भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

२३० भक्तिसुधा कथामृत-पानसे बढ़ी हुई भक्तिके कारण विशुद्धान्तःकरण होकर, वैराग्य ही जिसका सार है, ऐसा बोध प्राप्त करके आपके निर्द्वन्द्व धामको प्राप्त होते हैं और कोई आत्मसंयमके द्वारा समाधि-लाभकर उससे प्रबल प्रकृतिको जीतकर परमपुरुष आपको ही प्राप्त होते हैं। किंतु उन्हें श्रम होता है और आपकी सेवामें कोई कष्ट नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्‌ने यह लीला मुमुक्षुओंके कल्याणके ही लिये की थी, जिससे वे उस लीला-कथाका पान करते हुए भगवान्‌को प्राप्त कर सकें। और यदि 'अयोगमायामुपाश्रितः' ऐसा पद समझा जाय तो 'न युज्यते उपाधिसङ्गं न प्राप्नोति इति अयोगः तस्य या प्रमा तस्यामुपाश्रितः' अर्थात् जो उपाधिसंसर्गको प्राप्त नहीं होता, उसकी प्रमा अर्थात् अपरोक्षानुभवके लिये जो मुमुक्षुओंद्वारा आश्रित है। अथवा 'योगः उपाध्यध्यासः तस्य अभावः अपवादः अयोगः'—उपाधिजनित अध्यासके अभावका ही नाम अयोग है, उसकी जो प्रमा है, उसका नाम अयोगमा है, उस अयोगमाके लिये भगवान् मुमुक्षुओंद्वारा उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यह नियम है कि उपाधिजनित अध्यासका निराकरण सूक्ष्मातिसूक्ष्म परब्रह्मके ज्ञानसे ही होता है। यह ज्ञान कब होता है? इस विषयमें भगवान् स्वयं कहते हैं— यथा यथात्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः । तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२६) अर्थात् मेरी पवित्र गाथाओंके श्रवण और कीर्तनद्वारा जैसे-जैसे यह अन्तरात्मा स्वच्छ होता जाता है, वैसे-वैसे ही साधक सूक्ष्म-वस्तुका साक्षात्कार करता जाता है, जिस प्रकार कि अंजनयुक्त नेत्र। अतः उपाध्यध्यासकी निवृत्तिका एकमात्र साधन भगवल्लीलाओंका अभ्यास ही है। श्रीमद्भागवत (१०।२।३५)-में कहा है— सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः ॥ हे भगवन्! यदि आप यह लीलामय विग्रह धारण न करें तो अज्ञानका भेदन करनेवाले विज्ञानकी सफाई ही हो जाय। यदि कोई कहे कि हम अनुमान कर लेंगे; क्योंकि चक्षु, श्रोत्र एवं त्वचा आदि इन्द्रियोंद्वारा जो विषयोंका ग्रहण हुआ करता है, वह आत्मतत्त्वके अस्तित्वका द्योतक है। जिस प्रकार शीतलता और उष्णतासे रहित लोहपिण्डमें दाहकत्व एवं प्रकाशकत्व देखकर वहाँ दाहकत्व-प्रकाशकत्व समर्पण करनेवाले नित्य-दाहकत्व-प्रकाशकत्व- गुणविशिष्ट अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंके विषयप्रकाशनसामर्थ्यसे चिन्मय आत्माका अनुमान होता है। साथ ही जिस प्रकार यह देखा जाता है कि लोहपिण्डादिमें जो दाहकत्व-प्रकाशकत्व है, वह सातिशय है और अग्निमें निरतिशय, उसी प्रकार यह भी अनुमान किया जा सकता है कि इन्द्रियादिका प्रकाशक आत्मा निरतिशय-ज्ञानमय है। परंतु यह केवल अनुमान ही तो है, इसे साक्षात्कार नहीं कह सकते। अतः यदि साक्षात्कार करना है तो भगवान्‌की लीला आदिका श्रवण करना चाहिये। इससे प्रेमकी अभिवृद्धि होगी। प्रेमसे चित्तमें शिथिलता आयेगी, इससे वह निर्वृत्तिक होगा और निर्वृत्तिक चित्तपर ही परब्रह्मका प्रकाश होगा। अतः भगवत्साक्षात्कारके लिये भग