्यतिरिक्त होनेपर श्रुतियोंका भी मुख्य तात्पर्य तो परब्रह्ममें ही है। भी भावनातिशयके कारण भृङ्गीरूप हो जाता है, विचार किया जाय तो वस्तुतः वाच्य-वाचकका भेद उसी प्रकार ये गोपांगनाएँ स्वरूपतः भगवान्‌से भिन्न भी नहीं है। ये दोनों भी एक ही चेतनके विवर्त हैं। होनेपर भी अनुरागातिशयके कारण भगवद्रूपा हो अभिधेय-प्रपञ्चजननानुकूल शक्त्यवच्छिन्न चेतनका गयी थीं। वे कहाँ थीं? 'मनःसमुपस्थितः मनसो विवर्त अभिधेय है और अभिधानात्मक-प्रपञ्चजननानुकूल गोचरीभूताः' अर्थात् वे भगवान्‌की मानसिक दृष्टिके शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधान है। जिस सामने थीं! उन्हें दयार्द्र दृष्टिसे देखकर भगवान्‌ने प्रकार एक ही समुद्रमें अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो रमणकी इच्छा की। जाती हैं, उसी प्रकार एक ही परब्रह्ममें अभिधान- इसके सिवा 'ताः' शब्द बहुवचनान्त होनेके अभिधेयरूप अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो गयी हैं। किंतु कारण 'तत्' पदसे निर्दिष्ट होनेयोग्य अनन्त पदार्थोंका 'तद्भिन्नभिन्नस्य तद्भिन्नत्वनियमात्' इस न्यायके वाचक हो सकता है। हम 'ताश्च ताश्च ताश्च अनुसार तरंगाभिन्न समुद्रके साथ तरंगोंका अभेद ताः' इस प्रकार 'ताः' पदसे कही जानेवाली तीन होनेके कारण उनका आपसमें भी अभेद है। प्रकारकी गोपांगनाओंका विचार करते हैं। इनमें पहले यह बात तो तरंगसे तरंगान्तरके अभेदकी रही, 'ताः' से श्रुतिरूपा मुनिचरी और अन्य समस्त किंतु मूल दृष्टिसे तो अभिधानात्मक तरंग जिस साधनसिद्धा गोपांगनाएँ कही गयी हैं। समुद्रमें है, लक्षणा-वृत्तिसे वह उस समुद्रका ही उनमें भी जो श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ वाच्य- बोधन करती है; हाँ, तरंगान्तरको वह अभिधावृत्तिसे वाचकके अभेद रूपसे ब्रह्मरूपा ही हैं, वे दूसरे 'ताः' बोधित करती है; क्योंकि किसीकी भी शक्ति अपने से ग्रहण की जाती हैं। ॐकार मूलवाचक है, उसका शक्यमें ही सफल हुआ करती है, अपने कारणमें नहीं वाच्य परब्रह्म है। समस्त वाङ्मय ॐकारका विकार होती। दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि शक्तियोंवाला है और सारा प्रपंच ब्रह्मका कार्य है। अतः ॐकारका अग्नि अपने दाह्य काष्ठादिको ही दग्ध कर सकता विकारभूत समस्त वाङ्मय ब्रह्मके कार्यभूत सम्पूर्ण है, अपने स्वरूपभूत अग्निका दहन नहीं कर सकता। प्रपंचका वाचक है। वाच्य और वाचकका अभेद किंतु मूल रूपसे तो तरंगें समुद्रसे भिन्न नहीं हैं। हुआ करता है; इसलिये समस्त वाङ्मय भी वस्तुतः यद्यपि यह दूसरी बात है कि 'अकारो वै सर्वा ब्रह्मरूप ही है। वाक्' इस श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण वाङ्मय-प्रपंचका इसके सिवा श्रुतियोंके अवान्तर तात्पर्य अन्य अकारमें और अकारका उकारमें और उकारका होनेपर भी उनका प्रधान तात्पर्य तो ब्रह्ममें ही है। मकारमें तथा उसके पश्चात् सम्पूर्ण प्रपंचका तुरीयमें शब्दसे दो बातोंका बोध हुआ करता है-जाति और लय होता है। व्यक्ति। त्वतलादि प्रत्ययवेद्य जाति भावरूप ही होती तात्पर्य यही है कि अभिधानात्मिकता श्रुतियाँ है। 'तस्य भावस्त्वतलौ' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार अनन्त चैतन्यान्दसुधासिन्धुकी तरंगोंके समान हैं घटकी भावरूप जाति ही घटत्व है, वह वस्तुतः एक और वे अभिधेयरूप उसकी अन्य तरंगोंके साथ भाव-विशेषमें स्थित मृत्तिका ही है। इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होकर प्रकाशित होती हैं; क्योंकि

अभिधेय अर्थ उनके शक्य हैं। श्रुतियाँ अपने उद्गमस्थलभूत परमतत्त्वका तो लक्षणसे ही बोध कराती हैं। यद्यपि किसी दृष्टिसे 'घट' शब्दका वाच्य घटाकारमें परिणत मृत्तिका भी हो सकता है तथापि लोकमें 'घट' पदका वाच्य घट व्यक्ति ही समझा जाता है। इसी प्रकार अभिधानात्मक ब्रह्मतरंगका वाच्य अभिधेयात्मक ब्रह्मतरंग हैं; परंतु है लक्षणसे। फिर मीमांसकोंने तो जातिमें ही शक्ति मानी है; जाति घटत्वादिको कहते हैं, जिसे घटभाव भी कहा जा सकता है। घट कार्य है; कार्यका भाव कारणसे व्यतिरिक्त नहीं हुआ करता, समस्त कार्योंका भाव कारणमें ही पर्यवसित होता है। अतः समस्त शब्दोंकी वाच्यताका पर्यवसान कारणपरम्परा-क्रमसे सन्मात्रमें ही होता है। इसलिये सारे शब्दोंका वाच्य परमात्मा ही है। इस प्रकार वाच्य-वाचकका अभेद है और समस्त श्रुतियाँ तत्पदार्थसे अभिन्न ही हैं। अतः यहाँ 'ता:' शब्दसे सभी श्रुतियाँ ग्रहण की जाती हैं। श्रुतियाँ दो प्रकारकी हैं—अन्यपरा और अनन्यपरा। अनन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जो साक्षात् रूपसे परब्रह्ममें पर्यवसित होती हैं—जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) तथा अन्यपरा श्रुतियाँ वे हैं, जिनका साक्षात् तात्पर्य तो देवतादिमें है, किंतु परम्परासे उनका महातात्पर्य परब्रह्ममें ही होता है। जैसे 'इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा' इत्यादि। उन्हें ही ऊढा और अनूढा अथवा अन्यपूर्विका और अनन्यपूर्विका भी कह सकते हैं। अर्थात् एक तो वे गोपियाँ, जो केवल कृष्णपरायण हैं और दूसरी वे जो श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य पुरुषोंके साथ विवाही गयी हैं। इनके ये दो भेद भी प्रतीतिमात्रके लिये हैं, वास्तविक नहीं। वरुणादि देवताओंमें श्रुतियोंका तात्पर्य तभीतक जान पड़ता है, जबतक 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५)—इस वाक्यके अनुसार उनका महातात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही नहीं जान पड़ता। वास्तवमें तो जिस प्रकार तरंगें समुद्रसे भिन्न नहीं हैं और घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार उपक्रम-उपसंहारादि षड्विध लिंगसे समस्त श्रुतियोंका तात्पर्य ब्रह्ममें ही है। किंतु फिर भी लीलाविशेषके विकासार्थ वस्तुतः अनन्यपरा श्रुतियोंमें भी अन्यपरत्वकी प्रतीति होती है; अन्यथा यदि भगवान्‌को झगड़ा मचाकर आनन्द लेना न होता तो ऐसे अस्पष्ट शब्दोंमें अपने स्वरूपका वर्णन क्यों करते ? सीधे-सीधे अपना तात्पर्य व्यक्त कर देते। इससे मालूम होता है कि यह सब भगवान्‌की लीला ही थी। इसीसे कोई उन्हें निर्गुण मानते हैं, कोई सगुण मानते हैं, कोई निर्गुण-सगुण उभयरूप मानते हैं और कोई नहीं भी मानते तथापि इन विविध मन्तव्योंमेंसे किसीसे भी भगवान् क्षुब्ध नहीं होते। इसीसे कहा है— यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै विवादसंवादभुवो भवन्ति। कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने ॥ (श्रीमद्भा० ६।४।३१) अर्थात् जिन भगवान्‌की अनन्त शक्तियाँ समस्त वादियोंकी बुद्धियोंकी आश्रय होती हैं—क्योंकि सम्पूर्ण विरुद्ध भावोंके आस्पद भगवान् ही तो हैं—उन्हें भावुक लोग नमस्कार करते हैं। इस प्रकार भगवान् स्वरूपसे भी अनेक रूपोंमें आविर्भूत होते हैं और अनेक शब्दरूपसे भी प्रकट होते हैं। यह सब भगवान्‌की लीला ही है। 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्॥' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) एकका अनेकत्व, निष्प्रपंचका प्रपंचरूपत्व उनका खेल ही है, परंतु यह खेल निरर्थक नहीं है। प्रत्येक लीला, करनेवालेके तो विनोदार्थ ही होती है; अतः यह भगवल्लीला भी भगवान्‌के तो विनोदार्थ ही है, परंतु अन्य जीवोंके लिये यह उनके कल्याणका साधन है। वे अनेकविध शब्दोंसे अपने ही विभिन्न रूपोंका बोध कराते हैं। सब जीवोंका एक-सा अधिकार नहीं है। कोई सकाम कर्मके अधिकारी हैं, कोई निष्काम कर्म करनेयोग्य हैं, किन्हींको भगवान्‌के सगुणरूपकी ही

