भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २३३ यदि कहो कि ऐसा हो ही नहीं सकता; क्योंकि ‘न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य’ (कठ० २।३।९), ‘यन्मनसा न मनुते’ (केन० १।१।५) इत्यादि वचनोंके अनुसार ब्रह्म तो समस्त इन्द्रियोंका अविषय है। वह वृन्दावनवासियोंकी इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘यन्मनसा न मनुते’ इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार वह समस्त इन्द्रियोंका अविषय होनेपर भी ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ (कठ० १।३।१२)—इस श्रुतिके अनुसार सूक्ष्म बुद्धिका विषय तो है ही। इसी प्रकार वह प्रेमदृष्टिका भी विषय हो ही सकता है। जिस प्रकार ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस श्रुतिको देखकर आप यह कल्पना करते हैं कि वह संस्कृत बुद्धिका ही विषय होता है, असंस्कृत बुद्धिका विषय नहीं होता, उसी प्रकार हम भी यह कह सकते हैं कि वह प्रेमदृष्टिका विषय है; क्योंकि इस सम्बन्धमें ये वाक्य प्रमाण हैं— भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) ‘नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजभक्तितः॥’ यदि कहो कि नहीं, मनसे ब्रह्म नहीं देखा जा सकता। ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस वाक्यका अर्थ केवल इतना ही है कि महावाक्यके श्रवणसे ब्रह्मका आवरण निवृत्त होता है; फिर तो स्वयंप्रकाश ब्रह्मका स्वतः ही स्फुरण हो जायगा तो हम भी यही कह देंगे कि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है, प्रेमदृष्टिसे केवल उसका आवरण निवृत्त हो जाता है। अब यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि इन्द्रियगोचरत्वरूप हेतुके कारण ब्रह्म मिथ्या है तो ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इन्द्रियोंकी अविषयता तो परमाणुओंमें भी है तथापि वे मिथ्या नहीं माने गये हैं। अतः इन्द्रियगोचरतारूप हेतु मिथ्यात्वका साधक नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि श्रीकृष्णके सहवासके कारण ही व्रजांगनाओंने अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ क्षणार्धके समान बिता दी थीं और अब उनके बिना ही उन्हें साधारण रात्रियाँ भी कल्पके समान हो रही हैं। अतः जिन रात्रियोंने उन्हें इतना सुख पहुँचाया वे अवश्य विलक्षण ही थीं। इसका एक दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। महाराज परीक्षित्को एक बड़ा सन्देह था। उनके मनमें इस बातका बड़ा उद्वेग था कि भगवान् तो बड़े ही भक्तवत्सल हैं, उन्होंने सदा ही भक्तोंके ऊपर बड़ा अनुग्रह प्रदर्शित किया है; नन्द, उपनन्द आदि वृद्ध गोपोंको तो उन्होंने अपनी दिव्यातिदिव्य लीलाएँ दिखाकर परमानन्द प्रदान किया तथा उन्हें ब्रह्महद और महावैकुण्ठका भी दर्शन कराया; परंतु जो गोपांगनाएँ अनेक जन्मोंसे उनकी मधुरभावसे उपासना कर रही थीं, जिनमें अन्यपरा श्रुतियाँ, ऋषिचरी और देवकन्या आदि साधनसिद्धा व्रजांगनाएँ सम्मिलित हैं, यहाँतक कि उनमेंसे अनेकोंने तो भगवत्संस्पर्शकी कामनासे ललिता, विशाखा आदि यूथेश्वरियोंकी ही उपासना की थी—उन सबकी ओरसे न जाने भगवान् क्यों उदासीन थे? उनकी मनोकामना भी तो पूर्ण होनी ही चाहिये थी। भगवान् तो आप्तकाम हैं, फिर गोपांगनाओंकी मनोकामना कैसे पूर्ण हो? गोपांगनाओंकी तो यह अभिलाषा बहुत समयसे थी, किंतु जबतक भगवान्को रमणाभिलाष न हो, तबतक उसकी पूर्ति कैसे हो सकती है? परीक्षित्को यह सन्देह हो ही रहा था कि श्रीशुकदेवजी बोल उठे— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) तात्पर्य यह है कि ‘भगवानपि उपाश्रितः उपासितः मायां वीक्ष्य ता रात्रीश्चक्रे’—उनके द्वारा इस जन्म और पूर्वजन्मोंमें उपासित हुए भगवान्ने भी मायाकी ओर देखकर वे विलक्षण रात्रियाँ बनायीं। व्रजांगनाओंके विविध भेद इन मुनिरूपा और श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंके भी कई भेद हैं। श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंमें जो अनन्यपरा हैं,