भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 778 में से

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पृष्ठ 246

२३४ भक्तिसुधा उनमें भी मानिनी और मुग्धा—ये दो भेद हैं। जो श्रुतियाँ निषेधमुखसे परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, वे मानिनी हैं; जैसे 'नेति नेति', 'अशब्दमस्पर्शमरू- पमव्ययम्' (कठ० १।३।१५) इत्यादि। भावुकोंने इसके बड़े विलक्षण तात्पर्य व्यक्त किये हैं। जिस प्रकार मानिनी नायिका ऊपरसे अनभिलाष दिखलाते हुए भी भीतरसे सर्वथा नायकका ही अनुकरण करती है, उसी प्रकार ये निषेधमुख श्रुतियाँ भी 'न-न' करके ही अपने परम ध्येय परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं। 'नेति-नेति' वचनामृत बोलती तथा मुग्धा साक्षात् रूपसे परब्रह्मका निरूपण करती हैं; जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म', (तैत्तिरीय० २।१) 'यत्साक्षाद- परोक्षाद् ब्रह्म' इत्यादि। इसके सिवा जो अन्यपरा श्रुतियाँ, मुनिचरी और देवकन्यारूपा व्रजांगनाएँ हैं, उनमें कोई तो सख्यभाववाली हैं और कोई कान्तभाववाली हैं। इनमें सख्यभाववती परिपक्वा हैं और कान्तभाववती अपरिपक्वा हैं। सख्यभाववालियोंका नित्य निकुंज-लीलामें भी प्रवेश है; क्योंकि उनका व्रत तत्सुखसुखित्व है तथा जो कान्तभाववती हैं, वे भी ललितादिकी उपासना करके सख्यभाववती हो जाती हैं; जैसा कि कहा है— मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः। ब्रह्म मां परमं प्रापुः सङ्गाच्छतसहस्रशः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।१३) अर्थात् जो मेरेमें जारभाव रखनेवालीं और मेरे स्वरूपको नहीं जानती थीं, वे भी यूथेश्वरी आदिके संगसे मुझ परब्रह्मको प्राप्त हो गयीं। इसका यह भी तात्पर्य है कि जो पहले कान्तभाववाली थीं, वे पीछे सख्यभाववाली हो गयीं। तब इसी श्लोकका दूसरे प्रकारसे अर्थ किया जायगा। 'मम इमाः मत्काः'—जो मेरी ममताकी आस्पद हैं; मैं स्वयं बड़े-बड़े योगीन्द्रोंकी ममताका आस्पद हूँ, और उनमें मेरी भी ममता है और अबला हैं; 'बलं आत्मनिष्ठादार्ढ्यं तच्छून्याः' अर्थात् आत्मनिष्ठाकी परिपक्वतासे रहित हैं; और मेरी प्राप्ति आत्मनिष्ठोंको ही होती है; क्योंकि श्रुति कहती है—'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'। (मुण्डक० ३।२।४) इसीसे यह भी कहा है—'पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत्' अर्थात् उपक्रमोपसंहारादि षड्विध लिंगसे श्रुतियोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें निश्चितकर फिर बाल्यसे—बालभावसे यानी संशय-विपर्ययरहित होकर स्थित हो। इस प्रकार जो मदीया होनेपर भी मेरेमें पूर्णतया परिनिष्ठिता नहीं है अथवा मेरे प्रति पूर्ण आत्मीयताका भाव नहीं रखतीं और कैसी हैं? 'अस्वरूपविदः' अर्थात् मैं शुद्ध-बुद्ध-परब्रह्म हूँ, ऐसा नहीं जानतीं अथवा जिन्हें मेरी परम प्रेमास्पदताका ज्ञान नहीं है; क्योंकि भगवान्‌के साथ प्रेम-सम्बन्ध हो जानेपर तो भक्त उनपर अपना अधिकार समझने लगता है; तब तो भक्तवर बिल्वमंगलकी तरह वह भी कहने लगता है— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ फिर तो विवश हो जानेके कारण उसके हृदयसे हरि कभी हटते ही नहीं। विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) जिस प्रकार पिघली हुई लाखमें यदि हल्दी मिला दी जाय तो फिर उन दोनोंका पार्थक्य नहीं हो सकता, उसी प्रकार भक्तके द्रवीभूत मनसे जब भगवान्‌के स्वरूपका तादात्म्य हो जाता है तो उनका कभी विप्रयोग नहीं होता। फिर भक्तहृदय भगवान्‌को नहीं भूल सकता और भगवान् भक्तके हृदयको नहीं छोड़ सकते। उन गोपांगनाओंका भाव इतना प्रौढ़ नहीं हुआ था; इसीसे वे अबला और अस्वरूपविद् थीं; किंतु उन्होंने भी 'ब्रह्म मां परमं प्रापुः'—मुझ परब्रह्मको प्राप्त कर लिया। कौन ब्रह्म? 'परमम्'—'परा उत्कृष्टतमा अभिमता मा श्रीराधा यस्य तम्।'

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