२१८ भक्तिसुधा

उपासना करनी चाहिये, कोई निर्गुणोपासनामें प्रवृत्त हो सकते हैं और कोई अभेदचिन्तनके अधिकारी हैं। अपने-अपने अधिकारानुसार ये सब भगवान्‌का ही भजन करनेवाले हैं। सब लोगोंकी गति निष्प्रपंच ब्रह्ममें ही नहीं हो सकती। अतः भगवत्साक्षात्कारके लिये क्रमशः इन सभी सोपानोंका अतिक्रमण करना होता है। यद्यपि यह बात अपने अधीन ही है कि हम कर्म न करें, परंतु ऐसे कितने आदमी हैं, जो बिना कर्म किये रह सकते हों ? यही बात मनके विषयमें भी है। यद्यपि सभी चाहते हैं कि मन निस्पन्द हो जाय और उसकी निस्पन्दता है भी अपने ही अधीन तथापि इसमें सफलता पानेवाले कितने लोग हैं ? अतः सब जीवोंके यथायोग्य साधनकी व्यवस्था करनेके लिये ही भगवान् प्रपंचाकारमें परिणत हो जाते हैं। यही उनकी प्राप्तिका क्रम है। इस क्रमसे बढ़ते-बढ़ते जबतक जीव निष्प्रपंच ब्रह्ममें परिनिष्ठित नहीं होता, तबतक उसे कृतार्थता नहीं हो सकती। यहाँ यह प्रश्न होता है कि भगवान्‌ने प्रपंचकी रचना की ही क्यों ? इसपर हमें यही कहना है कि आरोप होनेपर ही उसके अधिष्ठानका अनुसन्धान किया जाता है। अधिष्ठान है, इसलिये आरोपकी कल्पना नहीं की जाती, जैसे कि कहा है— ‘सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः ।’ जिस प्रकार यदि मृत्तिका है तो यह नहीं कह सकते कि घट बनना ही चाहिये; हाँ, घड़ेको देखकर उसकी कारणभूता मृत्तिकाका अनुमान अवश्य किया जाता है। कार्य तो कारणका व्यभिचारी हो सकता है, किंतु कारण कार्यका व्यभिचारी नहीं होता। अतः हम प्रपंचरूप कार्यकी अपेक्षासे उसके कारणभूत परब्रह्मका निश्चय करते हैं; परब्रह्मके प्रपंच-निर्माणके प्रयोजनका अनुमान नहीं कर सकते। इसी प्रश्नके उत्तरमें यह विचार भी आ जाता है कि कार्यमें कारणके सर्वांशकी अनुवृत्ति नहीं हुआ करती। जिस प्रकार मालामें सर्पका अध्यास होनेपर जो ‘अयं सर्पः’ ऐसा बोध होता है, उस समय उसमें मालाके आकार एवं इदमंशका तो अनुवेध होता है, किंतु बहुमूल्यत्वका अनुवेध नहीं होता। इसके सिवा इसका दूसरा न्याय यह भी हो सकता है— विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत्। समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् ॥ अर्थात् विषय (अधिष्ठान)-के रूपसे ही अध्यस्त पदार्थ रूपित होता है, किंतु उसके सभी गुणोंकी उसमें अनुवृत्ति नहीं होती। इसी प्रकार सम्पूर्ण प्रपंचका महाकारण जो परब्रह्म है, वह सच्चिदानन्द- स्वरूप है। उसके सत् और चिदंशकी तो समस्त पदार्थोंमें अनुवृत्ति होती देखी गयी है; परंतु आनन्दांशका सर्वत्र अनुवेध नहीं होता। इस प्रकार क्योंकि लीलाविशेषके लिये भगवान् ही प्रपंचरूपसे स्थित हुए हैं, भिन्न श्रुतियाँ भी उन्हींके विभिन्न रूपोंका प्रतिपादन करती हैं। कई श्रुतियाँ भगवान्‌के निर्विशेषरूपका प्रतिपादन करनेवाली हैं— ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्’ (कठ० १।३।१५) और कई उनके सविशेषरूपका प्रतिपादन करती हैं, जैसे— ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः ।’ (मुण्ड० २।१।४) —इत्यादि। और कोई अन्नमयरूपसे उन्हींका प्रतिपादन करती हैं—जैसे ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’ (तैत्तिरीय० ३।२) इसी प्रकार और भी सब श्रुतियाँ भिन्न-भिन्न रूपसे एक ब्रह्मका ही प्रतिपादन करती हैं। परंतु एक ही वस्तुमें—एक ही सत्तामें अनेक विकल्पोंका होना सम्भव नहीं है। क्रियामें तो विकल्प होना बहुत सम्भव है, जैसे हम घोड़ेपर चढ़कर जा भी सकते हैं और नहीं भी जा सकते; परंतु वस्तुमें ऐसा भेद नहीं हो सकता। अतः एक ही ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी, यह सत्ताभेदसे तो माना जा सकता है; परंतु एक सत्तामें ऐसा होना सम्भव नहीं है; जिस प्रकार एक ही मृत्तिका उपाधिभेदसे तो घट,

