भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

श्रीरासलीलारहस्य २३५ अर्थात् जिसको पराशक्ति मा*—श्रीराधिकाजी ही अभिमत हैं, उस परम ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। यह अर्थ सख्यभाववती गोपांगनाओंके लिये अनुकूल ही है; क्योंकि श्रीवृषभानुसुता स्वाधीनभर्तृका होनेके कारण मुख्य नायिका हैं; अतः वे ही भगवान्‌की परम प्रेयसी हैं। शेष सब सखियाँ कान्तभावशून्य सख्यभाववाली हैं; इसलिये वे उन सबकी भी सेव्य हैं। वह परब्रह्म कैसा है? 'मा रमणम्—मायां रमणं यस्य' अर्थात् जिसका ब्रह्माकारप्रमा अथवा श्रीवृषभानुनन्दिनीमें रमण है और कैसा है—'जारम्' अर्थात् जो जारबुद्धिसे वेद्यमात्र है, वस्तुतः जार नहीं; क्योंकि परमात्मा है। अथवा 'जरयति कामवासनाम् इति जारम्' कामवासनाको जीर्ण कर देता है; इसलिये ब्रह्म जार है। ऐसे मुझ परब्रह्मको 'ताः शतसहस्रशः सङ्गात्प्रापुः'—उन सैकड़ों-हजारों गोपांगनाओंने (ललितादिके) संगसे प्राप्त कर लिया अर्थात् पहले वे कान्तभाववाली थीं, किंतु इनके सहवाससे सख्यभाववाली हो गयीं। रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है—यह बात ऊपर कही जा चुकी है। उन रात्रियोंकी विलक्षणताका यद्यपि पहले भी वर्णन किया जा चुका है तथापि यहाँ हम फिर उनकी कुछ विलक्षणताओंका विचार करते हैं। उनमें एक तो यह बहुत बड़ी विलक्षणता थी कि अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंका एक ही समयमें निर्माण हुआ और वे सब-की-सब पूर्णचन्द्रसम्पन्ना थीं। यद्यपि दक्षप्रजापतिके शापके कारण चन्द्रमाकी पूर्णता स्थायी नहीं है तथापि यहाँ भगवान्‌ने जो रात्रियाँ बनायीं, वे सभी पूर्णचन्द्रसमलंकृता थीं। साथ ही एक विशेषता और भी थी। अन्य रात्रियोंमें चन्द्रमा पूर्व दिशामें उदित होकर जब मध्याकाशमें पहुँच जाता है तो फिर वह जैसे-जैसे पश्चिमकी ओर जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी ज्योति क्षीण होने लगती है; परंतु इन रात्रियोंमें चन्द्रमाकी गति केवल मध्याकाशपर्यन्त ही थी। इसके सिवा एक विचित्रता यह भी थी कि रात्रियोंका अनुभव केवल व्रजांगनाओंको ही हुआ था और सबके लिये तो वह एक प्राकृत रात्रि ही थी। यदि सबको ऐसा ही अनुभव होता तो इतने समयतक पुत्रप्राणा यशोदा और स्नेहमूर्ति नन्दबाबा किस प्रकार अपने लाड़ले लालका पार्थक्य सहन कर सकते? यह नियम है कि जब किसी दरिद्रको कोई महामूल्य रत्न मिल जाता है तो वह पल-पलमें उसकी सँभाल करता रहता है। इसी प्रकार माता यशोदा और नन्दबाबा भी अचिन्त्यानन्दघन परमानन्दमूर्ति भगवान् कृष्णको पुत्ररूपसे पाकर पल- पलमें उनका मुखचन्द्र निहारनेको लालायित रहते थे और रात्रिमें भी कई बार उठकर अपने लालकी देख- रेख करते थे। अतः उस रात्रिमें ही वे इतनी देर कैसे सोते रह सकते थे? परंतु वे जब उठे तभी उन्होंने श्रीकृष्णको अपने पास ही देखा। इस प्रकार ये रात्रियाँ बड़ी ही विचित्र थीं। इन्हीं रात्रियोंमें अनन्तकोटि व्रजांगनाओंकी चिरकालीन कामना पूर्ण हुई थी। इस सम्बन्धमें एक और भी विचार है। किन्हीं- किन्हींका मत है कि उस रात्रिमें शरद्, वसन्त और ग्रीष्म—इन तीनों ऋतुओंकी १८० रात्रियोंका अनुभव हुआ था और उनमें तीनों ही ऋतुओंकी रमणोपयोगी सामग्रियाँ विद्यमान थीं। रात्रियोंका नाम दोषा है। उनमें सदा ही कुछ-न-कुछ दोष रहते ही हैं, इससे रात्रिमें बहुत-से भय भी रहते हैं, किंतु भगवान्‌ने उन सब दोषोंकी निवृत्तिके लिये ये निर्दोष रात्रियाँ बनायीं। उनमें उपर्युक्त तीनों ऋतुओंकी रात्रियोंके समस्त गुण तो थे; किंतु दोष कोई न था। कोई ऐसा भी कहते हैं कि तीन ही क्या, उनमें तो सभी ऋतुओंकी रात्रियोंका निवेश किया गया था; क्योंकि वहाँ सभी ऋतुओंमें सेवन करनेयोग्य भोग्य-सामग्री देखी जाती है। इसके सिवा 'उत्फुल्लमल्लिकाः' इस विशेषणका भी यही तात्पर्य है कि उन रात्रियोंमें मल्लिकोपलक्षित सभी पुष्प खिले हुए थे। बहुत-से

  • मीयते सेव्यते प्राप्यते ज्ञायते योगीन्द्रमुनीन्द्रैर्वेदैश्च या सा मा।
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