भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ भक्तिसुधा
पुष्प ऐसे हैं, जो रात्रिमें नहीं खिलते, परंतु वहाँ कुन्द और कुमुद साथ-साथ खिले हुए थे। जैसे— 'रेमे तत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।४५) और— 'कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) इससे सिद्ध क्या होता है ? सो बतलाते हैं— वसन्त-ऋतु कामदेवका मित्र है। वह अभीतक अपने मित्रके वियोगमें सन्तप्त था। आज उसने सोचा कि जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र अपनी सौन्दर्य-सुधासे आत्माराम मुनियोंके भी मनोंको मोहित करनेवाले हैं, आज वे ही श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरियोंके सौन्दर्यकणसे मोहित हो रहे हैं—'तद्दृशो दारुयन्त्रवत्।' अतः सम्भव है, आज परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र और व्रजसुन्दरियोंके सम्प्रयोगमें हमारे परम मित्र मनोजका उद्भव हो जाय। अतः इनके स्वागतके लिये हमें भी खूब तैयारी करनी चाहिये। इसीसे मानो मनोजमित्र ऋतुराजने सारे पुष्पोंको एक साथ विकसित कर दिया है। यद्यपि शरद्-ऋतुमें पुष्पोंका विकास रुक जाता है तथापि पुष्पविकासके विरोधी जाड्यमय शरद्-ऋतुमें भी मल्लिकादि उपलक्षित समस्त पुष्प खिल गये अर्थात् उस जाड्यमय समयमें भी पुष्पोंका विकास ही नहीं हुआ, प्रत्युत वे अत्यन्त विकसित हो उठे। किन्हीं-किन्हींका कथन है कि मल्लिकापुष्प शरद्-ऋतुमें फुल्लित होते हैं, वसन्तमें उन्मुख होते हैं और ग्रीष्ममें उत्फुल्ल हो जाते हैं; अतः यहाँ उत्फुल्लमल्लिका कहकर विरोधाभास द्योतित किया है। इससे सूचित होता है कि यहाँ शरदमें वसन्त- ऋतुका निवेश किया था। साथ ही वसन्तने यह भी सोचा कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे मित्र कामदेवको परास्त करनेका आयोजन कर रहे हैं। वह उनका प्रभाव जानता ही था। उसे यह मालूम था ही कि इन्होंने इन्द्र और ब्रह्माका भी मान-मर्दन कर दिया है। यही दशा कुबेर और वरुणकी भी हुई थी। अब ये सबपर विजय प्राप्त करके हमारे मित्रको भी जीतना चाहते हैं; परंतु वे भी किसीसे कम नहीं हैं। वे भी ब्रह्मादि-विजय-संरूंढदर्प हैं। अतः वसन्तने सोचा कि यह बड़ा विकट युद्ध होगा। इसलिये हमें मित्रवर मनोजकी सहायता करनी चाहिये; क्योंकि— धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिअहिं चारी ॥ (रा०च०मा० ३।५।७) अच्छा तो, हमें क्या करना चाहिये ? वीरोंके लिये सबसे बड़ी सहायता यही है कि उनके पास अस्त्र- शस्त्रोंकी कमी न रहे। हमारे मित्र पुष्पधन्वा हैं और उनके शस्त्र भी पुष्प ही हैं। अतः उनकी सहायताके लिये मुझे समस्त वृन्दारण्यको विविध प्रकारके सुन्दर और सुवासित सुमनोंसे सुसज्जित कर देना चाहिये। इसीसे उसने यथायोग्य कालकी अपेक्षा न करके सब प्रकारके पुष्पोंको विकसित कर दिया है। कामोद्रेकके आलम्बन-विभाव नायकके लिये नायिका और नायिकाके लिये नायक हैं तथा पुष्प, चन्द्रज्योत्स्ना, मलयानिल आदि उसके उद्दीपन-विभाव हैं। पुष्प तो साक्षात् कन्दर्पके बाण ही हैं। उनमें कुन्दकुड्मल तो शूलका काम करता है, जो उद्दीपन-विभाव नायक-नायिकाके संयोगमें रसवृद्धि करनेवाले हैं, वे ही उनका वियोग होनेपर अत्यन्त दुःखद हो जाते हैं। उस अवस्थामें कुन्दकुसुम शूल हो जाते हैं, केतक (केवड़ा) भालेका काम करता है और किंशुक (पलाशपुष्प) मानो अर्धचन्द्र बाण हो जाता है। किंशुकपुष्प रक्तवर्ण होता है, सो मानो वह विरहियोंका वक्षस्थल विदीर्ण करके उनके रक्तसे रंजित हो रहा है। इसी प्रकार अन्य पुष्पोंमें भी विभिन्न शस्त्रास्त्रकी कल्पना कर लेनी चाहिये। भगवान्की रची हुई ये रात्रियाँ प्राकृत नहीं थीं। अप्राकृत भगवान्के साथ अप्राकृत गोपांगनाओंकी यह अप्राकृत लीला अप्राकृत रात्रियोंमें ही होनी चाहिये थी। अतः भगवान्ने उन अप्राकृत रात्रियोंका निर्माण किया। इस प्रकार भगवान्ने रात्रियाँ तो बना लीं; परंतु