श्रीरासलीलारहस्य २१९

शराब और कूँडा आदि भेदवती प्रतीत होती है; परंतु निरुपाधिक रूपसे उसमें कोई भेद नहीं है। अतः श्रुतियोंका परम तात्पर्य भले ही एक ही वस्तुमें हो, किंतु उनका अवान्तर तात्पर्य तो अन्यमें ही हो सकता है। इन अवान्तर तात्पर्योंको लेकर ही सारे वाद- विवाद होते हैं, परंतु इससे भी कोई हानि नहीं है; क्योंकि उन विभिन्न अर्थोंका भी महातात्पर्य तो एकमात्र भगवान्में ही है। अतः जो लोग अत्यन्त अश्रद्धालु हैं, उनका ईश्वरखण्डन भी अच्छा ही है; क्योंकि उस अवस्थामें भी वे खण्डनात्मक रूपसे भगवान्का ही चिन्तन करेंगे। भगवान् तो ऐसे कृपालु हैं कि 'भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।' (रा०च०मा० १।२८।१) किसी प्रकार उनका चिन्तन किया जाय, वे कृपा ही करते हैं। इसीलिये शिशुपाल और कंसादिको भी अन्तमें भगवद्धामकी ही प्राप्ति हुई बतलायी गयी है। किंतु वेनकी अधोगति हुई, क्योंकि उसका भगवान्के प्रति वैर भी नहीं था। उसकी तो उपेक्षादृष्टि थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि शास्त्रमें सभी प्रकारके अधिकारियोंके उद्धारका साधन विद्यमान है। यहाँतक कि श्रुतिमें नास्तिकवादका मूल भी मिलता है; यथा— 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत।' (छान्दोग्य० ६।२।१) कहीं-कहीं 'असत्' शब्दका अर्थ 'अव्यवहार्य' भी है। जैसे—कहते हैं कि मिट्टीमें घट नहीं है; क्योंकि यद्यपि उसमें कारणरूपसे घट है तथापि अव्यवहार्य होनेके कारण उसे असत् कहा जाता है। किंतु यहाँ तो 'असत्' का तात्पर्य शून्यमें ही है; क्योंकि आगे—'कथमसतः सज्जायेत।' (छान्दोग्य० ६।२।२) ऐसा कहकर उसका खण्डन कर दिया गया है। अतः जिस प्रकार भगवान् ही अनेक रूपसे प्रकट होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही लीलाविशेषके विकासार्थ अन्य- पूर्विकात्वकी प्रतीति होती थी। भगवान् तो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा हैं। उनके साथ प्राकृत प्राणियोंका संसर्ग कैसे हो सकता था? अतः ये सब व्रजांगनाएँ स्वरूपतः तो सच्चिदानन्दरूपा ही थीं। पहले यह भी बतलाया जा चुका है कि अभिधानरूपा श्रुतियाँ और अभिधेयरूप देवता ये सभी वस्तुतः एक ही हैं, परंतु मूलतः अभिन्न होनेपर भी साधकोंके कल्याणार्थ भगवान्को शब्दका आविर्भाव करना ही पड़ता है; अन्यथा महाप्रलयमें भी भगवान्ने जीवोंको मुक्त क्यों नहीं कर दिया? इसका कारण यही था कि वहाँ कल्याणकारिणी सामग्रीका अभाव था। अतः परम दयालु और करुणामय होनेपर भी भगवान् कल्याणका क्रम रखते हैं। यदि उन पापी, पुण्यात्मा सभीका अक्रमसे उद्धार कर दिया करते तो बात ही बिगड़ जाती। अतः प्रपंचके मूलभूत अनादि अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उन्होंने सभी प्रकारके वाक्योंका आविर्भाव किया है। श्रुतिरूप अभिधान और उनका लक्ष्य ब्रह्म, ये ऐसे ही हैं, जैसे तरंग और समुद्र। यह तरंग और समुद्ररूप भेद इसीलिये है कि इसके बिना उनका ऐक्यबोध नहीं हो सकता। यदि भेद न हो तो लक्षण कैसे बने? जीव अपने अनादि अज्ञानका निवारण तभी कर सकता है, जब वह परब्रह्मके साथ उसके कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंचका अभेद अनुभव करे और उस भेदका निवारण महावाक्यरूपसे उत्पन्न होनेवाले बोधके द्वारा ही हो सकता है। किंतु सब लोग आरम्भमें ही उस अभेदका अनुभव नहीं कर सकते। अतः उस योग्यताकी प्राप्तिके लिये अन्यपरा श्रुतियोंद्वारा अन्यान्य पदार्थोंका निरूपण किया गया है। वास्तवमें तो समस्त श्रुतियाँ और उनके प्रतिपाद्य भी अनन्य ही हैं। यहाँ व्रजांगनाओंमें अनन्यपरा श्रुतियाँ ही अनूढा हैं और अन्यपरा ही ऊढा हैं। परंतु जिस समय 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इस सिद्धान्तका निश्चय हो जायगा, उस समय यही निश्चय होगा कि वस्तुतः ब्रह्मपरमें ही लीलावश

२२० भक्तिसुधा अब्रह्मपरत्वकी प्रतीति हुआ करती है। अतः गोपियोंका दूसरे गोपोंके साथ ब्याहा जाना भी केवल विभ्रम ही है। वस्तुतः उनके परमपति तो एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही थे। उनका अन्यपूर्विकात्व तभीतक अनिवार्य रहेगा, जबतक भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वात्मकता सुनिश्चित नहीं होगी। परंतु इस बातका निश्चय भी शास्त्राधारपर ही हो सकेगा; अन्यथा साधारण पुरुषोंको तो अविचारवश रासक्रीड़ामें व्यभिचारकी ही गन्ध आयेगी। परंतु श्रीमद्भागवतमें तो कहा है कि जिन गोपोंकी स्त्रियाँ रासक्रीड़ामें सम्मिलित हुई थीं, उन्होंने भी उन्हें अपने पास ही देखा—'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥' (श्रीमद्भा० १०। ३३।३८) यदि कहा जाय कि यह उनकी भ्रान्ति थी तो हम कहते हैं कि गोपोंको उनके पत्नीत्वकी ही भ्रान्ति क्यों न मानी जाय। यह प्रसंग तो श्रीमद्भागवतमें आता ही है कि एक वर्षके लिये सर्वथा भगवान् ही गोपाल और वत्सरूप हो गये थे। सम्भव है, ये व्रजांगनाओंके पति गोपरूप गोविन्द ही हों। रासलीलाका प्रयोजन अतः सिद्ध हुआ कि यह अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही अन्यपूर्विकात्वकी प्रतीति थी, जिस प्रकार कि अनन्यपरा श्रुतियोंमें ही अन्यपरत्वकी प्रतीति होती है। यहाँ जिस तरह प्रपंच-रचनामें दो हेतु बतलाये गये हैं—एक तो भगवान्‌की लीला और दूसरा जीवोंको कल्याणके साधन प्राप्त कराना, उसी प्रकार इस रासलीलाके भी दो ही प्रयोजन थे। प्रथम तो भगवान्‌की यह लीला प्रेमरसके विकासके लिये थी। यहाँ एक ही तत्त्व भगवान् श्रीकृष्ण और गोपीरूपसे आविर्भूत हुआ है। यह प्रेमलीला थी, इसलिये यहाँ उसे नायक और नायिकारूपमें परिणत होनेकी आवश्यकता थी; क्योंकि प्रेमका मुख्य आलम्बन नायकके लिये नायिका है और नायिकाके लिये नायक। साहित्यशास्त्रमें शृंगाररस सबसे उत्कृष्ट माना गया है। वस्तुतः उसके द्वारा परमानन्दकी जैसी स्फुट स्फूर्ति होती है, वैसी और किसी रससे नहीं होती। शृंगार अथवा प्रेमरस स्वतः निर्विशेष है। जिस समय उसका आलम्बन भगवान् होते हैं तो वह परम पवित्र प्रेम माना जाता है और जिस समय उसका आलम्बन अस्थि-मांसमय नायक या नायिका होते हैं तो अत्यन्त अधोगतिमूलक काम कहते हैं। किंतु यहाँ नायक-नायिकारूपमें भी शुद्ध सच्चिदानन्दघन ही हैं। अतः रसवृद्धिके साथ यहाँ निकृष्ट आलम्बनजनित मलिनताकी तनिक भी सम्भावना नहीं है। इन नायिकाओंमें जो अनन्यपूर्विका थीं, उन्हें स्वकीया कहा गया है और जो अन्यपूर्विका थीं, उन्हें परकीया। स्वकीया नायिकाको नायकका सहवास सुलभ होता है, किंतु परकीयामें स्नेहकी अधिकता रहती है। कई प्रकारकी लौकिक-वैदिक अड़चनोंके कारण वह स्वतन्त्रतापूर्वक अपने प्रियतमसे नहीं मिल सकती, इसलिये उस व्यवधानके समय उसके हृदयमें जो विरहाग्नि सुलगती रहती है, उससे उसके प्रेमकी निरन्तर अभिवृद्धि होती रहती है। इसीलिये कुछ महानुभावोंने स्वकीया नायिकाओंमें भी परकीया-भाव माना है; अर्थात् स्वकीया होनेपर भी उसका प्रेम परकीया नायिकाओंका-सा था। वस्तुतः तो सभी व्रजांगनाएँ स्वकीया ही थीं; क्योंकि उनके परमपति भगवान् श्रीकृष्ण ही थे; परंतु उनमेंसे कई अन्य पुरुषोंके साथ विवाहिता थीं और कई अविवाहिता। अतः स्वकीया-परकीया या ऊढ़ा और अनूढ़ा कहना उचित है। इस प्रकार प्रेमोत्कर्षके लिये ही भगवान्ने यह विलक्षण लीला की थी। इस लीलाका दूसरा प्रयोजन जीवोंका कल्याण है। यहाँ जो अनन्यपूर्विका नायिका हैं, उनका जो भगवान्‌के प्रति अतिशय अनुराग है, उससे होनेवाली लीला आगे चलकर लोगोंको ध्येय होगी। यह बात पहले कही जा चुकी है कि इस प्रकारकी काम- विजय-लीलाका चिन्तन करनेसे लोगोंको कामजयरूप फल प्राप्त होगा। इसके सिवा यह भी देखना है कि इस प्रकारके उपासकोंका ध्येय क्या होगा? भगवान्

