भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ भक्तिसुधा साथ मिलकर उनके साथ पूर्ण आत्मीयताका बर्ताव करें। किंतु निर्विशेष परब्रह्म या गोलोकवासी भगवान्के साथ ऐसे पतितोंका सहवास कैसे हो सकता है ? वहाँ उन निकृष्टातिनिकृष्ट पुरुषोंके आत्मीय होकर भगवान् कैसे विहार कर सकते थे ? अथवा— 'अयोगेषु स्वस्मिन्नयुज्यमानेषु या माया कृपा तामुपाश्रितः।' जिनकी मनोवृत्ति स्वप्नमें भी भगवान्की ओर नहीं जाती, ऐसे अपनेमें अयुक्त पुरुषोंके प्रति जो माया—कृपा उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह लीला अत्यन्त साधन-शून्योंको भी अपनी ओर आकर्षित करनेवाली है। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये ही यह लीला की थी। निर्विशेष भगवान्में तो प्राकृत पुरुषोंकी वृत्ति पहुँचनी अत्यन्त कठिन है; इसीसे भगवान्ने यह लोकमनोभिरामा लीला की थी, जिससे विषयी और पशुप्राय जीवोंका चित्त भी भगवान्की ओर लग जाय। अहो! भगवान्का यह खेल कैसा मनोमोहक था! 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) उसे देखकर जो गतिमान् थे, उनमें निस्पन्दता आ जाती थी और वृक्षोंकी रोमावली खड़ी हो जाती थी। अर्थात् चेतन पदार्थोंमें जड़ता आ जाती थी और जड़ोंमें चेतनकी क्रिया होने लगती थी। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकृष्ट करनेके लिये ही अति अद्भुत मनोरम लीला की थी। ऐसा कहा जाता है कि प्राणियोंके पतनका जो प्रधान हेतु है, वह भगवद्विमुखता ही है तथा भगवदुन्मुखता ही सर्वानन्दका साधन है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ (श्रीमद्भा० ११।२।३७) अर्थात् जो पुरुष भगवान्से विमुख है, जो नामरूपक्रियात्मक प्रपंचमें ही आसक्त है, उसे ही भगवान्की मायासे मोहित होनेके कारण भगवद्विस्मृति हुआ करती है। स्वरूपविस्मृतिके पश्चात् विभ्रम होता है, जो असंग आत्मामें संगका, अकर्तामें कर्तृत्वका और एकमें अनेकत्वकी भ्रान्ति करा देता है। उस विभ्रमसे द्वैतबुद्धि होती है, द्वैतबुद्धिसे ही भय होता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि अनन्य बुद्धिसे उस पूर्ण परब्रह्म परमात्माका ही भजन करे। इससे माया इस प्रकार भाग जाती है, जैसे क्रुद्ध तपोधनोंके सामनेसे वेश्या। मायासे ही स्वरूपकी विस्मृति हुआ करती है और भगवदुन्मुख होनेपर वह भाग जाती है, तब स्वरूपसाक्षात्कार हो ही जाता है और फिर विभ्रमका उच्छेद हो जानेके कारण निर्भयताकी प्राप्ति हो जाती है। अतः भगवान्ने अज्ञानीरूपा प्रजाका उद्धार करनेके लिये ही यह मार्ग निकाला था; क्योंकि भगवान्की माया बड़ी प्रबल है, उससे वे ही बच सकते हैं, जो एकमात्र भगवान्का ही आश्रय लेते हैं। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) अतः भगवान्ने सर्वसाधनशून्य पामर प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही यह लीला की थी, जिससे कि किसी भी प्रकार उनका चित्त भगवान्में लगे। अथवा 'ताः' शब्दसे मुमुक्षुरूपा प्रजा समझनी चाहिये। उसपर कृपा करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की। वह मुमुक्षुरूपा प्रजा कैसी है ? 'रात्री:'— 'रा दाने' इस स्मृतिके अनुसार दान करनेवाली अर्थात् दानोपलक्षित यज्ञादि कर्म करनेवाली। जैसा कि कहा—'तमेतं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसा ब्रह्म विविदिषन्ति।' अथवा 'भगवति स्वरूपेण सह सर्वसमर्पयित्री' जो भगवान्में अपने स्वरूपके सहित सर्वस्व समर्पण करनेवाली है तथा जो 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' है।