भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २२९ अतः उनमें व्यष्टि अभिमान नहीं है। इसी कारण उन्हें पुण्य-पापका संसर्ग नहीं है। जैसे चन्द्रमा सबके मनका अधिष्ठाता है, वैसे ही भगवान् सबके अन्तरात्मा हैं। जैसे सभी सम्भोगोंमें मनकी अपेक्षा है, उससे भी अधिक सभी सम्भोगोंमें अन्तरात्माकी अपेक्षा है; क्योंकि अनुकूल-प्रतिकूल शब्दस्पर्शादि विषय तथा सुख-दुःखादिका साक्षात्कार अन्तरात्माके ही अधीन है। शब्दादि विषयोंके आकारसे आकारित वृत्तिमान् अन्तःकरण, आत्मचैतन्य-ज्योतिसे देदीप्यमान होकर ही शब्दादि-विषयका प्रकाशन करता है। भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं, यह बात भी श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित वचनोंसे स्पष्ट है— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्॥ कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६; १०।१४।५५) जबकि प्राणिमात्रके लिये जल, तेज तथा वायुका सर्वांगीण स्पर्श अनिवार्य है, तब ऐसी कौन-सी पतिव्रता है, जिसके सर्वांगका स्पर्श वायु, आकाश आदिसे न होता हो? फिर भगवान् श्रीकृष्ण तो आकाश और अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्व इन सभीके अधिष्ठान और इन सभीसे आन्तर हैं। इस बातका भी वहीं उल्लेख है, जहाँ श्रीकृष्णकी चीरहरण और रासक्रीड़ाप्रभृति लीलाओंका वर्णन है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) समस्त वस्तुओंका याथात्म्य उनके कारणमें ही पर्यवसित है। उस कारणका भी पर्यवसान जहाँ है, वही कार्यकारणातीत सर्वाधिष्ठान परतत्त्व श्रीकृष्ण हैं। फिर उनसे भिन्न कौन-सा तत्त्व है, जिसका निरूपण किया जाय? अतः सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके साथ भेद ही क्या हो सकता है? अतः उनके सन्निधानमें निष्कपट और निरावरण होनेसे ही जीवका परम कल्याण होता है। भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है भगवान्की अचिन्त्य महाशक्तिरूपा योगमाया श्री, भू और लीलारूपा है। इनमेंसे प्रधानतया लीलाशक्तिका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। पहले जहाँ मुमुक्षुरूपा प्रजाका उल्लेख किया है, वहाँ 'योगमायामुपाश्रितः' इस पदका तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिये—'योगाय स्वस्मिन् योजनाय या माया कृपा' अर्थात् योग—अपनेमें जोड़नेके लिये जो माया (कृपा); अथवा 'योगाय स्वलीलासुखे योजनाय या माया कृपा'—योग अर्थात् अपने लीलासुखमें युक्त करनेके लिये जो कृपा अथवा 'यः भगवान् अगमायामुपाश्रितः'—जो भगवान् अगमामें उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। अगमा क्या है? 'न गच्छति चलति इति अगः कूटस्थं ब्रह्म, तस्य या प्रमा' अर्थात् जो गमन नहीं करता, उस कूटस्थ ब्रह्मका नाम अग है, उसकी प्रमा यानी अपरोक्ष साक्षात्कार ही अगमा है; 'तस्यां' 'अगमायां तत्सम्पादने मुमुक्षुभिरुपाश्रितः यः सः'—उस अगमामें अर्थात् उसका सम्पादन करनेमें जो मुमुक्षुओंन्द्वारा आश्रय किया जाता है, उस परब्रह्मने मुमुक्षुओंपर अनुग्रह करनेके लिये ही रमण करनेको मन किया; क्योंकि सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका अपरोक्ष साक्षात्कार उनकी लीला-कथाओंके अनुशीलनसे ही होता है। पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) भाव यह है कि हे देव! कोई तो आपके