श्रीकृष्ण या गोपियाँ? सो कोई नहीं, बल्कि उन दोनोंका जिस प्रेमपाशसे बन्धन है, वह प्रेमशृंखला ही उनकी ध्येय होगी; क्योंकि उसके अधीन तो वे दोनों ही हैं। जिस प्रकार यदि किसी ऊँट या बैलको पकड़ना होता है तो उसकी नकेल या नाथ ही पकड़ते हैं, उसी प्रकार इस प्रेम-बन्धनको पकड़नेसे श्रीकृष्ण और गोपियाँ दोनों ही स्वाधीन हो जायँगे। इसके सिवा इस लीलासे सर्वसाधारणको यह भी उपदेश मिलेगा कि इस प्रकारके नायक-नायिकाओंमें जैसा उत्कट स्नेह होता है, वैसा ही उन्हें भी अपने इष्टदेवोंके प्रति रखना चाहिये। इन व्रजांगनाओंमें जो अन्यपूर्विका हैं, उनसे यह उपदेश भी मिलता है कि जिस प्रकार वे लौकिक- वैदिक शृंखलाओंका विच्छेद करके भगवत्परायण रहती थीं, उसी प्रकार साधकोंको भी सारे व्यवधानोंको छोड़कर अपने ध्येयमें संलग्न होना चाहिये। साधारण पुरुषोंको इससे भगवान्‌की उदारता और करुणाका भी ज्ञान होता है। प्राणियोंमें सदा ही कोई-न-कोई त्रुटि तो रहा ही करती है। उस समय अपनी हीनताको देखकर अनाश्वास हो जाना स्वाभाविक ही है। जहाँ ऐसा नियम है कि प्राणी वैदिक एवं स्मार्त उपासना करके ही भगवान्‌को प्राप्त करनेकी योग्यता पा सकता है, वहाँ जो सर्वसाधनहीन स्थूलदर्शी लोग हैं, उन्हें ऐसी आशा होना कि भगवान् हमपर भी उन गोपांगनाओंके समान कृपा करेंगे, बहुत बड़ा आश्वासन है। आगे चलकर कहा है कि वे गोपियाँ जारभावसे भगवान्‌को प्राप्त हुईं—‘जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।’ (श्रीमद्भा० १०।२९।११) अहो! जो गोपांगनाएँ वैदिक और स्मार्त-शृंखलाओंका उल्लंघन करके भगवत्परायण हुईं और जिन भगवान्‌का सर्वथा शुद्ध- भावसे आश्रय लेना चाहिये था, उनका ऐसे दूषित भावसे आश्रय लिया, उन गोपांगनाओंका भी भगवान्‌ने कल्याण कर दिया। यह ऐसी ही बात हुई जैसे पूतनाने विषलिप्त स्तनपान कराकर भी परमपद प्राप्त किया। जिन भगवान्‌का सर्वस्व समर्पण करके अर्चन करना चाहिये था, उन्हें विषपान कराना महान् अपराध था तो भी विषयके माहात्म्यसे उसने सद्गति प्राप्त की। उसी प्रकार यद्यपि कामबुद्धिसे भगवान्‌का आश्रय लेना अत्यन्त अनुचित है; क्योंकि यह सोपाधिक प्रेम है—कामवासनाकी पूर्तितक ही रहनेवाला है—और भगवान्‌को सर्वभूतान्तरात्मा होनेके कारण निरुपाधिक प्रेमसे ही अभ्यर्चित होना चाहिये तथापि उनका परम हित ही हुआ। इसके सिवा इसमें एक दोष यह भी हो सकता था कि जो भगवान् उनके वास्तविक परमपति थे, उनमें तो उन्होंने जारबुद्धि की और जो अस्वाभाविक प्राकृत पति थे, उनमें पतिबुद्धि की। जिस प्रकार तरंगोंका मुख्य पति तो समुद्र ही है, तरङ्गान्तरोंसे तो उनका आगन्तुक-सम्बन्ध है, उसी प्रकार जीवका स्वाभाविक-सम्बन्ध तो अपने आश्रयभूत परब्रह्मसे ही है, अन्य जीवोंसे तो केवल आगन्तुक- सम्बन्ध है, इसलिये वह अनित्य भी है, अतः सर्वान्तर्यामी भगवान्‌का जारबुद्धिसे आश्रय लिया गया—यह भी एक बड़ा दोष था। ये सारे अनौचित्य ‘अपि’ शब्दसे सूचित होते हैं। किंतु ये सब दोष होनेपर भी भगवान्‌से सम्बन्धित होनेके कारण गुण हो गये। यह आलम्बनका ही माहात्म्य था। उस जारबुद्धिसे यह गुण हो गया कि जिस प्रकार जारके प्रति परकीया नायिकाका स्वकीयाकी अपेक्षा अधिक प्रेम होता है, वैसे ही उन्हें भी भगवान्‌के प्रति अतिशय प्रेम हुआ। अतः इससे उपासकोंको बड़ा आश्वासन मिलता है। इससे बहुत त्रुटिपूर्ण होनेपर भी उन्हें भगवत्कृपाकी आशा बनी रहती है और प्रेममार्गमें आशा बहुत बड़ा अवलम्बन है; क्योंकि जीव, आशा होनेपर ही प्रपन्न हो सकता है। इस प्रकार भगवान्‌ने अन्यपूर्विका और अनन्यपूर्विका दोनोंकी प्रवृत्ति अपनी ओर ही दिखलाकर प्रेममार्गको सबके लिये सुलभ कर दिया है। यह द्वितीय ‘ता:’ का तात्पर्य हुआ। अब तृतीय ‘ता:’ का अर्थ करते हैं। इस ‘ता:’ का अर्थ है ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवत्स्वरूपा।

पहले 'ताः' से तो वे गोपांगनाएँ विवक्षित थीं, जिनका भगवान्‌के साथ भृंगीकीट-न्यायसे साधनद्वारा अभेद हुआ था। दूसरे 'ताः' से वे गोपांगनाएँ कही गयीं जो समुद्र और तरंगके समान मूलतः अभिन्न थीं। यह समुद्र अचिन्त्यानन्द-सुधा-सिन्धु है। इससे एक तो तरंगोंका अभेद और दूसरा जैसे उसकी सुधासे सुधागत माधुर्यका अभेद। यह बहुत बड़ा अन्तर है। इस प्रकारकी स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ ही तीसरे 'ताः' से कही गयी हैं। जिस प्रकार जलमें मधुरता, शीतलता आदि कई गुण हैं, उसी प्रकार भगवान्‌में भी कई शक्तियाँ हैं। भगवान्‌की परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीवृष- भानुनन्दिनी और उन्हींकी अवान्तर विकासरूपा ललिता- विशाखा आदि तीसरे 'ताः' से अभिप्रेत हैं। उन श्रीवृषभानुनन्दिनीकी पदनख-चन्द्रिकाकी जो विभिन्न दीप्तियाँ हैं, उन्हींके अन्तर्गत ये ललिता-विशाखा आदि हैं। भगवान्‌की सर्वान्तरतम दिव्यातिदिव्य शक्ति तो श्रीराधिका ही हैं, उन्हींकी अंशभूता उनकी प्रधान सहचरी हैं। यद्यपि उनमें तारतम्य है तथापि वे हैं सब-की-सब परमान्तरंगा ही। यहाँ जो 'अपि' शब्द आया है, उसका अर्थ 'च', 'और' समझना चाहिये अर्थात् शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और उन त्रिविध गोपांगनाओंको देखकर भगवान्‌ने रमण करनेको मन किया। किंतु उन्होंने मन किया कैसे? इसपर कहते हैं कि स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म भगवान्‌ने आप्तकाम होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर मन बनाया। योगमायाका आश्रय लेनेसे क्या अभिप्राय है? 'योगाय स्वेन सह तासां संश्लेषाय या माया कृपा तामुपाश्रित्य' अर्थात् योग यानी अपने साथ संश्लेष करनेके लिये जो माया-कृपा, उसका आश्रय लेकर। यहाँ 'माया' शब्दका अर्थ कृपा है, 'माया कृपायां दम्भे च'। अतः कृपापरतन्त्र भगवान्‌ने स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म होकर भी केवल कृपावश मन किया। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि— 'युज्यते—सदा संश्लिष्यत इति योगा, महा- लक्ष्मीः परमान्तरङ्गशक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी, तस्या माया कृपा योगमाया, तामुपाश्रित्य।' अर्थात् जो युक्त यानी सदा संश्लिष्ट रहती हैं, वे परमान्तरंग-शक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी ही योगा हैं, उनकी माया—कृपा ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर रमणकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि अपनी कृपाके अधीन होकर नहीं, बल्कि जो श्रीवृषभानुसुताकी कृपापात्रभूता तथा उनके चरणकमल- मकरन्दका आस्वादन करनेवाली व्रजांगनाएँ हैं, उनकी प्रसन्नता-सम्पादन करनेके लिये ही भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि ऐसा करनेसे ही वे अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीको प्रसन्न कर सकते थे। जो मधुरभावके उपासक हैं, उनकी यह पद्धति है कि वे पहले अपने आचार्योंका आश्रय लेते हैं, फिर उनकेद्वारा गोपांगनाओंकी प्रसन्नताका लाभ करते हैं, उनकी प्रसन्नतासे उन्हें प्रधान-प्रधान यूथेश्वरियोंका प्रसाद प्राप्त होता है और तत्पश्चात् श्रीहरिकी चिरसंगिनी श्रीराधिकाजीकी कृपा होती है। इस प्रकार श्रीप्रियाजीके कृपापात्र होनेपर ही भगवान्‌का अनुग्रह होता है। इसमें यह भी भेद है कि शुद्ध परब्रह्मका पदार्थोंके साथ सम्बन्ध नहीं होता— 'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः यह मानना पड़ता है कि वृत्युपहित चेतन ही पदार्थोंका प्रकाशक होता है। यदि शुद्ध चेतन ही पदार्थोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता तो उसकी सत्ता तो सर्वत्र है; परंतु घटकुड्यादिमें पदार्थोंको प्रकाशित करनेका सामर्थ्य नहीं है। इसके सिवा चेतनकी सत्तामात्रसे ही पदार्थोंकी प्रतीति भी नहीं होती; क्योंकि चेतनका संश्लेष तो सन्निकृष्ट- असन्निकृष्ट सभी वस्तुओंके साथ है। परंतु प्रकाश केवल उन्हीं वस्तुओंका होता है, जिनके साथ प्रमाणजन्य-वृत्त्यभिव्यक्त चेतनका संसर्ग होता है। उसी प्रकार यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णका सम्बन्ध सभी व्रजांगनाओंसे है तथापि जिस प्रकार स्वप्रकाश चेतन अन्तःकरणादिवृत्युपहित होकर ही वस्तुओंके प्रकाशका

