भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
२३० भक्तिसुधा कथामृत-पानसे बढ़ी हुई भक्तिके कारण विशुद्धान्तःकरण होकर, वैराग्य ही जिसका सार है, ऐसा बोध प्राप्त करके आपके निर्द्वन्द्व धामको प्राप्त होते हैं और कोई आत्मसंयमके द्वारा समाधि-लाभकर उससे प्रबल प्रकृतिको जीतकर परमपुरुष आपको ही प्राप्त होते हैं। किंतु उन्हें श्रम होता है और आपकी सेवामें कोई कष्ट नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यह लीला मुमुक्षुओंके कल्याणके ही लिये की थी, जिससे वे उस लीला-कथाका पान करते हुए भगवान्को प्राप्त कर सकें। और यदि 'अयोगमायामुपाश्रितः' ऐसा पद समझा जाय तो 'न युज्यते उपाधिसङ्गं न प्राप्नोति इति अयोगः तस्य या प्रमा तस्यामुपाश्रितः' अर्थात् जो उपाधिसंसर्गको प्राप्त नहीं होता, उसकी प्रमा अर्थात् अपरोक्षानुभवके लिये जो मुमुक्षुओंद्वारा आश्रित है। अथवा 'योगः उपाध्यध्यासः तस्य अभावः अपवादः अयोगः'—उपाधिजनित अध्यासके अभावका ही नाम अयोग है, उसकी जो प्रमा है, उसका नाम अयोगमा है, उस अयोगमाके लिये भगवान् मुमुक्षुओंद्वारा उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यह नियम है कि उपाधिजनित अध्यासका निराकरण सूक्ष्मातिसूक्ष्म परब्रह्मके ज्ञानसे ही होता है। यह ज्ञान कब होता है? इस विषयमें भगवान् स्वयं कहते हैं— यथा यथात्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः । तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२६) अर्थात् मेरी पवित्र गाथाओंके श्रवण और कीर्तनद्वारा जैसे-जैसे यह अन्तरात्मा स्वच्छ होता जाता है, वैसे-वैसे ही साधक सूक्ष्म-वस्तुका साक्षात्कार करता जाता है, जिस प्रकार कि अंजनयुक्त नेत्र। अतः उपाध्यध्यासकी निवृत्तिका एकमात्र साधन भगवल्लीलाओंका अभ्यास ही है। श्रीमद्भागवत (१०।२।३५)-में कहा है— सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः ॥ हे भगवन्! यदि आप यह लीलामय विग्रह धारण न करें तो अज्ञानका भेदन करनेवाले विज्ञानकी सफाई ही हो जाय। यदि कोई कहे कि हम अनुमान कर लेंगे; क्योंकि चक्षु, श्रोत्र एवं त्वचा आदि इन्द्रियोंद्वारा जो विषयोंका ग्रहण हुआ करता है, वह आत्मतत्त्वके अस्तित्वका द्योतक है। जिस प्रकार शीतलता और उष्णतासे रहित लोहपिण्डमें दाहकत्व एवं प्रकाशकत्व देखकर वहाँ दाहकत्व-प्रकाशकत्व समर्पण करनेवाले नित्य-दाहकत्व-प्रकाशकत्व- गुणविशिष्ट अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंके विषयप्रकाशनसामर्थ्यसे चिन्मय आत्माका अनुमान होता है। साथ ही जिस प्रकार यह देखा जाता है कि लोहपिण्डादिमें जो दाहकत्व-प्रकाशकत्व है, वह सातिशय है और अग्निमें निरतिशय, उसी प्रकार यह भी अनुमान किया जा सकता है कि इन्द्रियादिका प्रकाशक आत्मा निरतिशय-ज्ञानमय है। परंतु यह केवल अनुमान ही तो है, इसे साक्षात्कार नहीं कह सकते। अतः यदि साक्षात्कार करना है तो भगवान्की लीला आदिका श्रवण करना चाहिये। इससे प्रेमकी अभिवृद्धि होगी। प्रेमसे चित्तमें शिथिलता आयेगी, इससे वह निर्वृत्तिक होगा और निर्वृत्तिक चित्तपर ही परब्रह्मका प्रकाश होगा। अतः भगवत्साक्षात्कारके लिये भग
- श्रीरामलीलारहस्य * २३१ परमरस समर्पण करनेवाली उन रात्रियोंको देखकर। यहाँ 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है। उनमें मुख्य विलक्षणता तो यही थी कि जिन भगवान् श्रीकृष्णके विप्रयोगमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगोंके समान बीतता था, उन्होंने इन रात्रियोंको अपने सहवास-सौभाग्यके लिये नियुक्त किया था। व्रजांगनाएँ संसारमें सबसे बड़ा सौभाग्य क्या समझती थीं ? वे कहती हैं— अक्ष्णवतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतौर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) यहाँ व्रजांगनाओंने संसारभरमें सबसे बड़ा फल यही बताया है कि जिन्हें विधाताने नेत्र दिये हैं, वे अपने समवयस्क बालकोंके साथ पशुओंको गोष्ठमें प्रवेश कराते हुए दोनों नन्दकुमारोंके अनुरक्त- कटाक्षमोक्षमण्डित वंशी-विभूषित मुखारविन्दका पान करें। इसके सिवा यदि कोई और भी फल हो सकता हो तो हम उसे जानतीं नहीं। स्मरण रहे, ये श्रुतियाँ हैं—साक्षात् श्रुतिदेवियाँ हैं, यदि ये ही नहीं जानतीं तो और कौन जानेगा ? इस श्लोकमें 'व्रजेशसुतयोः' यह तो द्विवचन है, किंतु 'वक्त्रम्' एकवचन है। इसका क्या रहस्य है ? इसका तात्पर्य यह है कि गोपांगनाओंका अभिमत तो केवल भगवान् श्रीकृष्णका ही मुखचन्द्र है; परंतु परकीया थीं न, इसलिये अपना भाव छिपानेके लिये द्विवचन दिया। किंतु जबतक वे प्रेमातिशयसे विभोर न हुईं, तबतक तो भावगोपन कर लिया, पर प्रेमातिरेक होनेपर वे अपनेको न सम्हाल सकीं और उनके मुखसे 'वक्त्रम्'...... 'अनुवेणु जुष्टम्' निकल ही गया। उस वेणुजुष्ट मुखका विशेषण 'अनुरक्तकटाक्ष- मोक्षम्' दिया है। यह उसकी मधुरता और लावण्य सूचित करनेके लिये है अर्थात् जिन भगवान् श्रीकृष्णके मुखचन्द्रपर अनुरागिणी गोपांगनाओंके कटाक्षबाण छूटते थे; अथवा जिस मुखमें अनुरागिणी व्रजांगनाओंके लिये कटाक्षमोक्ष होता था। अतः भगवान्का रसस्वरूप मुख ही व्रजबालाओंका ध्येय है, उन्हें भगवत्सम्बन्ध ही परम अभिलषित था। इसीके लिये वे दूसरोंसे ईर्ष्या भी करती थीं। एक जगह वे कहती हैं— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) उन्हें इस समय यह भी ध्यान नहीं था कि ये हरिणियाँ चेतन हैं या अचेतन और इन्हें वस्तुतः भगवान्के प्रति अनुराग है या नहीं। इसीसे वे कहती हैं कि इन हरिणियोंका जो प्रेमरसप्लुत नेत्रोंसे निरीक्षण है, उसके द्वारा वे मानो भगवान्की पूजा ही करती हैं। यही नहीं, वे वहाँकी भीलनियोंके सौभाग्यकी भी सराहना करती हैं— पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) वृन्दारण्यके जो तृण-गुल्म-लतादि हैं, उनसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका संयोग होनेके कारण उनमें जो भगवान्के पादपद्मोंमें लगा हुआ प्रियतमाओंका कुचकुंकुम लग गया है, उसके सौगन्ध्यसे विमुग्ध होकर कामज्वरसे सन्तप्त हुई भीलनियाँ उस कुंकुमको अपने हृदय और मुखमें लगाकर उस तापको शान्त करती हैं। वे बड़ी भाग्यशीला हैं। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ अनुरागिणी व्रजांगनाओंका संयोग करानेवाली इन रात्रियोंकी विलक्षणताका वर्णन कौन कर सकता है ? जबसे भगवान्ने कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तभीसे गोपांगनाओंकी दृष्टि इन्हीं रात्रियोंपर लगी रहती थी। इन रात्रियोंका
सर्वत्र ‘ताः इमाः’ आदि सर्वनामोंसे ही वर्णन किया गया है। एक बार भगवान्ने भी उद्धवजीसे कहा था— तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण। क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।११) हे उद्धव! उन व्रजांगनाओंने अपने परम प्रियतम मेरे साथ वे अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ आधे क्षणके समान बिता दी थीं। जिस प्रकार समाधिस्थ योगियोंको अत्यन्त दीर्घ काल भी कुछ मालूम नहीं होता, उसी प्रकार मेरे साथ उन्हें वे रात्रियाँ कुछ भी न जान पड़ीं। किंतु अब मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये कल्पके समान हो जाती थीं। यहाँ ‘मया’ शब्दमें भी विलक्षणता है। इससे अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध परब्रह्म भी ग्रहण किया जा सकता है। उसके साथ योग होनेपर भी समय कुछ मालूम नहीं होता। अतः इससे पूर्ण योगीन्द्र भी ग्रहण किये जा सकते हैं। परंतु यहाँ अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध ब्रह्म अभिप्रेत नहीं है, बल्कि वृन्दावनगोचर परमानन्द- कन्द श्रीकृष्णचन्द्र ही अभिप्रेत हैं। फैली हुई वस्तु यदि इकट्ठी हो जाय तो उसमें कुछ विलक्षणता हो ही जाती है। अतः जो व्यापक पूर्णतत्त्व श्यामसुन्दररूपमें वृन्दारण्यमें गोचर हुआ, उसमें विलक्षणता होनी ही चाहिये। अथवा ‘वृन्दावने गाः चारयतीति वृन्दावन- गोचरः’—वृन्दावनमें गौएँ चरानेके कारण भगवान् वृन्दावन-गोचर हैं। जो परब्रह्म निर्विशेष है, वही यदि वृन्दावनमें गौ चरानेवाला हो जाय तो उसके प्रति प्रेमातिशय होना ही चाहिये; क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म स्वारसिकी प्रीतिका विषय नहीं हो सकता। उसका विषय तो यह वृन्दावनस्थ कृष्ण ही हो सकता है। स्वारसिकी प्रीति प्रायः सजातीयोंमें ही होती है। भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम तो मनुष्यरूपमें अभिव्यक्त हुए; फिर गोप होनेके कारण उनके सजातीय ही थे। इसलिये ऐश्वर्यादिशून्य होनेके कारण उनके प्रति गोपोंका निःसंकोच भाव रहता था। इसीसे गोपालरूपसे प्रकट हुए भगवान्के प्रति उन गोपालिकाओंकी निःशंक प्रीति हुई। अथवा ‘वृन्दावने वृन्दावनवर्तिनां गाः इन्द्रियाणि चारयति स्वस्मिन् प्रवर्तयति इति वृन्दावनगोचरः’— वे वृन्दावनवर्ती गोप, बालक, गोपांगना, वत्स, पशु, पक्षी और सरीसृप सभीकी इन्द्रियोंको अपने प्रति प्रवृत्त करते हैं, इसलिये वृन्दावनगोचर हैं। अहो! जो भगवान् ब्रह्मादिकी भी इन्द्रियोंके अगोचर हैं, जो बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी इन्द्रियोंके भी विषय नहीं होते, वे ही अपनी असीम कृपासे वृन्दावनवर्ती जीवोंकी समस्त इन्द्रियोंके विषय हो रहे हैं। इसीसे कहा है— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।