भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसका विघातक है। इसमें प्राकृतांश ही अधिक उपयुक्त है। इसीसे भगवान्की जिन लीलाओंमें प्राकृतांश विशेष है उन्हींका महत्त्व भी अधिक है; क्योंकि प्राकृत व्यापारोंमें व्यासक्त प्राणियोंको आकर्षित करनेमें प्राकृतभाव अधिक उपयोगी है। अतः ‘योगमायामुपाश्रितः—योगमायां उप सामीप्येन आश्रितः, न तु साक्षात्'—सामीप्यवश योगमायाका आश्रय लेकर, साक्षात्रूपसे नहीं। जिस प्रकार स्वाभाविक होनेके कारण सूर्यभगवान् अपनी किरणोंका आश्रय लेते हैं। उन्हें किरणें धारण नहीं करनी पड़तीं, बल्कि जहाँ वे रहते हैं, वहाँ उनकी किरणें भी रहती ही हैं, इसी प्रकार भगवान्की योगमाया भी उनके साथ रहती ही है। अतः अघटनघटनमें समर्थ जो योगमाया, उसका सर्वथा समाश्रयण न करके भगवान्ने प्राकृतवत् लीलाएँ कीं, जिससे प्राकृत प्राणियोंका विशेष आकर्षण हो सके। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्की योगमाया सर्वदा उनके साथ रहती है, इसलिये हठात् अपना काम कर देती है। जब मिट्टी खानेके उपरान्त भगवान्ने श्रीयशोदाजीसे मुख देखनेको कहा तो उन्होंने यह नहीं समझा कि मैया सचमुच मेरा मुख देखेगी। वे यही समझते थे कि ऐसा कहनेसे मुझे निर्दोष समझकर वह छोड़ देगी। परंतु जब उसने कहा—‘दिखला' तो उनका मुख फैल गया।१ भगवान्ने मुख फैलाया नहीं, बल्कि जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे कमल खिल जाता है, उसी प्रकार माताके कोपरूप सूर्यका ताप पाकर भगवान्का मुखकमल खुल गया। उस समय योगमायाने देखा कि मुखमें मिट्टी देखकर माता हमारे प्रभुको मारेगी; इसीसे उसने उनके मुखमें सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया। इसी प्रकार इस लीलामें भी योगमाया कई ऐश्वर्यभाव दिखायेगी। अथवा भगवान्ने उन रात्रियोंको देखकर 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां योगमायां वंशीम्'—व्रजांगनाओंके योग-संश्लेषके लिये माय२ (शब्द) जिसमें रहते हैं, उस वंशीका नाम योगमाया है; उसका आश्रय करके भगवान्ने व्रजांगनाओंको बुलाकर रमणकी इच्छा की। यह उचित भी है; क्योंकि जिस प्रकार गिरिराजका आश्रय लेकर भगवान्ने इन्द्रके दर्पका दमन किया था, उसी प्रकार कन्दर्पदर्प-दमन इसके द्वारा होगा। वंशी क्या है? यह महारुद्र है और कामदेवके दर्पका दमन महारुद्र ही कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि अपने संसर्गद्वारा स्वस्वरूप बना लेनेपर ही किसीके साथ रमण हो सकता है। वस्तुतः भगवद्व्यतिरिक्त तो कोई पदार्थ है नहीं। भगवद्रूपमें ही भिन्नताकी प्रतीति हुआ करती है और भगवत्सम्बन्धसे ही उसकी निवृत्ति होकर भगवद्रूपताकी प्रतीति होती है। वह सम्बन्ध क्या है? व्यवधानकी निवृत्ति। व्यवधानकी निवृत्ति होते ही भगवान्से अभेद हो सकता है। अतः भगवान्ने वंशीध्वनिद्वारा अपनी अधरसुधाका संचार करके समस्त वृन्दारण्य और तद्वर्ती गुल्म, लता एवं गोपांगनादिको स्वस्वरूप बना दिया। इसीसे 'योगाय भगवत्संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां वंशीं उपाश्रितः'—योग अर्थात् भगवत्संश्लेषके लिये जिसमें माय अर्थात् शब्द है, उस वंशीका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। मानो उस वंशीकी उपासना करके ही भगवान् व्रजांगनाओंके मनोंको आकर्षित करनेमें समर्थ हुए। ‘अपि' शब्दका आशय यही है कि यद्यपि था तो अनुचित तथापि भगवान्के सम्बन्धमात्रसे उचित ही हो गया; क्योंकि साधारणतया सभी कन्याओंका प्राथमिक सम्बन्ध गन्धर्व आदिके साथ होता है। चन्द्रमा तो वैसे सभीके मनके अधिष्ठाता हैं। मनकी आवश्यकता सभी सम्भोगोंमें है और मनको सर्वत्र ही अपने अधिष्ठातृदेव चन्द्रमाकी अपेक्षा है। अतः चन्द्रमा सर्वभोक्ता हैं। परंतु व्यष्टि अभिमान ही पुण्य- पापका मूल है, चन्द्रमा सभीके मनके अधिष्ठाता हैं, १-यहाँ अकर्मक 'व्यादत्त' क्रियाका प्रयोग किया गया है। (श्रीमद्भा० १०।८।३६) २-मीयते वक्ता अनेन इति मायः शब्दः।