हेतु होता है, वैसे ही भगवान् भी अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीके कृपापात्रोंपर ही अनुग्रह करते हैं। जिस प्रकार मंगलमय सुधासिन्धुमें जो मधुरिमा है, वह उसका स्वरूप ही है, उसी प्रकार परमानन्दसिन्धु भगवान्‌की जो आह्लादिनी-शक्ति है, वह भगवान्‌से अभिन्न ही है। जिस प्रकार घटादिका प्रकाश अन्तःकरण- वृत्युपहित चेतनसे ही होता है, किंतु अन्तःकरणके प्रकाशके लिये किसी अन्य अन्तःकरणकी आवश्यकता नहीं होती तथा अन्तःकरणादि तो स्वतन्त्रतासे चेतनके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर सकते हैं, किंतु घटादि अन्तःकरणवृत्युपहित होनेपर ही उसका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर सकते हैं, उसी प्रकार यहाँ जो वृषभानुनन्दिनी हैं, वे तो परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके साथ निरपेक्षभावसे असाधारण रमणरूप सम्बन्धका भोग कर सकती हैं, किंतु अन्य गोपांगनाएँ ऐसा नहीं कर सकतीं। अतः उनमें भी भगवान्‌का सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये श्रीवृषभानुदुलारीका सम्बन्धसम्पादन करना पड़ता है। अतः पहले वे इनसे तन्मय हो लेती हैं, उसके पश्चात् भगवान्‌से सम्बन्ध प्राप्त करती हैं। इसीलिये योगमायाका आश्रय लिया। अथवा ‘योगाय सम्बन्धाय या माया वञ्चना तामुपाश्रितोऽपि ताः वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे’—योग जो असाधारण सम्बन्ध उसके लिये भी माया यानी वंचनाका आश्रय लेकर उन्होंने रमणके लिये मन किया। भगवान् रमणके लिये भी मायाका आश्रय लिया करते हैं। इसीसे जब ऋषि-पत्नियां गयी थीं, उस समय भी उन्होंने मायाका ही आश्रय लिया था, और उन्हें भी पातिव्रतका ही उपदेश किया था। किंतु भगवान् श्रीकृष्ण तो परब्रह्म हैं। उनका सम्बन्ध भला किसको अभीष्ट न होगा ? उनका संसर्ग ही तो परम कल्याण है। उसमें लौकिक भावोंका आरोप करना अर्थात् पारमार्थिक तत्त्वमें अपारमार्थिक भावोंका निवेश करना माया ही है। अतः ‘योगे सम्बन्धे या माया वञ्चना सा योगमाया’ ऐसा तात्पर्य समझना चाहिये। अथवा ‘अयोगमाया’ ऐसा पद मानें तो ‘अयोगाय असम्बन्धाय या माया वञ्चना सा अयोगमाया’ अयोग यानी असम्बन्धके लिये जो माया—वंचना, उसीका नाम अयोगमाया है अर्थात् अपने साथ सम्बन्ध न होने देनेके लिये जो माया है, उसका उन्होंने आश्रय लिया। ‘ताः वीक्ष्य’ वे जो पूर्वोक्त प्रकारकी गोपांगनाएँ थीं, जो इस प्रकार स्वस्वरूपानुसन्धानमें तत्पर थीं, उन्हें दयार्द्र-दृष्टिसे देखकर वंचनाको भूलकर उन्होंने रमण करनेके लिये मन किया। अथवा— ‘युज्यते इति योगा सदासंश्लिष्टरूपा या वृषभानुनन्दिनी तस्यां या माया कृपा तामाश्रित्य रन्तुं मनश्चक्रे।’ अपनी स्वस्वरूपभूता जो वृषभानुनन्दिनी उनकी प्रसन्नताके लिये रमण करनेको मन किया अर्थात् उन्हें जो रासाभिलाषा हुई, उसकी पूर्तिके लिये उन व्रजांगनाओंको देखकर रमण करनेकी इच्छा की। अथवा ‘न गच्छतीति अगा अगा चासौ मा इति अगमा, अगमायां उपाश्रितः यः स भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे’ अर्थात् जो अचला (नित्यसंगिनी) लक्ष्मीरूपा वृषभानुनन्दिनी हैं, उनमें अनुरक्त जो भगवान् उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह रासलीला श्रीराधिकाजीकी ही प्रसन्नताके लिये है। भावुकोंका ऐसा मत है कि भगवान्‌के जितने कृत्य हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनीकी प्रसन्नताके लिये हैं और श्रीवृषभानुसुताके जितने कृत्य हैं, वे श्रीहरिकी तुष्टिके लिये हैं। यहाँ जो अन्यान्य गोपांगनाएँ हैं, वे सब श्रीराधिकाजीकी ही अंशांशभूता हैं। यहाँ जो ‘अपि’ है, उसका तात्पर्य यह भी मालूम होता है कि व्रजदेवियोंको तो पहलेहीसे भगवान्‌के साथ रमणकी इच्छा थी। इस समय मानो परीक्षित्‌के चित्तमें इस बातका सन्ताप था कि अहो ! व्रजांगनाओंने कात्यायनी-अर्चनादि कठोर तपस्या करके भगवान्‌को प्रसन्न किया और भगवान्‌ने भी प्रसन्न होकर उन्हें अभीष्ट वर दिया; किंतु अब, जब