११) उन परम पुण्यवान् व्रजवासियोंने उन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ क्रीड़ाएँ कीं, जो सत्पुरुषोंके लिये साक्षात् ब्रह्मानन्दमूर्ति, भावुक भक्तोंके परम इष्टदेव और मायामोहित पुरुषोंके लिये नरबालक थे। भावुकोंका तो ऐसा कथन है कि जो ब्रह्म औपनिषदोंके लिये केवल वृत्तिव्याप्य है, बड़े-बड़े भक्तोंकी भी केवल भावनाका ही विषय है और जो अज्ञानियोंके लिये एक बालकमात्र है, वही जिन्हें खेलनेको मिल गया, उन व्रजवासियोंके सौभाग्यकी क्या महिमा कही जाय? ‘ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः॥’ (श्रीमद्भा० १०।१५।१९) उन गँवार ग्वालबालोंके साथ वे ग्रामीणोंकी-सी ही चेष्टाएँ किया करते थे। यह उनके प्रेमातिशयका ही फल था।
श्रीरासलीलारहस्य २३३ यदि कहो कि ऐसा हो ही नहीं सकता; क्योंकि ‘न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य’ (कठ० २।३।९), ‘यन्मनसा न मनुते’ (केन० १।१।५) इत्यादि वचनोंके अनुसार ब्रह्म तो समस्त इन्द्रियोंका अविषय है। वह वृन्दावनवासियोंकी इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘यन्मनसा न मनुते’ इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार वह समस्त इन्द्रियोंका अविषय होनेपर भी ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ (कठ० १।३।१२)—इस श्रुतिके अनुसार सूक्ष्म बुद्धिका विषय तो है ही। इसी प्रकार वह प्रेमदृष्टिका भी विषय हो ही सकता है। जिस प्रकार ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस श्रुतिको देखकर आप यह कल्पना करते हैं कि वह संस्कृत बुद्धिका ही विषय होता है, असंस्कृत बुद्धिका विषय नहीं होता, उसी प्रकार हम भी यह कह सकते हैं कि वह प्रेमदृष्टिका विषय है; क्योंकि इस सम्बन्धमें ये वाक्य प्रमाण हैं— भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) ‘नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजभक्तितः॥’ यदि कहो कि नहीं, मनसे ब्रह्म नहीं देखा जा सकता। ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस वाक्यका अर्थ केवल इतना ही है कि महावाक्यके श्रवणसे ब्रह्मका आवरण निवृत्त होता है; फिर तो स्वयंप्रकाश ब्रह्मका स्वतः ही स्फुरण हो जायगा तो हम भी यही कह देंगे कि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है, प्रेमदृष्टिसे केवल उसका आवरण निवृत्त हो जाता है। अब यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि इन्द्रियगोचरत्वरूप हेतुके कारण ब्रह्म मिथ्या है तो ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इन्द्रियोंकी अविषयता तो परमाणुओंमें भी है तथापि वे मिथ्या नहीं माने गये हैं। अतः इन्द्रियगोचरतारूप हेतु मिथ्यात्वका साधक नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि श्रीकृष्णके सहवासके कारण ही व्रजांगनाओंने अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ क्षणार्धके समान बिता दी थीं और अब उनके बिना ही उन्हें साधारण रात्रियाँ भी कल्पके समान हो रही हैं। अतः जिन रात्रियोंने उन्हें इतना सुख पहुँचाया वे अवश्य विलक्षण ही थीं। इसका एक दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। महाराज परीक्षित्को एक बड़ा सन्देह था। उनके मनमें इस बातका बड़ा उद्वेग था कि भगवान् तो बड़े ही भक्तवत्सल हैं, उन्होंने सदा ही भक्तोंके ऊपर बड़ा अनुग्रह प्रदर्शित किया है; नन्द, उपनन्द आदि वृद्ध गोपोंको तो उन्होंने अपनी दिव्यातिदिव्य लीलाएँ दिखाकर परमानन्द प्रदान किया तथा उन्हें ब्रह्महद और महावैकुण्ठका भी दर्शन कराया; परंतु जो गोपांगनाएँ अनेक जन्मोंसे उनकी मधुरभावसे उपासना कर रही थीं, जिनमें अन्यपरा श्रुतियाँ, ऋषिचरी और देवकन्या आदि साधनसिद्धा व्रजांगनाएँ सम्मिलित हैं, यहाँतक कि उनमेंसे अनेकोंने तो भगवत्संस्पर्शकी कामनासे ललिता, विशाखा आदि यूथेश्वरियोंकी ही उपासना की थी—उन सबकी ओरसे न जाने भगवान् क्यों उदासीन थे? उनकी मनोकामना भी तो पूर्ण होनी ही चाहिये थी। भगवान् तो आप्तकाम हैं, फिर गोपांगनाओंकी मनोकामना कैसे पूर्ण हो? गोपांगनाओंकी तो यह अभिलाषा बहुत समयसे थी, किंतु जबतक भगवान्को रमणाभिलाष न हो, तबतक उसकी पूर्ति कैसे हो सकती है? परीक्षित्को यह सन्देह हो ही रहा था कि श्रीशुकदेवजी बोल उठे— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) तात्पर्य यह है कि ‘भगवानपि उपाश्रितः उपासितः मायां वीक्ष्य ता रात्रीश्चक्रे’—उनके द्वारा इस जन्म और पूर्वजन्मोंमें उपासित हुए भगवान्ने भी मायाकी ओर देखकर वे विलक्षण रात्रियाँ बनायीं। व्रजांगनाओंके विविध भेद इन मुनिरूपा और श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंके भी कई भेद हैं। श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंमें जो अनन्यपरा हैं,
२३४ भक्तिसुधा उनमें भी मानिनी और मुग्धा—ये दो भेद हैं। जो श्रुतियाँ निषेधमुखसे परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, वे मानिनी हैं; जैसे 'नेति नेति', 'अशब्दमस्पर्शमरू- पमव्ययम्' (कठ० १।३।१५) इत्यादि। भावुकोंने इसके बड़े विलक्षण तात्पर्य व्यक्त किये हैं। जिस प्रकार मानिनी नायिका ऊपरसे अनभिलाष दिखलाते हुए भी भीतरसे सर्वथा नायकका ही अनुकरण करती है, उसी प्रकार ये निषेधमुख श्रुतियाँ भी 'न-न' करके ही अपने परम ध्येय परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं। 'नेति-नेति' वचनामृत बोलती तथा मुग्धा साक्षात् रूपसे परब्रह्मका निरूपण करती हैं; जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म', (तैत्तिरीय० २।१) 'यत्साक्षाद- परोक्षाद् ब्रह्म' इत्यादि। इसके सिवा जो अन्यपरा श्रुतियाँ, मुनिचरी और देवकन्यारूपा व्रजांगनाएँ हैं, उनमें कोई तो सख्यभाववाली हैं और कोई कान्तभाववाली हैं। इनमें सख्यभाववती परिपक्वा हैं और कान्तभाववती अपरिपक्वा हैं। सख्यभाववालियोंका नित्य निकुंज-लीलामें भी प्रवेश है; क्योंकि उनका व्रत तत्सुखसुखित्व है तथा जो कान्तभाववती हैं, वे भी ललितादिकी उपासना करके सख्यभाववती हो जाती हैं; जैसा कि कहा है— मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः। ब्रह्म मां परमं प्रापुः सङ्गाच्छतसहस्रशः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।१३) अर्थात् जो मेरेमें जारभाव रखनेवालीं और मेरे स्वरूपको नहीं जानती थीं, वे भी यूथेश्वरी आदिके संगसे मुझ परब्रह्मको प्राप्त हो गयीं। इसका यह भी तात्पर्य है कि जो पहले कान्तभाववाली थीं, वे पीछे सख्यभाववाली हो गयीं। तब इसी श्लोकका दूसरे प्रकारसे अर्थ किया जायगा। 'मम इमाः मत्काः'—जो मेरी ममताकी आस्पद हैं; मैं स्वयं बड़े-बड़े योगीन्द्रोंकी ममताका आस्पद हूँ, और उनमें मेरी भी ममता है और अबला हैं; 'बलं आत्मनिष्ठादार्ढ्यं तच्छून्याः' अर्थात् आत्मनिष्ठाकी परिपक्वतासे रहित हैं; और मेरी प्राप्ति आत्मनिष्ठोंको ही होती है; क्योंकि श्रुति कहती है—'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'। (मुण्डक० ३।२।४) इसीसे यह भी कहा है—'पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत्' अर्थात् उपक्रमोपसंहारादि षड्विध लिंगसे श्रुतियोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें निश्चितकर फिर बाल्यसे—बालभावसे यानी संशय-विपर्ययरहित होकर स्थित हो। इस प्रकार जो मदीया होनेपर भी मेरेमें पूर्णतया परिनिष्ठिता नहीं है अथवा मेरे प्रति पूर्ण आत्मीयताका भाव नहीं रखतीं और कैसी हैं? 'अस्वरूपविदः' अर्थात् मैं शुद्ध-बुद्ध-परब्रह्म हूँ, ऐसा नहीं जानतीं अथवा जिन्हें मेरी परम प्रेमास्पदताका ज्ञान नहीं है; क्योंकि भगवान्के साथ प्रेम-सम्बन्ध हो जानेपर तो भक्त उनपर अपना अधिकार समझने लगता है; तब तो भक्तवर बिल्वमंगलकी तरह वह भी कहने लगता है— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ फिर तो विवश हो जानेके कारण उसके हृदयसे हरि कभी हटते ही नहीं। विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) जिस प्रकार पिघली हुई लाखमें यदि हल्दी मिला दी जाय तो फिर उन दोनोंका पार्थक्य नहीं हो सकता, उसी प्रकार भक्तके द्रवीभूत मनसे जब भगवान्के स्वरूपका तादात्म्य हो जाता है तो उनका कभी विप्रयोग नहीं होता। फिर भक्तहृदय भगवान्को नहीं भूल सकता और भगवान् भक्तके हृदयको नहीं छोड़ सकते। उन गोपांगनाओंका भाव इतना प्रौढ़ नहीं हुआ था; इसीसे वे अबला और अस्वरूपविद् थीं; किंतु उन्होंने भी 'ब्रह्म मां परमं प्रापुः'—मुझ परब्रह्मको प्राप्त कर लिया। कौन ब्रह्म? 'परमम्'—'परा उत्कृष्टतमा अभिमता मा श्रीराधा यस्य तम्।'
