भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

श्रीरासलीलारहस्य २२७ 'शरादिवत् घ्नन्ति अवखण्डयन्ति उत्फुल्ल- मल्लिकाद्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासां ताः।' अर्थात् उत्फुल्लमल्लिकाओंके समान जो स्त्री- पुत्रादिरूप सांसारिक सुख हैं, वे शरादि अस्त्र- शस्त्रके समान जिनका खण्डन करती हैं, उन मुमुक्षुरूपा प्रजाओंको देखकर। इससे उन मुमुक्षुओंकी पूर्ण योग्यता दिखायी गयी है; क्योंकि पूर्ण मुमुक्षु तभी होता है, जब कि उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट सांसारिक सुख भी उसे दुःखरूप दिखायी देने लगे। वास्तवमें तो मुमुक्षुता होती ही उस समय है, जब संसार भयानक दिखायी देने लगे। उसे सांसारिक सुख शरादिके समान छेदन करनेवाले दिखलायी देते हैं, वही मुमुक्षु हो सकता है। ऐसी प्रजाओंको देखकर— 'योगमायामुपाश्रितः योगाय स्वेन सह सम्बन्धविच्छेदाय।' अपने साथ उनके असम्बन्धका छेदन करनेके लिये अर्थात् अपने साथ उनकी अभिन्नता स्थापित करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यहाँ केवल व्रजदेवियोंके साथ ही क्रीड़ा नहीं करनी थी, बल्कि श्रुतियोंका आवाहन करके उनका भी अपनेमें तात्पर्य दृढ़ करना था। भगवान्की यह लीला ओषधिरूपा होगी। जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंके लिये यह श्रोत्रमनोभिरामा है, वैसे ही मुमुक्षुओंके लिये यह भवौषधिरूपा है। अतः— 'ताः मुमुक्षुरूपाः प्रजाः वीक्ष्य, ताश्च श्रुतीः आहूय, ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उस मुमुक्षुरूपा प्रजाको देखकर और उन श्रुतियोंका भी आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् मुमुक्षुओंको संसारसे निर्विण्ण देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। मुमुक्षु लोग संसारसे निर्विण्ण क्यों हैं? इसका हेतु यह है—वे विशुद्धान्तःकरण हैं, इसलिये विवेकसम्पन्न हैं और विवेकीके लिये सब कुछ दुःखरूप ही है—'दुःखमेव सर्वं विवेकिनाम्'— उनके लिये संसारके सारे सुख भाले और बछियोंके समान हो जाते हैं। उनके उद्धारका उपाय क्या है? यही कि श्रुतियोंका परम तात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही निश्चित हो। किंतु पहले यह होता नहीं, अतः भगवान्ने उनका आह्वानकर अपनेमें उनका तात्पर्य दृढ़ किया। यहाँ जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने व्रजांगनाओंका आवाहन किया था, उसी प्रकार व्यासरूपसे उन्होंने ब्रह्मसूत्ररूप वेणुनादद्वारा समस्त श्रुतियोंका आवाहन करके उनका परम तात्पर्य परब्रह्ममें निश्चित किया है। गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। (रा०च०मा० १।१८) यहाँ 'अरथ' तो पूर्ण परब्रह्म परमात्मा है और 'शब्द' ये श्रुतियाँ हैं। अतः श्रुतियाँ तरंग हैं और ब्रह्म समुद्र है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ तरंग हैं और भगवान् श्रीकृष्ण समुद्र हैं। इनका परस्पर तादात्म्य-सम्बन्ध है। उन श्रुतियोंका आवाहनकर अर्थात् अपनेमें उनका तात्पर्य निश्चयकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भावुकोंकी दृष्टिसे एक और ही अर्थ होता है— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः 'अगमायाम् उपाश्रितः'—'न गच्छतीति अगा, अगा चासौ मा अगमा'। अर्थात् नित्यश्लिष्टा वृषभानुनन्दिनी। वह कौन है?—'यामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे', अर्थात् जिसका आश्रय लेकर भगवान्ने भी रमण करनेकी इच्छा की। क्यों इच्छा की? शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको देखकर। अथवा यों समझो— 'योगमायामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मन- श्चक्रे—योगाय अघटितघटनाय या माया इति योगमाया ताम उपाश्रितः।' अर्थात् जो माया अघटितघटनापटीयसी है, उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भगवान्को अपना ऐश्वर्य छिपाना था; क्योंकि यह मधुर लीला है, अतः इसमें ऐश्वर्यभाव