कि प्रेमातिशयके कारण भगवत्-सम्भोगकी प्रतीक्षाकमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगके समान हो रहा था, भगवान् क्यों उपेक्षा कर रहे थे? इस समय भगवान्‌की उदासीनता देखकर मानो महाराज परीक्षित् मन-ही-मन उनकी निन्दा कर रहे थे, इतनेहीमें श्रीशुकदेवजी कहने लगे—'भगवानपि ता रात्री:' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) अर्थात् व्रजांगनाएँ तो पहलेसे ही अभिलाषा रखती थीं; परंतु आज भगवान्‌ने भी उनके साथ तादात्म्यापत्तिरूप रमणकी इच्छा की। इससे यह भी सूचित होता है कि भगवान्‌की इच्छा भक्तोंकी भावनाका अनुसरण किया करती है। कहा भी है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ × × × × स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० ३।९।११; १०।१४।२) भावुक लोग अपनी-अपनी भावनामयी बुद्धिसे अरूप, अनाम, अप्रमेय परब्रह्मका जिस-जिस रूपसे ध्यान करते हैं, वैसा ही रूप भगवान्‌को धारण करना पड़ता है। इसीसे यद्यपि अभीतक भगवान्‌को रमणकी इच्छा नहीं थी तथापि गोपांगनाओंकी भावनाके अधीन होनेसे उनमें भी रमणेच्छाका प्रादुर्भाव हो गया। किंतु इन व्रजांगनाओंका भाव तो 'तत्सुखसुखित्व' है। इन्हें अपने सुखकी कुछ भी इच्छा नहीं है। संसारमें तो अपने सुखकी कामनासे ही सबसे प्रीति की जाती है—'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'। (बृहदारण्यक० २।४।५) तथापि गोपांगनाओंका प्रेम तो लोक तथा वेदसे अतीत ही है। अतः उन्हें अपने लिये भगवान्‌में प्रेम नहीं था, बल्कि वे तो भगवान्‌के लिये ही प्राण धारण करती थीं। उनका तो यही लक्ष्य था कि हे मनमोहन ! ये प्राण और देह आपके काम आते हैं, इसीसे हम इन्हें धारण करती हैं, नहीं तो हमें इनकी क्या आवश्यकता है? भगवान्‌का वियोग होनेपर भी उन्होंने इसीलिये अपने शरीरादिको रख छोड़ा था कि वे भगवत्सेवाके साधन थे। उनका कहना था कि श्रीकृष्णसे वियुक्त होकर भी जो हम जीवित हैं, इसका मुख्य कारण यही है कि हमारे प्राण हमारे अधीन नहीं हैं। विधाताने शरीर तो हमें दिया है; किंतु प्राण श्रीकृष्णके अधीन कर दिये हैं। उनका कथन था—'भवदायूषां नः' अर्थात् आप ही हमारी आयु हैं। अतः उनका जीवन भगवान्‌के सुखके लिये ही था। हाँ, उन्हें सुख पहुँचानेमें उनको भी सुख मिलता ही था। जो पुरुष भगवान्‌को सुगन्धित माला और पुष्प समर्पण करता है, उसे भी सान्निध्यवश उनका सुवास मिलता ही है। किंतु यह सुखानुभव आनुषंगिक है, उसमें अपना सुख अभिमत नहीं होता। इस प्रकार जैसे गोपांगनाएँ भगवान्‌के ही सुखमें सुख माननेवाली हैं, वैसे ही भगवान् भी उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये सारी लीलाएँ करते हैं। यह तो उनका पारस्परिक भाव है। किंतु इसका पर्यवसान कहाँ होता है? इस सम्बन्धमें कह सकते हैं कि वह लोककल्याणके ही लिये है। परंतु यदि वे दोनों ही निरपेक्ष हैं, दोनोंको ही आप्तकाम होनेके कारण सुखकी अपेक्षा नहीं है तो फिर यह लीला किसे सुख पहुँचानेके लिये है? ठीक है, सिद्धान्त भी यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण और गोपांगनाओंके रूपमें एक ही परमानन्द-सुधासिन्धु प्रस्फुटित हुआ है तो दोनों ही आप्तकाम हैं। इससे लीलाका कोई प्रयोजन ही नहीं रहता और लीला हुई ही थी, यहाँ यह भी प्रश्न हो सकता है कि यह विभाग ही क्यों हुआ? वस्तुतः यदि विचार किया जाय तो इसका प्रयोजन कुछ भी नहीं है, 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) यह विभाग केवल आत्मसुखके ही लिये है। किंतु यह विभाग चाहे लोककल्याणके लिये हो और चाहे 'एकाकी न रेमे'—अकेला रममाण नहीं

श्रीरासलीलारहस्य २२५

होता, इसलिये 'एकोऽहं बहु स्याम्' इस प्रकारके संकल्पपूर्वक हो तथापि जबतक लीला, लीलानायक और दर्शकोंको लीलामें आसक्ति न हो, तबतक तो लीला व्यर्थ ही है। माना कि यह त्रिविध विभाग एकमें ही हुआ है तथापि यह वह स्वस्वरूपमें ही परितृप्त है तो लीलाका कोई प्रयोजन ही सिद्ध नहीं होता। अतः यहाँ स्वस्वरूपभूत परमानन्दका आवरण अपेक्षित है। किंतु उसका आवरण करनेमें कौन समर्थ है? माया आवरण कर सकती है; परंतु भगवान्‌का आवरण करनेमें वह भी समर्थ नहीं है। अतः भगवान्‌के आश्रित रहनेवाली उनकी परमान्तरंगा मोहिनी शक्ति, जो कि अनिर्वचनीयतामें अन्य समस्त शक्तियोंके समान ही होनेपर भी शुद्धतामें उनसे उत्कृष्ट है, भगवान्‌के शुद्ध स्वरूपका आच्छादन करती है और उसीसे स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण हो जानेपर यह लीला और लीलापात्रोंकी कल्पना हो जाती है। जिस प्रकार स्वेच्छासे भाँग पीकर अपनेको मोहित किया जाता है, उसी प्रकार भगवान्‌का यह व्यामोहन भी स्वेच्छासे होता है। यदि इस प्रकार अपने स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण न होता तो अपनेसे भिन्न रमणसामग्रीकी अपेक्षा क्यों होती? अतः पहले आवरण हुआ, उससे अतृप्ति हुई और फिर लीला हुई। इसीसे उनकी चेष्टाएँ एक-दूसरेकी परितृप्ति करनेवाली हुईं। इसमें अन्योन्याश्रयदोष भी नहीं है, रमणकी भी व्यवस्था ठीक हो जाती है और 'अपि' शब्दका तात्पर्य भी बन जाता है। इस श्लोकका एक अर्थ यह भी हो सकता है—'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'—भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। किसलिये? 'ताः वीक्ष्य'— अज्ञानिजनरूपा जो प्रजा है, उसे देखकर उसका कल्याण करनेके लिये। वह प्रजा कैसी है—'रात्रीः'—रात्रिके समान अज्ञानरूप तमसे व्याप्त। ये सब प्रजाएँ अनादि हैं; अतः भगवान्‌का रमण उनके कल्याणके ही लिये है। इसके सिवा वह प्रजा 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) भी है— शरदायां जाड्यमय्यां व्यवहारभूमौ उत्फुल्लमल्लिकास्विव सुखबुद्धयः॥ अर्थात् सुखदुःखमोहात्मिका जो जाड्यमयी व्यवहारभूमि, जो कि उत्फुल्लमल्लिकाके समान आपात- रमणीय है, उसमें सुखबुद्धि करनेवाली। तात्पर्य यह है कि दुःखमयी व्यवहार-भूमिमें सुखबुद्धि करनेवाली प्रजाको स्नेहार्द्र-दृष्टिसे देखकर रमणकी इच्छा की; क्योंकि अज्ञानी प्रजाकी सुखदुःखमोहातीत परब्रह्ममें स्थिति होना अशक्य है। अतः जो प्राकृत लीलाएँ उनकी अभिरुचिके अनुकूल हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान्‌ने उन्हींके समान रमण करनेकी इच्छा की। इसलिये— 'अयोगमायामुपाश्रितः'—'अयोगेषु चित्त- निरोधादिनिःश्रेयससाधनशून्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'। अर्थात् योग—चित्तवृत्तिनिरोधादि निःश्रेयसके साधनोंसे शून्य जो प्रजा, उसपर जो कृपा, वही माया है। उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया; क्योंकि जो शुद्ध परब्रह्म अशेषविशेषशून्य है, उसका साक्षात्कार तो निरोधादिद्वारा ही किया जा सकता है। 'अयोगेषु सर्वथा अयोग्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'—जो प्राणी अत्यन्त निकृष्ट कोटिके हैं, उनके ऊपर जो कृपा, उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया। भगवान् पतितपावन हैं, इसीसे भावुक भक्त अपनेको सर्वसाधनशून्य देखकर भी भगवत्कृपाके भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। 'मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने॥' (विनय-पत्रिका १६०) अतः यह भगवान्‌की लीला मानो अत्यन्त अयोग्य पुरुषोंके ऊपर कृपा करनेके ही लिये है; क्योंकि भगवान्‌के जो वात्सल्य, माधुर्य एवं औदार्य आदि गुण हैं, उनकी सफलता तो बिना पतितोंके हो ही नहीं सकती। वस्तुतः उदारता और दीनवत्सलता ये सब तो इन्हीं अंशोंको लेकर होते हैं कि स्वयं परमोत्कृष्ट होकर भी अत्यन्त निम्नकोटिक पुरुषोंके