श्रीरासलीलारहस्य २३५ अर्थात् जिसको पराशक्ति मा*—श्रीराधिकाजी ही अभिमत हैं, उस परम ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। यह अर्थ सख्यभाववती गोपांगनाओंके लिये अनुकूल ही है; क्योंकि श्रीवृषभानुसुता स्वाधीनभर्तृका होनेके कारण मुख्य नायिका हैं; अतः वे ही भगवान्की परम प्रेयसी हैं। शेष सब सखियाँ कान्तभावशून्य सख्यभाववाली हैं; इसलिये वे उन सबकी भी सेव्य हैं। वह परब्रह्म कैसा है? 'मा रमणम्—मायां रमणं यस्य' अर्थात् जिसका ब्रह्माकारप्रमा अथवा श्रीवृषभानुनन्दिनीमें रमण है और कैसा है—'जारम्' अर्थात् जो जारबुद्धिसे वेद्यमात्र है, वस्तुतः जार नहीं; क्योंकि परमात्मा है। अथवा 'जरयति कामवासनाम् इति जारम्' कामवासनाको जीर्ण कर देता है; इसलिये ब्रह्म जार है। ऐसे मुझ परब्रह्मको 'ताः शतसहस्रशः सङ्गात्प्रापुः'—उन सैकड़ों-हजारों गोपांगनाओंने (ललितादिके) संगसे प्राप्त कर लिया अर्थात् पहले वे कान्तभाववाली थीं, किंतु इनके सहवाससे सख्यभाववाली हो गयीं। रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है—यह बात ऊपर कही जा चुकी है। उन रात्रियोंकी विलक्षणताका यद्यपि पहले भी वर्णन किया जा चुका है तथापि यहाँ हम फिर उनकी कुछ विलक्षणताओंका विचार करते हैं। उनमें एक तो यह बहुत बड़ी विलक्षणता थी कि अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंका एक ही समयमें निर्माण हुआ और वे सब-की-सब पूर्णचन्द्रसम्पन्ना थीं। यद्यपि दक्षप्रजापतिके शापके कारण चन्द्रमाकी पूर्णता स्थायी नहीं है तथापि यहाँ भगवान्ने जो रात्रियाँ बनायीं, वे सभी पूर्णचन्द्रसमलंकृता थीं। साथ ही एक विशेषता और भी थी। अन्य रात्रियोंमें चन्द्रमा पूर्व दिशामें उदित होकर जब मध्याकाशमें पहुँच जाता है तो फिर वह जैसे-जैसे पश्चिमकी ओर जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी ज्योति क्षीण होने लगती है; परंतु इन रात्रियोंमें चन्द्रमाकी गति केवल मध्याकाशपर्यन्त ही थी। इसके सिवा एक विचित्रता यह भी थी कि रात्रियोंका अनुभव केवल व्रजांगनाओंको ही हुआ था और सबके लिये तो वह एक प्राकृत रात्रि ही थी। यदि सबको ऐसा ही अनुभव होता तो इतने समयतक पुत्रप्राणा यशोदा और स्नेहमूर्ति नन्दबाबा किस प्रकार अपने लाड़ले लालका पार्थक्य सहन कर सकते? यह नियम है कि जब किसी दरिद्रको कोई महामूल्य रत्न मिल जाता है तो वह पल-पलमें उसकी सँभाल करता रहता है। इसी प्रकार माता यशोदा और नन्दबाबा भी अचिन्त्यानन्दघन परमानन्दमूर्ति भगवान् कृष्णको पुत्ररूपसे पाकर पल- पलमें उनका मुखचन्द्र निहारनेको लालायित रहते थे और रात्रिमें भी कई बार उठकर अपने लालकी देख- रेख करते थे। अतः उस रात्रिमें ही वे इतनी देर कैसे सोते रह सकते थे? परंतु वे जब उठे तभी उन्होंने श्रीकृष्णको अपने पास ही देखा। इस प्रकार ये रात्रियाँ बड़ी ही विचित्र थीं। इन्हीं रात्रियोंमें अनन्तकोटि व्रजांगनाओंकी चिरकालीन कामना पूर्ण हुई थी। इस सम्बन्धमें एक और भी विचार है। किन्हीं- किन्हींका मत है कि उस रात्रिमें शरद्, वसन्त और ग्रीष्म—इन तीनों ऋतुओंकी १८० रात्रियोंका अनुभव हुआ था और उनमें तीनों ही ऋतुओंकी रमणोपयोगी सामग्रियाँ विद्यमान थीं। रात्रियोंका नाम दोषा है। उनमें सदा ही कुछ-न-कुछ दोष रहते ही हैं, इससे रात्रिमें बहुत-से भय भी रहते हैं, किंतु भगवान्ने उन सब दोषोंकी निवृत्तिके लिये ये निर्दोष रात्रियाँ बनायीं। उनमें उपर्युक्त तीनों ऋतुओंकी रात्रियोंके समस्त गुण तो थे; किंतु दोष कोई न था। कोई ऐसा भी कहते हैं कि तीन ही क्या, उनमें तो सभी ऋतुओंकी रात्रियोंका निवेश किया गया था; क्योंकि वहाँ सभी ऋतुओंमें सेवन करनेयोग्य भोग्य-सामग्री देखी जाती है। इसके सिवा 'उत्फुल्लमल्लिकाः' इस विशेषणका भी यही तात्पर्य है कि उन रात्रियोंमें मल्लिकोपलक्षित सभी पुष्प खिले हुए थे। बहुत-से
- मीयते सेव्यते प्राप्यते ज्ञायते योगीन्द्रमुनीन्द्रैर्वेदैश्च या सा मा।
२३६ भक्तिसुधा
पुष्प ऐसे हैं, जो रात्रिमें नहीं खिलते, परंतु वहाँ कुन्द और कुमुद साथ-साथ खिले हुए थे। जैसे— 'रेमे तत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।४५) और— 'कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) इससे सिद्ध क्या होता है ? सो बतलाते हैं— वसन्त-ऋतु कामदेवका मित्र है। वह अभीतक अपने मित्रके वियोगमें सन्तप्त था। आज उसने सोचा कि जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र अपनी सौन्दर्य-सुधासे आत्माराम मुनियोंके भी मनोंको मोहित करनेवाले हैं, आज वे ही श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरियोंके सौन्दर्यकणसे मोहित हो रहे हैं—'तद्दृशो दारुयन्त्रवत्।' अतः सम्भव है, आज परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र और व्रजसुन्दरियोंके सम्प्रयोगमें हमारे परम मित्र मनोजका उद्भव हो जाय। अतः इनके स्वागतके लिये हमें भी खूब तैयारी करनी चाहिये। इसीसे मानो मनोजमित्र ऋतुराजने सारे पुष्पोंको एक साथ विकसित कर दिया है। यद्यपि शरद्-ऋतुमें पुष्पोंका विकास रुक जाता है तथापि पुष्पविकासके विरोधी जाड्यमय शरद्-ऋतुमें भी मल्लिकादि उपलक्षित समस्त पुष्प खिल गये अर्थात् उस जाड्यमय समयमें भी पुष्पोंका विकास ही नहीं हुआ, प्रत्युत वे अत्यन्त विकसित हो उठे। किन्हीं-किन्हींका कथन है कि मल्लिकापुष्प शरद्-ऋतुमें फुल्लित होते हैं, वसन्तमें उन्मुख होते हैं और ग्रीष्ममें उत्फुल्ल हो जाते हैं; अतः यहाँ उत्फुल्लमल्लिका कहकर विरोधाभास द्योतित किया है। इससे सूचित होता है कि यहाँ शरदमें वसन्त- ऋतुका निवेश किया था। साथ ही वसन्तने यह भी सोचा कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे मित्र कामदेवको परास्त करनेका आयोजन कर रहे हैं। वह उनका प्रभाव जानता ही था। उसे यह मालूम था ही कि इन्होंने इन्द्र और ब्रह्माका भी मान-मर्दन कर दिया है। यही दशा कुबेर और वरुणकी भी हुई थी। अब ये सबपर विजय प्राप्त करके हमारे मित्रको भी जीतना चाहते हैं; परंतु वे भी किसीसे कम नहीं हैं। वे भी ब्रह्मादि-विजय-संरूंढदर्प हैं। अतः वसन्तने सोचा कि यह बड़ा विकट युद्ध होगा। इसलिये हमें मित्रवर मनोजकी सहायता करनी चाहिये; क्योंकि— धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिअहिं चारी ॥ (रा०च०मा० ३।५।७) अच्छा तो, हमें क्या करना चाहिये ? वीरोंके लिये सबसे बड़ी सहायता यही है कि उनके पास अस्त्र- शस्त्रोंकी कमी न रहे। हमारे मित्र पुष्पधन्वा हैं और उनके शस्त्र भी पुष्प ही हैं। अतः उनकी सहायताके लिये मुझे समस्त वृन्दारण्यको विविध प्रकारके सुन्दर और सुवासित सुमनोंसे सुसज्जित कर देना चाहिये। इसीसे उसने यथायोग्य कालकी अपेक्षा न करके सब प्रकारके पुष्पोंको विकसित कर दिया है। कामोद्रेकके आलम्बन-विभाव नायकके लिये नायिका और नायिकाके लिये नायक हैं तथा पुष्प, चन्द्रज्योत्स्ना, मलयानिल आदि उसके उद्दीपन-विभाव हैं। पुष्प तो साक्षात् कन्दर्पके बाण ही हैं। उनमें कुन्दकुड्मल तो शूलका काम करता है, जो उद्दीपन-विभाव नायक-नायिकाके संयोगमें रसवृद्धि करनेवाले हैं, वे ही उनका वियोग होनेपर अत्यन्त दुःखद हो जाते हैं। उस अवस्थामें कुन्दकुसुम शूल हो जाते हैं, केतक (केवड़ा) भालेका काम करता है और किंशुक (पलाशपुष्प) मानो अर्धचन्द्र बाण हो जाता है। किंशुकपुष्प रक्तवर्ण होता है, सो मानो वह विरहियोंका वक्षस्थल विदीर्ण करके उनके रक्तसे रंजित हो रहा है। इसी प्रकार अन्य पुष्पोंमें भी विभिन्न शस्त्रास्त्रकी कल्पना कर लेनी चाहिये। भगवान्की रची हुई ये रात्रियाँ प्राकृत नहीं थीं। अप्राकृत भगवान्के साथ अप्राकृत गोपांगनाओंकी यह अप्राकृत लीला अप्राकृत रात्रियोंमें ही होनी चाहिये थी। अतः भगवान्ने उन अप्राकृत रात्रियोंका निर्माण किया। इस प्रकार भगवान्ने रात्रियाँ तो बना लीं; परंतु
