भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २२५
होता, इसलिये 'एकोऽहं बहु स्याम्' इस प्रकारके संकल्पपूर्वक हो तथापि जबतक लीला, लीलानायक और दर्शकोंको लीलामें आसक्ति न हो, तबतक तो लीला व्यर्थ ही है। माना कि यह त्रिविध विभाग एकमें ही हुआ है तथापि यह वह स्वस्वरूपमें ही परितृप्त है तो लीलाका कोई प्रयोजन ही सिद्ध नहीं होता। अतः यहाँ स्वस्वरूपभूत परमानन्दका आवरण अपेक्षित है। किंतु उसका आवरण करनेमें कौन समर्थ है? माया आवरण कर सकती है; परंतु भगवान्का आवरण करनेमें वह भी समर्थ नहीं है। अतः भगवान्के आश्रित रहनेवाली उनकी परमान्तरंगा मोहिनी शक्ति, जो कि अनिर्वचनीयतामें अन्य समस्त शक्तियोंके समान ही होनेपर भी शुद्धतामें उनसे उत्कृष्ट है, भगवान्के शुद्ध स्वरूपका आच्छादन करती है और उसीसे स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण हो जानेपर यह लीला और लीलापात्रोंकी कल्पना हो जाती है। जिस प्रकार स्वेच्छासे भाँग पीकर अपनेको मोहित किया जाता है, उसी प्रकार भगवान्का यह व्यामोहन भी स्वेच्छासे होता है। यदि इस प्रकार अपने स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण न होता तो अपनेसे भिन्न रमणसामग्रीकी अपेक्षा क्यों होती? अतः पहले आवरण हुआ, उससे अतृप्ति हुई और फिर लीला हुई। इसीसे उनकी चेष्टाएँ एक-दूसरेकी परितृप्ति करनेवाली हुईं। इसमें अन्योन्याश्रयदोष भी नहीं है, रमणकी भी व्यवस्था ठीक हो जाती है और 'अपि' शब्दका तात्पर्य भी बन जाता है। इस श्लोकका एक अर्थ यह भी हो सकता है—'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'—भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। किसलिये? 'ताः वीक्ष्य'— अज्ञानिजनरूपा जो प्रजा है, उसे देखकर उसका कल्याण करनेके लिये। वह प्रजा कैसी है—'रात्रीः'—रात्रिके समान अज्ञानरूप तमसे व्याप्त। ये सब प्रजाएँ अनादि हैं; अतः भगवान्का रमण उनके कल्याणके ही लिये है। इसके सिवा वह प्रजा 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) भी है— शरदायां जाड्यमय्यां व्यवहारभूमौ उत्फुल्लमल्लिकास्विव सुखबुद्धयः॥ अर्थात् सुखदुःखमोहात्मिका जो जाड्यमयी व्यवहारभूमि, जो कि उत्फुल्लमल्लिकाके समान आपात- रमणीय है, उसमें सुखबुद्धि करनेवाली। तात्पर्य यह है कि दुःखमयी व्यवहार-भूमिमें सुखबुद्धि करनेवाली प्रजाको स्नेहार्द्र-दृष्टिसे देखकर रमणकी इच्छा की; क्योंकि अज्ञानी प्रजाकी सुखदुःखमोहातीत परब्रह्ममें स्थिति होना अशक्य है। अतः जो प्राकृत लीलाएँ उनकी अभिरुचिके अनुकूल हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान्ने उन्हींके समान रमण करनेकी इच्छा की। इसलिये— 'अयोगमायामुपाश्रितः'—'अयोगेषु चित्त- निरोधादिनिःश्रेयससाधनशून्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'। अर्थात् योग—चित्तवृत्तिनिरोधादि निःश्रेयसके साधनोंसे शून्य जो प्रजा, उसपर जो कृपा, वही माया है। उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया; क्योंकि जो शुद्ध परब्रह्म अशेषविशेषशून्य है, उसका साक्षात्कार तो निरोधादिद्वारा ही किया जा सकता है। 'अयोगेषु सर्वथा अयोग्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'—जो प्राणी अत्यन्त निकृष्ट कोटिके हैं, उनके ऊपर जो कृपा, उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया। भगवान् पतितपावन हैं, इसीसे भावुक भक्त अपनेको सर्वसाधनशून्य देखकर भी भगवत्कृपाके भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। 'मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने॥' (विनय-पत्रिका १६०) अतः यह भगवान्की लीला मानो अत्यन्त अयोग्य पुरुषोंके ऊपर कृपा करनेके ही लिये है; क्योंकि भगवान्के जो वात्सल्य, माधुर्य एवं औदार्य आदि गुण हैं, उनकी सफलता तो बिना पतितोंके हो ही नहीं सकती। वस्तुतः उदारता और दीनवत्सलता ये सब तो इन्हीं अंशोंको लेकर होते हैं कि स्वयं परमोत्कृष्ट होकर भी अत्यन्त निम्नकोटिक पुरुषोंके