२२६ भक्तिसुधा साथ मिलकर उनके साथ पूर्ण आत्मीयताका बर्ताव करें। किंतु निर्विशेष परब्रह्म या गोलोकवासी भगवान्के साथ ऐसे पतितोंका सहवास कैसे हो सकता है ? वहाँ उन निकृष्टातिनिकृष्ट पुरुषोंके आत्मीय होकर भगवान् कैसे विहार कर सकते थे ? अथवा— 'अयोगेषु स्वस्मिन्नयुज्यमानेषु या माया कृपा तामुपाश्रितः।' जिनकी मनोवृत्ति स्वप्नमें भी भगवान्की ओर नहीं जाती, ऐसे अपनेमें अयुक्त पुरुषोंके प्रति जो माया—कृपा उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह लीला अत्यन्त साधन-शून्योंको भी अपनी ओर आकर्षित करनेवाली है। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये ही यह लीला की थी। निर्विशेष भगवान्में तो प्राकृत पुरुषोंकी वृत्ति पहुँचनी अत्यन्त कठिन है; इसीसे भगवान्ने यह लोकमनोभिरामा लीला की थी, जिससे विषयी और पशुप्राय जीवोंका चित्त भी भगवान्की ओर लग जाय। अहो! भगवान्का यह खेल कैसा मनोमोहक था! 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) उसे देखकर जो गतिमान् थे, उनमें निस्पन्दता आ जाती थी और वृक्षोंकी रोमावली खड़ी हो जाती थी। अर्थात् चेतन पदार्थोंमें जड़ता आ जाती थी और जड़ोंमें चेतनकी क्रिया होने लगती थी। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकृष्ट करनेके लिये ही अति अद्भुत मनोरम लीला की थी। ऐसा कहा जाता है कि प्राणियोंके पतनका जो प्रधान हेतु है, वह भगवद्विमुखता ही है तथा भगवदुन्मुखता ही सर्वानन्दका साधन है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ (श्रीमद्भा० ११।२।३७) अर्थात् जो पुरुष भगवान्से विमुख है, जो नामरूपक्रियात्मक प्रपंचमें ही आसक्त है, उसे ही भगवान्की मायासे मोहित होनेके कारण भगवद्विस्मृति हुआ करती है। स्वरूपविस्मृतिके पश्चात् विभ्रम होता है, जो असंग आत्मामें संगका, अकर्तामें कर्तृत्वका और एकमें अनेकत्वकी भ्रान्ति करा देता है। उस विभ्रमसे द्वैतबुद्धि होती है, द्वैतबुद्धिसे ही भय होता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि अनन्य बुद्धिसे उस पूर्ण परब्रह्म परमात्माका ही भजन करे। इससे माया इस प्रकार भाग जाती है, जैसे क्रुद्ध तपोधनोंके सामनेसे वेश्या। मायासे ही स्वरूपकी विस्मृति हुआ करती है और भगवदुन्मुख होनेपर वह भाग जाती है, तब स्वरूपसाक्षात्कार हो ही जाता है और फिर विभ्रमका उच्छेद हो जानेके कारण निर्भयताकी प्राप्ति हो जाती है। अतः भगवान्ने अज्ञानीरूपा प्रजाका उद्धार करनेके लिये ही यह मार्ग निकाला था; क्योंकि भगवान्की माया बड़ी प्रबल है, उससे वे ही बच सकते हैं, जो एकमात्र भगवान्का ही आश्रय लेते हैं। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) अतः भगवान्ने सर्वसाधनशून्य पामर प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही यह लीला की थी, जिससे कि किसी भी प्रकार उनका चित्त भगवान्में लगे। अथवा 'ताः' शब्दसे मुमुक्षुरूपा प्रजा समझनी चाहिये। उसपर कृपा करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की। वह मुमुक्षुरूपा प्रजा कैसी है ? 'रात्री:'— 'रा दाने' इस स्मृतिके अनुसार दान करनेवाली अर्थात् दानोपलक्षित यज्ञादि कर्म करनेवाली। जैसा कि कहा—'तमेतं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसा ब्रह्म विविदिषन्ति।' अथवा 'भगवति स्वरूपेण सह सर्वसमर्पयित्री' जो भगवान्में अपने स्वरूपके सहित सर्वस्व समर्पण करनेवाली है तथा जो 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' है।

श्रीरासलीलारहस्य २२७ 'शरादिवत् घ्नन्ति अवखण्डयन्ति उत्फुल्ल- मल्लिकाद्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासां ताः।' अर्थात् उत्फुल्लमल्लिकाओंके समान जो स्त्री- पुत्रादिरूप सांसारिक सुख हैं, वे शरादि अस्त्र- शस्त्रके समान जिनका खण्डन करती हैं, उन मुमुक्षुरूपा प्रजाओंको देखकर। इससे उन मुमुक्षुओंकी पूर्ण योग्यता दिखायी गयी है; क्योंकि पूर्ण मुमुक्षु तभी होता है, जब कि उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट सांसारिक सुख भी उसे दुःखरूप दिखायी देने लगे। वास्तवमें तो मुमुक्षुता होती ही उस समय है, जब संसार भयानक दिखायी देने लगे। उसे सांसारिक सुख शरादिके समान छेदन करनेवाले दिखलायी देते हैं, वही मुमुक्षु हो सकता है। ऐसी प्रजाओंको देखकर— 'योगमायामुपाश्रितः योगाय स्वेन सह सम्बन्धविच्छेदाय।' अपने साथ उनके असम्बन्धका छेदन करनेके लिये अर्थात् अपने साथ उनकी अभिन्नता स्थापित करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यहाँ केवल व्रजदेवियोंके साथ ही क्रीड़ा नहीं करनी थी, बल्कि श्रुतियोंका आवाहन करके उनका भी अपनेमें तात्पर्य दृढ़ करना था। भगवान्की यह लीला ओषधिरूपा होगी। जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंके लिये यह श्रोत्रमनोभिरामा है, वैसे ही मुमुक्षुओंके लिये यह भवौषधिरूपा है। अतः— 'ताः मुमुक्षुरूपाः प्रजाः वीक्ष्य, ताश्च श्रुतीः आहूय, ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उस मुमुक्षुरूपा प्रजाको देखकर और उन श्रुतियोंका भी आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् मुमुक्षुओंको संसारसे निर्विण्ण देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। मुमुक्षु लोग संसारसे निर्विण्ण क्यों हैं? इसका हेतु यह है—वे विशुद्धान्तःकरण हैं, इसलिये विवेकसम्पन्न हैं और विवेकीके लिये सब कुछ दुःखरूप ही है—'दुःखमेव सर्वं विवेकिनाम्'— उनके लिये संसारके सारे सुख भाले और बछियोंके समान हो जाते हैं। उनके उद्धारका उपाय क्या है? यही कि श्रुतियोंका परम तात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही निश्चित हो। किंतु पहले यह होता नहीं, अतः भगवान्ने उनका आह्वानकर अपनेमें उनका तात्पर्य दृढ़ किया। यहाँ जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने व्रजांगनाओंका आवाहन किया था, उसी प्रकार व्यासरूपसे उन्होंने ब्रह्मसूत्ररूप वेणुनादद्वारा समस्त श्रुतियोंका आवाहन करके उनका परम तात्पर्य परब्रह्ममें निश्चित किया है। गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। (रा०च०मा० १।१८) यहाँ 'अरथ' तो पूर्ण परब्रह्म परमात्मा है और 'शब्द' ये श्रुतियाँ हैं। अतः श्रुतियाँ तरंग हैं और ब्रह्म समुद्र है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ तरंग हैं और भगवान् श्रीकृष्ण समुद्र हैं। इनका परस्पर तादात्म्य-सम्बन्ध है। उन श्रुतियोंका आवाहनकर अर्थात् अपनेमें उनका तात्पर्य निश्चयकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भावुकोंकी दृष्टिसे एक और ही अर्थ होता है— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः 'अगमायाम् उपाश्रितः'—'न गच्छतीति अगा, अगा चासौ मा अगमा'। अर्थात् नित्यश्लिष्टा वृषभानुनन्दिनी। वह कौन है?—'यामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे', अर्थात् जिसका आश्रय लेकर भगवान्ने भी रमण करनेकी इच्छा की। क्यों इच्छा की? शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको देखकर। अथवा यों समझो— 'योगमायामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मन- श्चक्रे—योगाय अघटितघटनाय या माया इति योगमाया ताम उपाश्रितः।' अर्थात् जो माया अघटितघटनापटीयसी है, उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भगवान्को अपना ऐश्वर्य छिपाना था; क्योंकि यह मधुर लीला है, अतः इसमें ऐश्वर्यभाव