श्रीरासलीलारहस्य २३७ उनको अपना मन तो है नहीं, 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः।' इसलिये उन्होंने 'मनश्चक्रे' मन भी बनाया। तात्पर्य यह है कि अभीतक तो यही समझा जाता था कि भगवान् देह-देही-विभागसे रहित हैं; वे केवल भक्तानुग्रहके लिये ही शरीरादिमान्से प्रतीत होते थे। परंतु यह लीला इस तरह नहीं होगी। यहाँ तो उन्हें व्यासक्तचित्त होना पड़ेगा। यदि अमना भगवान् रमण करेंगे तो व्रजांगनाओंकी कामना पूर्ण न होगी। इसीसे उन्होंने मन भी बनाया। परंतु बनाया कैसे? 'योगमायां वीक्ष्य'— योगमायाकी ओर देखकर। इसमें उन्हें कोई कठिनता नहीं हुई; उन्होंने योगमायाकी ओर केवल देख दिया। उस निरीक्षणसे सब बात अपने-आप बन गयी। वह योगमाया क्या है? 'योगाय रमणाय अथवा अघटित- घटनाय या माया कृपा' अर्थात् रमण अथवा अघटित घटनाके लिये जो माया यानी कृपा है, वही योगमाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि अमनाका मनोनिर्माण और दोषा रात्रियोंको निर्दोष बनाना अघटितघटना ही तो है। ऊपर जो विवेचन किया गया है, उसके अनुसार 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' इस पदकी व्युत्पत्ति एक अन्य प्रकारसे भी हो सकती है। यथा— 'शरान् ददातीति शरदः वसन्तः तेन उत्फुल्लानि मल्लिकोपलक्षितानि सर्वाणि पुष्पाणि यासु ताः।' अर्थात् जो कामदेवको शर प्रदान करता है, वह वसन्त ही शरद् है, उसने जिन रात्रियोंमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त पुष्पोंको विकसित कर दिया है, वे रात्रियाँ ही 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। शरद्-ऋतु विशेषतया जड़ताकी सूचक होती है। अतः इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि इस लीलाके प्रभावसे जाड्यमय-मलविशेषादिसमाक्रान्त मनमें भी मल्लिकाके समान प्रेमतत्त्वका विकास हो जाता है तथा भगवत्स्वरूप और भगवल्लीलाओंका अनुशीलन ही प्रधानतया प्रेमतत्त्वके आविर्भावमें हेतु है। प्रेमके आविर्भावमें जड़ाजड़का विचार भी नहीं है। इसीसे यहाँ दिखलाया है कि वृन्दावनमें जितने भी तृण-लता एवं वृक्षादि हैं, वे अचेतन नहीं, बल्कि चेतन ही हैं; यदि वे जड़ अर्थात् स्वभावपरतन्त्र होते तो शरद्-ऋतुमें असमय ही मल्लिकाओंका विकास कैसे होता? इन्हें अवसरका ज्ञान है और ये अपने स्वभावका भी विचार रखते हैं, इसीसे भगवल्लीलाका सुअवसर देखकर असमयमें भी वे पुष्पादि-सम्पन्न हो गये। इससे सिद्ध होता है कि व्रजके तरुवर एवं लताएँ भी चेतन ही हैं। इसीसे भगवान्ने बलभद्रजीका गुणकीर्तन करते हुए उनसे निवेदन किया था—'प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या' (श्रीमद्भा० १०।१५।६)—ये तरुवर सम्भवतः आपके प्रधान भक्त मुनिजन ही हैं। ये अपने आत्मभूत आपको किसी भी दशामें छोड़ना नहीं चाहते। अतः जिस प्रकार आप मनुष्याकार होकर गूढ़रूपसे लीला कर रहे हैं, उसी प्रकार ये भी वृक्षादिरूप होकर आपकी सेवामें उपस्थित हो गये हैं। ये अपनी पुष्पादि-सम्पन्न शाखारूप शिखाओंसे आपके पदतलसंस्पृष्ट पृथिवी- तलका स्पर्श करना चाहते हैं। इसके सिवा एक अन्य प्रसंगमें यह भी कहा है कि ये वृक्ष मानो वेदद्रुम हैं, इनकी जो शाखाएँ हैं, वे मानो माध्यन्दिनी आदि वेदकी शाखाएँ हैं, पल्लव मानो उपनिषदें हैं और उनपर जो पक्षी हैं, वे मानो आत्माराम मुनिगण हैं— 'आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्त्यमीलितदृशो विगतान्यवाचः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।१४) 'जो मनोहर-शोभारूप वृक्षकी भुजाओंपर आरूढ़ होकर अन्य किसी प्रकारका शब्द न करते हुए खुले नेत्रोंसे वंशीध्वनि श्रवण करते रहते हैं।' यहाँ 'अमीलितदृशः' यह पद विशेष रहस्यपूर्ण है। यद्यपि कानोंसे मुरलीध्वनि सुनते समय नेत्रोंका व्यापार रुक जाता है; क्योंकि जिस समय मन एक इन्द्रियके विषयका आस्वादन करनेमें तत्पर है, उस समय वह
२३८ भक्तिसुधा दूसरे इन्द्रियके विषयको किस प्रकार ग्रहण करेगा ? किंतु आपके रूप-लावण्यका तो विलक्षण माधुर्य है; वह उनके नेत्रोंको बन्द ही नहीं होने देता। अतः मालूम होता है कि ये पक्षिगण अवश्य कोई भगवत्कथानुरागी मुनिजन ही हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ भगवत्प्रकाश होता है, वहाँ सभी प्रकारके दोषोंका निराकरण होकर समस्त गुणोंका समावेश हो जाता है। यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। (श्रीमद्भा० ५।१८।१२) अर्थात् जहाँ श्रीहरिकी अनुरक्ति रहती है, वहाँ समस्त गुणोंके सहित सम्पूर्ण देव निवास करते हैं और वहाँ समस्त दोषोंका अभाव हो जाता है। जो पुण्यात्मा लोग श्रीपुरुषोत्तमभगवान्के प्रति भक्तिभाव रखनेवाले हैं, उनमें न क्रोध रहता है, न मत्सरता रहती है और न लोभ या अशुभ मति ही रहती है—'न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।' अतः यदि भगवल्लीलाके लिये रची हुई उन दिव्य रात्रियोंमें समस्त गुणोंका विकास हुआ तो आश्चर्य ही क्या है ? इसीसे यहाँ एक दूसरा अर्थ भी किया जाता है— 'यः अगमायामुपाश्रितः'—'न गच्छन्तीति अगाः तत्रत्याः वृक्षाः तेषां या स्वविषयिणी मा मतिः प्रेमवती बुद्धिः मा अगमा तस्याम् उपाश्रितः तन्निमित्तमेव भगवान् ता आहूय रन्तुं मनश्चक्रे। अर्थात् जो विचलित नहीं होते, वे वहाँके वृक्ष ही 'अग' हैं, उनकी जो अपने प्रति प्रेमवती बुद्धि है, वही 'मा' है, उस अगमाका आश्रयकर अर्थात् उसीके लिये भगवान्ने उन गोपांगनाओंको बुलाकर रमण करनेकी इच्छा की। इसका सीधा-सादा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि भगवान्ने योगमायाका आश्रय लेकर उनके लौकिक-बन्धनोंका विच्छेद करनेके लिये उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। भगवान्ने देखा कि ये गोपांगनाएँ जन्म-जन्मान्तरसे मेरी उपासना करनेके कारण मेरे साथ रमण करनेयोग्य हो गयी हैं, ये लोककृत लज्जादि-बन्धनके योग्य नहीं हैं, किंतु दूसरी ओर उन्होंने यह भी देखा कि वे लौकिक बन्धनोंसे बँधी हुई हैं। इस प्रकार उनका दोनों ओर खिंचाव है। तथापि वे हैं कैसी ? 'रात्रीः' अर्थात् अपनेको और अपने सर्वस्वको मेरे ही पादपद्मोंमें समर्पण करनेवाली हैं। इनके धन, रूप और जीवन सब मेरे ही लिये हैं। इनकी दृष्टिमें मेरे बिना जीवनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें इस प्रकार उभयतः पाशरज्जुमें बँधा हुआ देखकर भगवान्ने अयोगाय— उनके लोक-कुल-लज्जादिरूप बन्धनके विच्छेदके लिये माया—कृपाका आश्रय लेकर उनके साथ रमणकी इच्छा की। इसीसे उन्होंने वेणुनादके द्वारा उनके लोक एवं कुल आदिके बन्धनोंको विच्छिन्न करके उन्हें प्रेमाकुल कर दिया। अथवा— 'अयस्कान्तमणिं प्रति अयोवद् अच्छति स्वभक्तान् प्रति या सा अयोगा; अयोगा चासौ माया—कृपा अयोगामाया'— जो अपने भक्तोंके प्रति इस प्रकार आकर्षित हो, जैसे लोहा चुम्बककी ओर, उसका नाम अयोगा है, ऐसी जो अयोगा माया—कृपा है, उसे ही अयोगमाया समझना चाहिये; क्योंकि भगवान्की कृपा भक्तोंके प्रति उसी प्रकार आकर्षित हो जाती है, जैसे चुम्बकके प्रति लोहा। यद्यपि भगवान्की कृपा सर्वदा सर्वत्र है तथापि उसका आकर्षण करनेमें भक्तजन ही समर्थ हैं। अतः भगवान् भी उसी कृपाके अधीन होकर उनके साथ रमण करनेको उद्यत हो गये; क्योंकि भगवान्की जो ऐश्वर्यशक्ति और मायाशक्ति हैं, वे भी अपनी नियन्त्री इस कृपाशक्तिके ही अधीन हैं। अथवा परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका जो दिव्य मंगलमय वपु है, वह अयस्कान्तमणिके समान है,
श्रीरासलीलारहस्य २३९ उसके प्रति जो 'अय:'—लोहेके समान आकर्षित होती हैं, वे ब्रजवनिताएँ ही अयोगा हैं। तात्पर्य यह है कि गोपांगनाएँ भगवान्के पास अपनी इच्छासे नहीं गयीं, बल्कि भगवत्सौन्दर्यरूप अयस्कान्तने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया। अतः उनपर कृपा करके भगवान्ने वे रात्रियाँ बनायीं। अथवा— 'स्वेन सह युज्यन्ते ये ते योगाः गोपदाराः; तेषां या माया—कृपा तामूपाश्रितः योगमाया- मुपाश्रितः।' अर्थात् जो अपनेसे युक्त होनेवाली हैं, वे गोपवधूटी ही 'योगा' हैं। उनके प्रति जो माया है, उसीका नाम योगमाया है। उसका आश्रय लेकर उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। इस प्रकार अयोग और योग—दोनों ही पदोंसे गोपांगनाएँ अभिप्रेत हैं। अतः— 'योगानामयोगानाञ्च या मा स्वविषयीणी प्रीतिमती* मा प्रमा स्निग्धा मानसी वृत्तिः सा योगमा।' अर्थात् योग और अयोग, इन दोनोंकी ही जो अपने प्रति प्रेममयी मनोवृत्ति है, वह योगमाया है। भक्ति और ज्ञान ये दोनों अन्तःकरणके ही परिणाम हैं। परमप्रेमास्पद भगवान्का जो अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक चिन्तन है, वही भक्ति है। इसी प्रकार प्रमा भी अन्तःकरणकी ही वृत्ति है, परंतु जो मानसिक द्रवताकी अपेक्षासे रहित अन्तःकरणकी प्रमायाकाराकारित वृत्ति है, उसका नाम प्रमा है और जो प्रमाण अथवा संस्कारजनित द्रवताकी अपेक्षावाली प्रेमास्पदाकारा वृत्ति है, उसे भक्ति कहते हैं। वेदान्तमें जिन भक्ति और ज्ञानका विचार किया गया है उनके स्वरूप, साधन और फल श्रीमद्मधुसूदन स्वामीने भिन्न-भिन्न बतलाये हैं। वे कहते हैं कि अन्तःकरणकी जो सविशेष भगवदाकाराकारित स्निग्धा वृत्ति है, वह भक्ति है और जो अन्तःकरणद्रवतानपेक्ष महावाक्यजनित निर्विशेष ब्रह्माकाराकारित वृत्ति है, उसे ज्ञान कहते हैं। भक्तोंके तीन भेद उनके कथनानुसार भक्तिके तीन भेद हैं— प्राकृता, मध्यमा और उत्तमा। उनमें प्राकृत भक्त वह है जो केवल भगवान्की प्रतिमाओंमें ही श्रद्धा रखता है और उन्हींकी पूजा करता है, भगवान्के भक्तों तथा अन्य पुरुषोंमें श्रद्धा नहीं रखता; यथा— अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४७) जो ईश्वरमें प्रेम करता है, भगवान्के आश्रित रहनेवालोंके प्रति मित्रताका भाव रखता है, मूर्खोंपर कृपा करता है और भगवद्वेषियोंकी उपेक्षा करता है, वह मध्यम है— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४६) उत्तम भक्त उसे कहते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपना भगवद्भाव देखता है और समस्त प्राणियोंको अपने आत्मारूप भगवान्में देखता है, जैसा कि कहा है— सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४५) ऊपरके श्लोकका तात्पर्य यह है—'आत्मनः स्वस्य त्वंपदार्थस्य भगवद्भावं तत्पदार्थत्वं सर्वभूतेषु पश्येत्' अर्थात् (जिस प्रकार उपाधिका बाध करने पर घटाकाशकी महाकाशरूपसे व्यापकता है, उसी प्रकार) जो समस्त प्राणियोंमें तत्पदार्थरूपसे त्वंपदार्थकी व्यापकता देखता है एवं भगवदभिन्न आत्मामें समस्त भूतोंको कल्पित रूपसे देखता है, अथवा 'आत्मनोऽ- न्तर्यामिणो भगवद्भावमैश्वर्यवत्त्वं नियन्तृत्वं सर्वत्र भावयति तथा भगवति परमैश्वर्यवत्यात्मनि आत्मनियम्यत्वेनाधेयत्वेन च भूतानि पश्येत्' अर्थात् जो सर्वत्र आत्मा यानी अन्तर्यामीका भगवद्भाव—
- प्रीतिर्द्रुतिः प्रणयो द्रवावस्था इति मधुसूदनस्वाम्युक्तेः।
२४० भक्तिसुधा ऐश्वर्यवत्त्व अर्थात् नियन्तृत्व देखता है और भगवान्— परम ऐश्वर्यवान् परमात्मामें उसके नियम्य और आधेयरूपसे समस्त भूतोंको देखता है, वही श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। इनमें जो उत्तमा भक्ति है, वह भी तीन प्रकारकी है। जहाँ भगवदाकाराकारित अन्तःकरणसे समस्त विद्यमान जगत्का भगवद्रूपसे ग्रहण किया जाय, वह प्रथम कोटिकी उत्तमा-भक्ति है। ऊपर जो उत्तमा- भक्तिका लक्षण बतलाया है, वह प्रथम कोटिकी ही है। दूसरी कोटिकी उत्तमा-भक्ति वह है, जहाँ भगवदाकाराकारित द्रुत अन्तःकरणसे प्रपंचमिथ्यात्व- निश्चयपूर्वक सबकी भगवद्रूपताका निश्चय किया जाय; जैसे कि कहा है— तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्। त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) और जहाँ प्रपंचके मिथ्यात्व और सत्यत्व दोनों ही भावोंसे रहित द्रुतचित्तसे केवल भगवान्का ही ग्रहण हो, वह तीसरी कोटिकी उत्तमा भक्ति है; जैसे— ध्यायतःचरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥ प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७-१८) इस प्रकार द्रुतचित्तकी भगवदाकारा मानसी वृत्तिको 'मा' कहते हैं; अयोगोंकी जो मा-प्रीति अर्थात् मति है, वही 'अयोगमा' है, उस अयोगमामें उपाश्रित हुए अर्थात् व्रजांगनाओंकी ऐसी प्रीतिमती बुद्धिसे आकर्षित हुए भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् अपने प्रति जो ऐसी प्रीतिमती बुद्धि है, उसके परतन्त्र हुए भगवान् उन गोपांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि भगवान् प्रेम-मधु-मधुकर हैं और जो प्रेम- मधु-आकर सुमनसोंके सुमनस हैं, उनके प्रति भगवान्का आकर्षण होना उचित ही है। उधर जिनका चित्त समस्त सुमनाओंके सुमनस श्रीभगवान्के प्रति आकर्षित होता है, वे सुमना कहे जाते हैं। श्रीभगवान्के प्रति आकर्षित होना ही उनका सुमनस्त्व है। अतः शोभन स्वभाववालोंका सिद्धान्त यही है कि भगवान्से प्रीति करें। वही वाक् सुन्दर है, जिसे भगवान्का गुणगान होता है, वे ही कर्णपुट धन्य हैं, जिनसे भगवत्कथाओंका श्रवण होता है और वे ही चरण धन्य हैं, जिनसे भगवद्धामोंमें गमन होता है। इसीसे अर्जुनसे भी भगवान्ने यही कहा है— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ (गीता १२।८; १८।६५) यह बात तो अमना भगवान्के विषयमें है। ये व्रजांगनाएँ तो सुमनसोंकी शिरोमणि हैं। अतः उनका जो मन है, वह तो प्रेमका आकर है ही। उनके प्रेमकणसे ही समस्त संसार प्रेममय हो रहा है। अतः इनके प्रेममधु-आकर मनका प्रेम-मधु-मधुप भगवान् समाश्रयण करेंगे ही। इसीसे भगवान्ने गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। अथवा 'योगमायामुपाश्रितः'—इस पदका यह तात्पर्य समझो—'अन्यत्र चञ्चलापि भगवत्य- चञ्चला या मा सा अगमा तस्यामुपाश्रितो यः' अर्थात् अन्यत्र चंचला होनेपर भी जो भगवान्के प्रति अचंचला है, उस मा—लक्ष्मीको अगमा कहते हैं। उस अगमामें जो भगवान् उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। यह बात गोपांगनाओंके प्रेमसौष्ठवकी द्योतक है। इसीके पोषणमें यह भी अर्थ किया जाता है—'अगमा दुरवगममाहात्म्या या मा वृषभानुनन्दिनी तस्यामुपाश्रितः'—जिन श्रीवृषभानुनन्दिनीका माहात्म्य अत्यन्त दुर्बोध है, उनमें आश्रित जो भगवान् उन्होंने
रमणकी इच्छा की। इसका तात्पर्य यह है कि लक्ष्मीजीका माहात्म्य तो सुज्ञेय है, किंतु श्रीवृषभानु- नन्दिनीकी महिमा अत्यन्त दुर्बोध है; क्योंकि जिन श्रीभगवान्के कृपाकटाक्षकी अपेक्षा समस्त देवगण रखते हैं, वे ही इनके कृपाकटाक्षकी बाट निहारा करते हैं। वे वृषभानुनन्दिनी कैसी हैं? 'न गच्छतीति अगा, अगा अचला सदैकरूपा मा अङ्गशोभा सौन्दर्यलक्ष्मीः यस्याः सा'—अर्थात् जिनके अंगकी शोभा सर्वथा अक्षुण्ण है, उन्हीं श्रीराधिकाजीके अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्यसे मोहित हुए श्रीभगवान्ने उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यहाँतक अज्ञ और मुमुक्षुओंकी दृष्टिसे अर्थ किये गये; अब मुक्तोंकी दृष्टिसे व्याख्या करते हैं— 'ताः ज्ञानीरूपाः प्रजा वीक्ष्य ता आहूय ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उन ज्ञानीरूपा प्रजाओंको देखकर उनका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। वे ज्ञानीरूपा प्रजाएँ कैसी हैं?—'ताः'—तदात्मिका अर्थात् भगवद्रूपा हैं, क्योंकि ऐसा कहा भी है—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्ति- र्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि और कैसी हैं?—'रात्रीः' अर्थात् भगवान्में अशेष-विशेष-समर्पण करनेवाली हैं। यहाँ पूर्ण स्वात्मसमर्पण है; क्योंकि अन्य-निष्ठाओंमें अपना पृथक् अस्तित्व रह ही जाता है अथवा 'रात्रीः' पदका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि वह आत्मस्वरूपा होनेके कारण रात्रियोंके समान हैं; क्योंकि ये आत्मस्वरूपा हैं और व्यवहारका अविषय होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये आत्मा रात्रिरूप ही है अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि जितना व्यावहारिक प्रपंच है, वह जिसकी दृष्टिमें रात्रिरूप अर्थात् असत् है, वह ज्ञानीरूपा प्रजा रात्रि है अथवा जिस प्रकार रात्रि अस्पष्टप्रकाशवाली होती है, उसी प्रकार यह ज्ञानीरूपा प्रजा भी अस्पष्टप्रकाशा अर्थात् अव्यक्त गति है; जैसा कि कहा भी है— 'अव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचाराः' यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥ (नारदपरिव्राजकोपनिषद ४।३४) पुनः यह ज्ञानीरूपा प्रजा कैसी है ? 'शरद्यपि जाड्यमये अविद्यालेशावशेष- युक्तेऽपि अन्तःकरणे उत्फुल्लानि मल्लिकोप- लक्षितशान्तिदान्त्याद्यशेषपुष्पाणि यासां हृदि इति शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।' अर्थात् शरदमें यानी जिनके अविद्यालेशावशेषयुक्त अन्तःकरणमें भी शान्ति, दान्ति आदि मल्लिकोपलक्षित समस्त पुण्य विकसित हो रहे हैं। अथवा— 'विवेकविचाररूपैः शरैरर्दिताः खण्डिताः इति शारदाः उत्फुल्लमल्लिकाः उत्फुल्लमल्लिका- द्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् विवेक-विचाररूप शरोंसे खण्डित उत्फुल्लमल्लिकादि उपलक्षित संसारसुख हैं जिनमें, वे रात्रियाँ 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। अथवा— 'शरदा निमित्तेन शान्त्यावहेन उत्फुल्ल- मल्लिकाभासानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् शान्ति आदिके कारण जिनके लिये संसारसुख केवल पुष्परूप यानी देखनेमात्रके लिये रह गये, ऐसी प्रजाओंको देखकर भगवान्ने योगमायाका आश्रय ले, उन प्रजाओंका आवाहनकर उनके अन्तःकरणमें रमण करनेका विचार किया; क्योंकि ज्ञानीरूपा प्रजाका रमण अपने आत्मभूत भगवान्के ही साथ होता है। ज्ञानी लोग आत्मरति ही हुआ करते हैं। इसीसे ज्ञानीको लक्ष्य करके कहा है— 'एकभक्तिर्विशिष्यते', क्योंकि उसकी भक्ति, रति, मति एकमात्र भगवान्में ही होती है। भगवान्की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये कोई ऐसा भी कहते हैं कि भगवान्की यह लीला मुमुक्षुओंके ही लिये है। इस लीलाके व्याजसे भगवान्ने निवृत्तिपक्षका ही पोषण किया है। भगवान्ने