रसका विघातक है। इसमें प्राकृतांश ही अधिक उपयुक्त है। इसीसे भगवान्‌की जिन लीलाओंमें प्राकृतांश विशेष है उन्हींका महत्त्व भी अधिक है; क्योंकि प्राकृत व्यापारोंमें व्यासक्त प्राणियोंको आकर्षित करनेमें प्राकृतभाव अधिक उपयोगी है। अतः ‘योगमायामुपाश्रितः—योगमायां उप सामीप्येन आश्रितः, न तु साक्षात्'—सामीप्यवश योगमायाका आश्रय लेकर, साक्षात्रूपसे नहीं। जिस प्रकार स्वाभाविक होनेके कारण सूर्यभगवान् अपनी किरणोंका आश्रय लेते हैं। उन्हें किरणें धारण नहीं करनी पड़तीं, बल्कि जहाँ वे रहते हैं, वहाँ उनकी किरणें भी रहती ही हैं, इसी प्रकार भगवान्‌की योगमाया भी उनके साथ रहती ही है। अतः अघटनघटनमें समर्थ जो योगमाया, उसका सर्वथा समाश्रयण न करके भगवान्‌ने प्राकृतवत् लीलाएँ कीं, जिससे प्राकृत प्राणियोंका विशेष आकर्षण हो सके। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्‌की योगमाया सर्वदा उनके साथ रहती है, इसलिये हठात् अपना काम कर देती है। जब मिट्टी खानेके उपरान्त भगवान्‌ने श्रीयशोदाजीसे मुख देखनेको कहा तो उन्होंने यह नहीं समझा कि मैया सचमुच मेरा मुख देखेगी। वे यही समझते थे कि ऐसा कहनेसे मुझे निर्दोष समझकर वह छोड़ देगी। परंतु जब उसने कहा—‘दिखला' तो उनका मुख फैल गया।१ भगवान्‌ने मुख फैलाया नहीं, बल्कि जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे कमल खिल जाता है, उसी प्रकार माताके कोपरूप सूर्यका ताप पाकर भगवान्‌का मुखकमल खुल गया। उस समय योगमायाने देखा कि मुखमें मिट्टी देखकर माता हमारे प्रभुको मारेगी; इसीसे उसने उनके मुखमें सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया। इसी प्रकार इस लीलामें भी योगमाया कई ऐश्वर्यभाव दिखायेगी। अथवा भगवान्‌ने उन रात्रियोंको देखकर 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां योगमायां वंशीम्'—व्रजांगनाओंके योग-संश्लेषके लिये माय२ (शब्द) जिसमें रहते हैं, उस वंशीका नाम योगमाया है; उसका आश्रय करके भगवान्‌ने व्रजांगनाओंको बुलाकर रमणकी इच्छा की। यह उचित भी है; क्योंकि जिस प्रकार गिरिराजका आश्रय लेकर भगवान्‌ने इन्द्रके दर्पका दमन किया था, उसी प्रकार कन्दर्पदर्प-दमन इसके द्वारा होगा। वंशी क्या है? यह महारुद्र है और कामदेवके दर्पका दमन महारुद्र ही कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि अपने संसर्गद्वारा स्वस्वरूप बना लेनेपर ही किसीके साथ रमण हो सकता है। वस्तुतः भगवद्व्यतिरिक्त तो कोई पदार्थ है नहीं। भगवद्रूपमें ही भिन्नताकी प्रतीति हुआ करती है और भगवत्सम्बन्धसे ही उसकी निवृत्ति होकर भगवद्रूपताकी प्रतीति होती है। वह सम्बन्ध क्या है? व्यवधानकी निवृत्ति। व्यवधानकी निवृत्ति होते ही भगवान्‌से अभेद हो सकता है। अतः भगवान्‌ने वंशीध्वनिद्वारा अपनी अधरसुधाका संचार करके समस्त वृन्दारण्य और तद्वर्ती गुल्म, लता एवं गोपांगनादिको स्वस्वरूप बना दिया। इसीसे 'योगाय भगवत्संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां वंशीं उपाश्रितः'—योग अर्थात् भगवत्संश्लेषके लिये जिसमें माय अर्थात् शब्द है, उस वंशीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। मानो उस वंशीकी उपासना करके ही भगवान् व्रजांगनाओंके मनोंको आकर्षित करनेमें समर्थ हुए। ‘अपि' शब्दका आशय यही है कि यद्यपि था तो अनुचित तथापि भगवान्‌के सम्बन्धमात्रसे उचित ही हो गया; क्योंकि साधारणतया सभी कन्याओंका प्राथमिक सम्बन्ध गन्धर्व आदिके साथ होता है। चन्द्रमा तो वैसे सभीके मनके अधिष्ठाता हैं। मनकी आवश्यकता सभी सम्भोगोंमें है और मनको सर्वत्र ही अपने अधिष्ठातृदेव चन्द्रमाकी अपेक्षा है। अतः चन्द्रमा सर्वभोक्ता हैं। परंतु व्यष्टि अभिमान ही पुण्य- पापका मूल है, चन्द्रमा सभीके मनके अधिष्ठाता हैं, १-यहाँ अकर्मक 'व्यादत्त' क्रियाका प्रयोग किया गया है। (श्रीमद्भा० १०।८।३६) २-मीयते वक्ता अनेन इति मायः शब्दः।

श्रीरासलीलारहस्य २२९ अतः उनमें व्यष्टि अभिमान नहीं है। इसी कारण उन्हें पुण्य-पापका संसर्ग नहीं है। जैसे चन्द्रमा सबके मनका अधिष्ठाता है, वैसे ही भगवान् सबके अन्तरात्मा हैं। जैसे सभी सम्भोगोंमें मनकी अपेक्षा है, उससे भी अधिक सभी सम्भोगोंमें अन्तरात्माकी अपेक्षा है; क्योंकि अनुकूल-प्रतिकूल शब्दस्पर्शादि विषय तथा सुख-दुःखादिका साक्षात्कार अन्तरात्माके ही अधीन है। शब्दादि विषयोंके आकारसे आकारित वृत्तिमान् अन्तःकरण, आत्मचैतन्य-ज्योतिसे देदीप्यमान होकर ही शब्दादि-विषयका प्रकाशन करता है। भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं, यह बात भी श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित वचनोंसे स्पष्ट है— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्॥ कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६; १०।१४।५५) जबकि प्राणिमात्रके लिये जल, तेज तथा वायुका सर्वांगीण स्पर्श अनिवार्य है, तब ऐसी कौन-सी पतिव्रता है, जिसके सर्वांगका स्पर्श वायु, आकाश आदिसे न होता हो? फिर भगवान् श्रीकृष्ण तो आकाश और अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्व इन सभीके अधिष्ठान और इन सभीसे आन्तर हैं। इस बातका भी वहीं उल्लेख है, जहाँ श्रीकृष्णकी चीरहरण और रासक्रीड़ाप्रभृति लीलाओंका वर्णन है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) समस्त वस्तुओंका याथात्म्य उनके कारणमें ही पर्यवसित है। उस कारणका भी पर्यवसान जहाँ है, वही कार्यकारणातीत सर्वाधिष्ठान परतत्त्व श्रीकृष्ण हैं। फिर उनसे भिन्न कौन-सा तत्त्व है, जिसका निरूपण किया जाय? अतः सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके साथ भेद ही क्या हो सकता है? अतः उनके सन्निधानमें निष्कपट और निरावरण होनेसे ही जीवका परम कल्याण होता है। भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है भगवान्‌की अचिन्त्य महाशक्तिरूपा योगमाया श्री, भू और लीलारूपा है। इनमेंसे प्रधानतया लीलाशक्तिका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। पहले जहाँ मुमुक्षुरूपा प्रजाका उल्लेख किया है, वहाँ 'योगमायामुपाश्रितः' इस पदका तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिये—'योगाय स्वस्मिन् योजनाय या माया कृपा' अर्थात् योग—अपनेमें जोड़नेके लिये जो माया (कृपा); अथवा 'योगाय स्वलीलासुखे योजनाय या माया कृपा'—योग अर्थात् अपने लीलासुखमें युक्त करनेके लिये जो कृपा अथवा 'यः भगवान् अगमायामुपाश्रितः'—जो भगवान् अगमामें उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। अगमा क्या है? 'न गच्छति चलति इति अगः कूटस्थं ब्रह्म, तस्य या प्रमा' अर्थात् जो गमन नहीं करता, उस कूटस्थ ब्रह्मका नाम अग है, उसकी प्रमा यानी अपरोक्ष साक्षात्कार ही अगमा है; 'तस्यां' 'अगमायां तत्सम्पादने मुमुक्षुभिरुपाश्रितः यः सः'—उस अगमामें अर्थात् उसका सम्पादन करनेमें जो मुमुक्षुओंन्द्वारा आश्रय किया जाता है, उस परब्रह्मने मुमुक्षुओंपर अनुग्रह करनेके लिये ही रमण करनेको मन किया; क्योंकि सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका अपरोक्ष साक्षात्कार उनकी लीला-कथाओंके अनुशीलनसे ही होता है। पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) भाव यह है कि हे देव! कोई तो आपके