२४२ भक्तिसुधा इस लीलाद्वारा यह प्रदर्शित किया है कि जिनके एक रोमकें सौन्दर्यकणसे भी अनन्तकोटि कन्दर्पोंका दर्प दलित हो जाता है, उन्हीं श्रीहरिके साथ सुरम्य यमुनाकूलमें अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंपर्यन्त रमण करके भी व्रजबलाएँ सन्तुष्ट नहीं हुईं तो साधारण सांसारिक लोग इन बाह्यविषयोंसे किस प्रकार सन्तुष्ट हो सकते हैं? इस लीलाद्वारा भगवान्ने अपनेमें अनुरक्तोंकी अनुरक्ति और संसारसे विरक्तोंकी विरक्ति दोनों ही पुष्ट की है। इसी प्रकार भगवान् श्रीरामने भी सीताहरणके पश्चात् शोकाकुल होकर विषयासक्त पुरुषोंकी दुर्दशाका प्रदर्शन किया था—‘कामिन्ह कै दीनता देखाई।’ (रा०च०मा० ३।३९।२) भगवान् श्रीराम स्वयं तो अच्युत हैं, उन्हें कोई भी परिस्थिति कैसे विचलित कर सकती है? और अपनी आह्लादिनी- शक्ति श्रीजनकनन्दिनीजीसे उनका वियोग होना भी कब सम्भव है? परंतु इस नरना
ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः॥ —ऐसी जो मुमुक्षुरूपा प्रजा है, उसे देखकर अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि निष्काम कर्मरूप भगवदाराधन करनेसे—क्योंकि निष्काम कर्म ही सबसे पहला भगवदाराधन है—जिसमें शान्ति- दान्तिरूप पुष्प विकसित हो रहे हैं। ये पुष्प मुमुक्षुओंको अत्यन्त अपेक्षित भी हैं; जैसा कि कहा है— 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा- त्मन्येवात्मानं पश्यति।' (जाबालोपनिषद् खण्ड ९) इस प्रकार निष्काम-कर्मद्वारा साधनचतुष्टयसम्पन्न हुई प्रजाओंको देखकर उनके हृदयोंमें श्रुतियोंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि जो पुरुष भगवदाराधनद्वारा शुद्धान्तःकरण नहीं है, उनके अन्तःकरणमें श्रुतियोंका ब्रह्मपरत्व निश्चित नहीं होता। अशुद्ध अन्तःकरणमें ऐसा होना असम्भव है। अतः उन मुमुक्षुओंके अन्तःकरणोंमें उनका परम तात्पर्य निश्चयकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः अगामायां स्वस्माद- गच्छत्सु गोपदारेषु या माया कृपा तां उपाश्रितः। अर्थात् अपने पाससे न जानेवाली गोपांगनाओंके प्रति (माया) कृपाका आश्रय लेकर। अथवा— 'अगा अचला मा मतिः यस्याः सा अगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णसे कभी नहीं हटता था, जिनके मन, देह और इन्द्रियवर्ग भगवान्से तनिक भी बिछुड़ना नहीं चाहते थे, उन गोपांगनाओंमें उपाश्रित हो भगवान्ने रमणकी इच्छा की। जब भगवान्का वेणुनाद सुनकर समस्त व्रजवनिताएँ भगवान्के पास दौड़ आयीं और भगवान्ने उन्हें पातिव्रतका उपदेश देते हुए घर लौट जानेको कहा तो वे कहने लगीं— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्वशत्युत करावपि गृहकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्होंने कहा—जो चित्त गृहकृत्योंमें लग सकता था, उसे तो आपने हर लिया। रहे हाथ, सो वे भी उसी समय घरके धन्धोंमें प्रवृत्त होते हैं, जब चित्त इनका साथ दे और तभी चरण भी चल सकते हैं। किंतु अब, जब कि आपने वेणुनादद्वारा हमारा चित्त हर लिया है, हमारा मन उनमें कैसे लग सकता है? अब तो आपसे विमुख होकर ये चरण आपके चरणोंको छोड़कर एक पग भी नहीं चल सकते। अतः हम किस प्रकार व्रजको जायें और करें तो क्या करें? इससे सिद्ध हुआ कि व्रजांगनाओंके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और देह—ये सब भगवत्परतन्त्र हैं। 'अयोगमायामुपाश्रितः'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है— 'अयोगाय मायाः* शब्दो यस्यां सा अयोगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहारमें उपयोगी जितने पुत्र, पति आदि हैं, उनके अयोग अथवा लौकिक, वैदिक व्यवहारोंके अयोग—असम्बन्धके लिये जिसमें शब्द है, उस मुरलीका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। व्रजांगनाएँ लौकिक-वैदिक कर्मोंमें परिनिष्ठित थीं। उनका लौकिक-वैदिक-कर्मोंसे विच्छेद करानेके लिये अथवा उन्हें भगवद्व्यतिरिक्त सम्बन्धोंसे छुड़ानेके लिये इस मुरलिकाका शब्द अत्यन्त समर्थ है; क्योंकि इसीसे आकर्षित होकर वे सारे सम्बन्धों और कृत्योंको तिलांजलि देकर भगवान्की सन्निधिमें आती हैं। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय भगवता सम्बन्धाय माया कृपा यस्याः कात्यायन्यास्तां
- 'माइमाने शब्दे च'।
२४४ भक्तिसुधा कात्यायनीमुपाश्रितः भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे ।' अर्थात् योग (भगवान्के साथ सम्बन्ध) करानेके लिये जिसकी माया-कृपा है, उस कात्यायनीदेवीका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा- 'योगाय सम्बन्धाय मां मतिम् आययति प्रापयति या सा योगमाया कात्यायनी तामुपाश्रितः।'
- योग अर्थात् सम्बन्धके लिये जो मां- मतिको प्राप्त कराती है, वह कात्यायनीदेवी ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि कात्यायनीदेवीके अर्चनद्वारा ही ऐसा अदृष्ट हुआ था कि जिससे गोपांगनाओंको भगवान्की प्राप्ति हुई। अथवा- 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह सम्बन्धाय भगवतः श्रीकृष्णस्य मां मतिम् आययति या सा वृषभानुनन्दिनी योगमाया तामुपाश्रितः ।'
- व्रजांगनाओंके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये भगवान्की बुद्धिको प्रवृत्त करनेवाली जो श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं, वे ही योगमाया हैं, उनका आश्रयकर उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। लोकमें तो सापत्न्य-भाववश ईर्ष्या रहा करती है; परंतु इधर श्रीवृषभानुनन्दिनी परम करुणामयी हैं; उनमें सापत्न्यभाव नहीं है। उनके कारण उनकी लीला-भूमिके जीव- जन्तुओंका भी पारस्परिक विरोध निवृत्त हो जाता है। इसीसे वहाँ समस्त ऋतुओंका एकत्र समावेश होता है। तो फिर स्वयं उन वृषभानुदुलारीमें ही विरोध कैसे रह सकता है ? वे तो यही चाहती हैं कि सारा संसार मेरे ही समान भगवान्के अतिविशुद्ध सौन्दर्यसुधारसका पान करे। यह बात सर्वथा निश्चित ही है कि जबतक जीव भगवान्से तादात्म्य प्राप्त नहीं करता, तबतक वह परम पदका अधिकारी नहीं हो सकता और न उसका दुःख ही निवृत्त हो सकता है। इसीसे यह भी देखा जाता है कि जो लोग आध्यात्मिक मार्गका अनुसरण करते हुए परब्रह्म परमात्माकी ओर अग्रसर हो रहे हैं, उनकी भी अन्य लोकोंके प्रति ऐसी भावना नहीं रहती कि वे हमारी ओर न आयें। महर्लोकवासियोंके विषयमें भी यही कहा है कि वे सर्वसुखसम्पन्न होनेपर भी केवल इसीलिये दुःखी रहते हैं कि उनकी अपेक्षा निम्नतर लोकोंमें रहनेवाले जीव उस अति विलक्षण भगवत्सुखका समास्वाद नहीं कर सकते। उन अज्ञानियोंके प्रति करुणा होनेके कारण ही उनके हृदयमें खेद होता है- 'यच्चित्ततोऽदः कृपयानंदंविदाम्।' (श्रीमद्भा० २।२।२७) अतः भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गमें प्रवृत्त होनेवाले जितने लोग हैं, वे यही चाहते हैं कि अन्य पुरुष भी उन्हींके मार्गका अनुसरण करें। इसीसे उनमें सम्प्रदायवृद्धिकी भावना देखी जाती है। इस प्रकार जब सामान्य साधकोंमें भी अपने साथ ही भगवान्की ओर सब लोगोंको जानेकी प्रवृत्ति देखी जाती है तो साक्षात् प्रेमरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सहृदयता एवं लोकहितैषिताके विषयमें तो कहा ही क्या जा सकता है ? उनमें किसी प्रकारकी ईर्ष्या कैसे रह सकती है? वस्तुतः ईर्ष्या तो वहीं रहा करती है, जहाँ स्वामी परिच्छिन्न और अल्पसुख प्रदान करनेवाला होता है। किंतु यहाँ श्रीराधिकारमण तो अपरिच्छिन्न- अनन्त-सुखमय और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। इसलिये उन्हें किसी प्रकारकी ईर्ष्या क्यों होने लगी? अतः अपना आश्रय लेनेपर वे उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेके लिये भगवान्की मतिको प्रेरित कर देती हैं। अथवा- 'योगाय भगवता श्रीकृष्णेन सह सम्बन्धाय, मां सर्वेषां मुक्तमुमुक्षुविषयिणां मतिम् आययति प्रापयति इति योगमाया तामुपाश्रितः ।' -जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ तादात्म्य प्राप्त करानेके लिये मुक्त, मुमुक्षु और विषयी लोगोंकी मतिका सम्पादन करती हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनी योगमाया हैं, उनमें उपाश्रित श्रीभगवान्ने रमणकी इच्छा की। श्रीवृषभानुसुताकी कृपासे ही मनुष्योंकी
श्रीरामलीलारहस्य २४५ भगवान्के प्रति प्रवृत्ति होती है; अन्यथा उनका चित्त अनेक प्रकारके ऐहिक-आमुष्मिक भोगोंमें ही आसक्त रहता है। किंतु यदि वे विचारपूर्वक देखें तो भगवत्प्राप्ति ही उनका परम स्वार्थ है—'स्वार्थ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥' (रा०च०मा० ७।९६।१) शास्त्रोंमें जैसे स्वार्थकी निन्दा की गयी है, वैसे ही उसकी महत्ता भी कम नहीं बतलायी गयी, जैसा कि कहा है— 'स्वकार्यं साधयेद्धीमान् कार्यध्वंसो हि मूर्खता।' अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषको अपना काम बना लेना चाहिये, कामको बिगाड़ देना ही मूर्खता है। कृतार्थताकी सभीने प्रशंसा की है; किंतु इसका तात्पर्य क्या है? कृतार्थताका अर्थ है काम पूरा कर लेना। यह काम दूसरोंका नहीं है; क्योंकि दूसरोंके कामोंकी तो कभी पूर्ति नहीं हो सकती। अतः सिद्धान्त यही है कि स्वकार्यसिद्धि ही कृतार्थता है। स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा अत्यन्त प्रयत्न करके भी कितने स्वप्न-पुरुषोंका कल्याण कर सकेगा? उन सबके कल्याणका एकमात्र साधन तो यही है कि वह स्वयं जग जाय। इसी प्रकार संसारका परम कल्याण भी अपने ही कल्याणमें है। यदि लोकदृष्टिसे देखें तो भी जबतक तुम स्वयं कृतकृत्य नहीं हो, तबतक तुम्हारी बात कौन सुनेगा? इस दृष्टिसे स्वार्थसाधन ही परम कर्तव्य है। परंतु स्वार्थकी निन्दा भी कम नहीं की गयी। स्वार्थसे बढ़कर कोई बुराई नहीं मानी गयी। अतः समझना चाहिये कि यहाँ 'स्व' शब्दके अर्थमें भेद है। जो पुरुष शरीरको ही 'स्व' समझता है, वह क्षुद्र है। यह 'स्व' जितना ही विस्तृत होगा, उतना ही स्वार्थ परमार्थरूप हो जायगा। जो पुरुष 'स्व' शब्दका अर्थ शरीर समझेगा, उसका सिद्धान्त 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' हो जायगा। जो सारे संसारको अपना आत्मा मानेगा, उसकी दृष्टिमें लोककल्याण ही आत्मकल्याण होगा और जो स्वयं प्रकाशपूर्ण परब्रह्ममें आत्मबुद्धि करेगा, वह उस कर्तृत्व- भोक्तृत्वादिशून्य शुद्ध परब्रह्ममें जो कर्तृत्वादिका आरोप हो रहा है, उसकी निवृत्ति करेगा। इससे उसके यज्ञादि सारे कर्म ही आत्मार्थ होंगे। इस प्रकार देखते हैं कि वास्तविक स्वार्थ तो बहुत ही ऊँचा है। देह, इन्द्रिय, चित्त और चिदाभासको सुख पहुँचानेके लिये जितनी चेष्टाएँ की जाती हैं, वे वस्तुतः स्वार्थ नहीं हैं; क्योंकि ये देहादि तो आत्मा नहीं हैं, बल्कि अनात्मा हैं। यदि कहो कि आत्मा न सही आत्मीय तो हैं ही; अतः आत्मीय होनेके कारण भी उनके उद्देश्यसे जो कर्म किया जायगा, वह स्वार्थ ही कहा जायगा—सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि उनमें आत्मीयताकी प्रतीति भी भ्रमके ही कारण है। आत्मा तो असंग है; इसलिये उसका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता—'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः 'स्व' शब्दवाच्य आत्माके लिये जो चेष्टा है, वह तो परम कल्याणमयी ही है; क्योंकि सबके आत्मा तो भगवान् कृष्ण ही हैं; वे केवल मायासे ही देहवान् प्रतीत होते हैं— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सर्वात्मा हैं, अतः यथार्थ स्वार्थ भगवत्प्राप्ति ही है। यहाँ 'अखिलात्मनाम्' पदसे सविशेषात्मा समझने चाहिये; क्योंकि सविशेषा- त्माओंका ही आत्मा निर्विशेष आत्मा है, जैसे कि घटाकाशादिका अधिष्ठान महाकाश है। अतः भक्त, मुमुक्षु और मुक्तोंको भी भगवद्विषयिणी सुमति प्रदान करनेवाली श्रीराधिकाजी ही हैं। भावुक भक्तजन तो उस ऐकान्तिकी भगवन्निष्ठाके सामने कैवल्य और अपुनरावर्तनरूप मोक्षपदको भी कुछ नहीं समझते; इसीसे भगवान् कहते हैं— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) किंतु भगवान्के मुख्य भक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उन्हें किस सुमतिकी अपेक्षा है? वे तो आप्तकाम
हुआ करते हैं। यह ठीक है; परंतु भगवद्विषयिणी भक्तिरूपा स्निग्धमति उन्हें भी अभिलषित होती है। देखो, सनकादिकी भी क्या अभिलाषा थी ? कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) वे कहते हैं— भगवन् ! यदि हमारा चित्त भ्रमरके समान आपके चरणकमलोंमें निरत रहे, यदि हमारी वाणी तुलसीके समान आपकी पादकान्तिका आश्रय ले और यदि हमारे कर्णकुहर आपके गुणगणसे पूरित रहें तो हमें भले ही अपने पापपुंजोंके कारण नरकोंमें भी जाना पड़े—इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है। इस प्रकार श्रीराधिकाजी जैसे भक्तोंको भगवन्निष्ठा और मुक्तोंको भगवद्रति प्रदान करती हैं, वैसे ही वे अन्य (विषयी और मुमुक्षु) लोगोंको भी प्रमा— भगवत्-साक्षात्काररूपा मति प्राप्त कराती हैं अर्थात् मुमुक्षु और विषयी पुरुषोंकी भगवान्के प्रति इष्ट-बुद्धि कराती हैं, इसलिये वे योगमाया हैं। उन योगमायारूपा श्रीराधिकाजीका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा— 'योगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा स्वाङ्गकान्तिर्योगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो संयोगके लिये मति प्रदान करती है, वह—अपने अंगकी कान्ति ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर, अथवा— 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह उद्दीपनविधया संयोगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा शरद्घनशोभा तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो उद्दीपन-विभाव होनेके कारण व्रजांगनाओंके साथ संयोग करनेकी मति प्रदान करती है, वह शरद्-ऋतु या वनकी शोभा ही योगमाया है। उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। अथवा— 'श्रीकृष्णस्य योगे सम्प्रयोग एव मा शोभा यस्याः सा वृषभानुनन्दिनी योगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्रके सम्प्रयोगमें ही जिनकी शोभा है, वे श्रीवृषभानुसुता ही योगमा हैं, उनमें उपाश्रित हुए भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि— प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥ (रा०च०मा० २।९७।६) जैसे भानु बिना प्रभाकी, चन्द्रमा बिना चन्द्रिकाकी और सरोवर बिना कमलिनीकी शोभा नहीं है, वैसे ही परमानन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णके बिना श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है। इसीसे जिस समय उन्हें भगवान्का सम्प्रयोग प्राप्त था, उस समय उनकी कैसी शोभा थी ? किंतु जब श्रीश्यामसुन्दरका वियोग हुआ तो सारा वृन्दावन ही श्रीहीन हो गया; उस समय रसिकशिरोमणिभूता श्रीवृषभानुसुताकी जो दशा थी, उसका तो वर्णन ही कैसे किया जा सकता है? उसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि— 'यस्या योगे सम्प्रयोग एव श्रीकृष्णस्य मा शोभा सा श्रीवृषभानुसुता योगमा तस्यामुपाश्रितः'— जिनके संयोगमें ही श्रीकृष्णचन्द्रकी शोभा है, वे वृषभानुनन्दिनी ही योगमा हैं अर्थात् जैसे श्रीकृष्णचन्द्रसे विप्रयुक्ता श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है, वैसे ही श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दरकी शोभा नहीं है। जिस प्रकार प्रभाशून्य सूर्य, चन्द्रिकाहीन चन्द्र और मधुरिमारहित अमृत फीके हैं, उसी प्रकार अपनी आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीकीर्तिसुताके बिना श्रीनन्दनन्दनकी शोभा नहीं है। यदि ऐसी बात न होती तो जिनके कृपाकटाक्षके लिये ब्रह्मा और रुद्रादि देवगण भी लालायित रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी भी जिनके विशाल वक्षःस्थलमें अविचल रूपसे निवास करती हुई उनके तुलसीगन्धयुक्त पदपद्मपरागकी कामना करती हैं१, वे ही भगवान् १. श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासस्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७)
श्रीरासलीलारहस्य २४७ श्रीकृष्णचन्द्र लक्ष्मीकी उपेक्षा करके वेणु-निनादद्वारा समस्त गोपांगनाओंके सहित उन्हें बुलानेका प्रयास क्यों करते ? इससे सिद्ध होता है कि उन श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य विलक्षण ही था। समस्त व्रजांगनाएँ भी श्रीराधिकारूपा होकर ही भगवान्को प्राप्त करती हैं। इसीसे लोकमें भगवान्को रुक्मिणी-रमण या सत्यभामा- वल्लभ न कहकर श्रीराधा-रमण या गोपीवल्लभ ही कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि भगवान्की यथार्थ शोभा श्रीराधिकाजीसे ही है। अथवा—‘योगाय व्रजाङ्गनानां रासादिमुख- प्रापणाय या माया वयुनात्मिका¹ सङ्कल्पशक्ति- स्तामुपाश्रितः’। अर्थात् गोपांगनाओंको रसादि-सुख प्राप्त करानेके लिये जो माया-ज्ञानात्मक संकल्प उसे आश्रयकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि वहाँ किसी अन्य बाह्यसाधन
२४८ भक्तिसुधा विभक्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दका स्वयं ही आस्वादन करते हैं। इसीसे भगवान् अपनी स्वरूपभूता व्रजांगनाओंमें रमणेच्छा उत्पन्न करके भी पहले स्वयं कुछ कालतक 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सर्वसंकल्पशून्य और निःस्पृह ही रहे। किंतु अब उन्होंने भी रमणकी इच्छा की। परंतु यह रमण कैसा है? यहाँ एक ही परमतत्त्वको अनेकों नायकों और नायिकाओंके रूपमें प्रकटकर अपने ही स्वरूपभूत आनन्दका रसास्वादन करना है। वास्तवमें 'भज सेवायाम्' या 'रमु क्रीडायाम्' के अनुसार एक प्रकार असाधारण भावसे तादात्म्यापत्ति अथवा जो स्वरूपभूत आनन्द है, उसको अपने अनन्य भक्तोंमें स्थापित करना ही यह भजनानन्दरूप रमण है। इससे आपातदृष्टिसे यह जान पड़ता है कि यदि उस कूटस्थ परमानन्द तत्त्वका अन्यत्र संक्रमण किया गया तो अपने स्वरूपसे च्युत होनेके कारण उसे अच्युत नहीं कहा जा सकता। इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये ही कहा है- 'भगवानपि' अर्थात् जो अप्रच्युत स्वभाव भगवान् अपने अचिन्त्यानन्त ऐश्वर्यके माहात्म्यसे अपने स्वरूपभूत परमानन्दका अन्यत्र संचार करके भी सदा अच्युत ही रहते हैं, उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। जिस प्रकार चिन्तामणि, कल्पतरु एवं कामधेनु आदि अपने समीपस्थ लोगोंको उनके संकल्पित पदार्थ देकर भी स्वयं अक्षुण्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार भक्तोंको प्रेम प्रदान करनेपर भी भगवत्स्वरूपमें कोई च्युति नहीं होती। किंतु यहाँ पुनः सन्देह होता है कि इस प्रकार स्वरूपानन्दका अन्यत्र संक्रमण होनेसे भगवत्स्वरूप भले ही अविकारी रहे तथापि वह स्वरूपानन्द तो अपने स्थानका त्याग करनेके कारण विकारी हो ही जायगा। वह कूटस्थ या अविकारी नहीं रह सकता। इसीसे कहा है- 'योगमायामुपाश्रितः'। भगवान्की योगमाया एक ऐसी शक्ति है, जो उस पदार्थको अन्यत्र ले जानेपर भी विकृत नहीं होने देती। इसीसे भगवान् अपने कूटस्थ परमानन्दको अन्यत्र दूसरोंमें संक्रमित करके भी स्वयं अविकृत ही रहते हैं और उनके उस आनन्दमें भी कोई विकार नहीं होता है। इसीसे यह देखा जाता है कि यद्यपि भगवान्ने अपने कई भक्तोंको स्वात्मसमर्पण किया है तो भी उनमें कोई च्युति नहीं हुई; वे ज्यों-के-त्यों अविकारी ही बने हुए हैं। श्रीब्रह्माजी कहते हैं— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति। सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् हे देव! आप इन घोष-निवासियोंको क्या देंगे? आप विश्वफलात्मा हैं; आपसे बढ़कर और दूसरी क्या वस्तु हो सकती है, जिसे देकर आप उनसे उऋण होंगे? प्राणी विविध प्रकारके ऐहिक- आमुष्मिक सुखको ही परम पुरुषार्थ समझता है, किंतु जिनके आँगनमें उस सुखका परमोद्गम स्थान साक्षात् परब्रह्म मूर्तिमान् होकर धूलिधूसरित हुआ खेल रहा है, उनके लिये वे क्षुद्र सौख्यकण कैसे फलरूप हो सकते हैं? जिन्हें जो वस्तु अप्राप्त होती है, वही उन्हें फलरूपसे स्वीकृत हुआ करती है। अतः जिन्हें आप आत्मीय-रूपसे अहर्निश प्राप्त हैं, उन्हें सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् होकर भी आप क्या दे सकते हैं? इसलिये इनके तो आपको ऋणी ही रहना पड़ेगा। इस विषयमें कुछ निश्चय न होनेके कारण मेरा चित्त मोहित हो रहा है। यदि कहें कि मैं अपनेको ही समर्पण कर दूँगा तो इसमें भी कोई महत्त्वकी बात न होगी; क्योंकि जो पूतना दम्भसे माताके समान आचरण दिखलाती हुई आपका अनिष्ट करनेके लिये स्तनोंमें विष लगाकर आयी थी, उसे भी उसके कुलसहित आपने अपने स्वरूपको ही प्राप्त करा दिया था; फिर जिनके धन, धाम, स्वजन, प्रिय, आत्मा, प्राण और चित्त आपहीपर निछावर हैं, उन व्रजवासियोंको
श्रीरासलीलारहस्य २४९ आप क्या देंगे? उनके तो आप ऋणी ही रहेंगे। अहो! जिन व्रजबालकोंका उच्च स्वरसे किया हुआ हरिगुण-गान तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है, उनके चरणकमलोंकी वन्दना हम बारम्बार करते हैं। इस लोकमें वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने इस गोकुलमें किसी वनवीथिकाके पास तृण-गुल्मादिरूपसे जन्म लिया है; क्योंकि उन्हें उन कृष्णप्राणा गोप- वधूटियोंके पद-पद्मपरागसे अभिषिक्त होनेका सुअवसर प्राप्त होता है।* इससे यहाँ यही कहना है कि भगवान् अनेकोंको स्वात्मसमर्पण करके भी पूर्णरूपसे ही अवशिष्ट रहते हैं। अतः भगवान्की यह योगमाया शक्ति ही है, जिससे वे सदा सब कुछ करते हुए भी अक्षुण्ण ही रहते हैं। उन्होंने रमणकी इच्छा कैसे की? इसपर कहते हैं—'ताः कात्यायन्यर्चनव्रतसन्तुष्टेन भगवता वरत्वेन प्रदत्ताः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः रात्रीः वीक्ष्य।' अर्थात् कात्यायनी-पूजन एवं व्रतादिसे सन्तुष्ट हुए श्रीभगवान्ने जिन्हें वररूपसे दिया था, उन शरदोत्फुल्लमल्लिका रात्रियोंको देखकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। उन रात्रियोंको ग्रहणकर और उनमें आधिदैविकी रात्रियोंका निवेशकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। ऐसा करके उन्होंने उन रात्रियोंको पूर्ण बना दिया; क्योंकि आधिदैविकी रात्रियाँ भगवद्रूपा हैं। इस प्रकार उन सबको पूर्णिमारूप बनाकर और ऋतुको भी शरद्-ऋतुमें ही परिणत कर दिया अर्थात् समस्त रात्रियोंमें ऋतु-परिवर्तनका क्रम न रखकर केवल एक ही ऋतु रखा और उनमें मल्लिकादि समस्त पुष्प विकसित कर दिये। इस प्रकार उन रात्रियोंको समस्त उद्दीपन-सामग्रियोंसे सम्पन्नकर मुरली- ध्वनिद्वारा गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यदि विचार किया जाय तो स्वरूपतः अशेष- विशेष-शून्य पूर्ण परब्रह्म एवं अचिन्त्यानन्द निखिल- गुणगणास्पद श्रीभगवान् ये एक ही हैं; क्योंकि सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य एक स्वप्रकाशतत्त्व ही 'भगवत्' शब्दका लक्ष्य है। जैसा कि कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) अर्थात् जो अद्वय ज्ञानस्वरूप तत्त्व है; तत्त्वज्ञ लोग उसीको तत्त्व समझते हैं। वह 'ब्रह्म', 'परमात्मा' या 'भगवान्' ऐसा कहा जाता है। अतः अद्वितीय परब्रह्म ही भगवान् है। जिस प्रकार 'गच्छतीति गौः' इस व्युत्पत्तिसे 'गमेर्डोः' आदि सूत्रोंके अनुसार सिद्ध हुआ 'गो' शब्द केवल गमन करनेवालेका ही वाचक नहीं होता; क्योंकि गमन करनेवाले तो सभी पशु हैं, बल्कि गल-कम्बलादियुक्त 'गो' का ही वाचक होता है, उसी प्रकार यह अद्वय पदार्थ ही भगवत्-पदवाच्य है। किंतु इसका यौगिक अर्थ लेनेपर तो भगोपलक्षित अचिन्त्यानन्तगुणगणास्पद परमेश्वर ही 'भगवत्' शब्दका अर्थ है। इससे यही सिद्ध हुआ कि परमार्थतः जो एक अद्वयतत्त्व सर्वभेदरहित और स्वप्रकाश है, वही अपनी अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय लीलाशक्तिसे निखिल ब्रह्माण्डका अधीश्वर भी है। उस भगवान्ने ही रमणकी इच्छा की। यहाँ दोनों प्रकारसे विरोध प्रतीत होता है। यदि उसके निर्विशेषरूपपर विचार करते हैं तो 'असङ्गो न हि सज्यते' (बृहदारण्यक० ३।९।२६) इस श्रुतिके अनुसार उसका रमण होना असम्भव है। जो स्वप्रकाश, असंग और अद्वय है—वह किसको देखकर, किसलिये, किसके साथ, कैसे रमण करेगा? और यदि भगवान्के सविशेषस्वरूपपर ध्यान देते हैं तो वे भी सब प्रकारके ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यसे पूर्ण तथा अचिन्त्यानन्दरूप अपने ऐश्वर्यमें सन्तुष्ट रहनेके कारण आप्तकाम एवं पूर्णकाम हैं। उन्हें किसीको देखकर रमणकी इच्छा कैसे हो सकती है? जो अनाप्तकाम होता है, वही
- 'वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥' (श्रीमद्भा० १०।४७।६३) 'तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३४)