भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २३७ उनको अपना मन तो है नहीं, 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः।' इसलिये उन्होंने 'मनश्चक्रे' मन भी बनाया। तात्पर्य यह है कि अभीतक तो यही समझा जाता था कि भगवान् देह-देही-विभागसे रहित हैं; वे केवल भक्तानुग्रहके लिये ही शरीरादिमान्से प्रतीत होते थे। परंतु यह लीला इस तरह नहीं होगी। यहाँ तो उन्हें व्यासक्तचित्त होना पड़ेगा। यदि अमना भगवान् रमण करेंगे तो व्रजांगनाओंकी कामना पूर्ण न होगी। इसीसे उन्होंने मन भी बनाया। परंतु बनाया कैसे? 'योगमायां वीक्ष्य'— योगमायाकी ओर देखकर। इसमें उन्हें कोई कठिनता नहीं हुई; उन्होंने योगमायाकी ओर केवल देख दिया। उस निरीक्षणसे सब बात अपने-आप बन गयी। वह योगमाया क्या है? 'योगाय रमणाय अथवा अघटित- घटनाय या माया कृपा' अर्थात् रमण अथवा अघटित घटनाके लिये जो माया यानी कृपा है, वही योगमाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि अमनाका मनोनिर्माण और दोषा रात्रियोंको निर्दोष बनाना अघटितघटना ही तो है। ऊपर जो विवेचन किया गया है, उसके अनुसार 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' इस पदकी व्युत्पत्ति एक अन्य प्रकारसे भी हो सकती है। यथा— 'शरान् ददातीति शरदः वसन्तः तेन उत्फुल्लानि मल्लिकोपलक्षितानि सर्वाणि पुष्पाणि यासु ताः।' अर्थात् जो कामदेवको शर प्रदान करता है, वह वसन्त ही शरद् है, उसने जिन रात्रियोंमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त पुष्पोंको विकसित कर दिया है, वे रात्रियाँ ही 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। शरद्-ऋतु विशेषतया जड़ताकी सूचक होती है। अतः इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि इस लीलाके प्रभावसे जाड्यमय-मलविशेषादिसमाक्रान्त मनमें भी मल्लिकाके समान प्रेमतत्त्वका विकास हो जाता है तथा भगवत्स्वरूप और भगवल्लीलाओंका अनुशीलन ही प्रधानतया प्रेमतत्त्वके आविर्भावमें हेतु है। प्रेमके आविर्भावमें जड़ाजड़का विचार भी नहीं है। इसीसे यहाँ दिखलाया है कि वृन्दावनमें जितने भी तृण-लता एवं वृक्षादि हैं, वे अचेतन नहीं, बल्कि चेतन ही हैं; यदि वे जड़ अर्थात् स्वभावपरतन्त्र होते तो शरद्-ऋतुमें असमय ही मल्लिकाओंका विकास कैसे होता? इन्हें अवसरका ज्ञान है और ये अपने स्वभावका भी विचार रखते हैं, इसीसे भगवल्लीलाका सुअवसर देखकर असमयमें भी वे पुष्पादि-सम्पन्न हो गये। इससे सिद्ध होता है कि व्रजके तरुवर एवं लताएँ भी चेतन ही हैं। इसीसे भगवान्ने बलभद्रजीका गुणकीर्तन करते हुए उनसे निवेदन किया था—'प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या' (श्रीमद्भा० १०।१५।६)—ये तरुवर सम्भवतः आपके प्रधान भक्त मुनिजन ही हैं। ये अपने आत्मभूत आपको किसी भी दशामें छोड़ना नहीं चाहते। अतः जिस प्रकार आप मनुष्याकार होकर गूढ़रूपसे लीला कर रहे हैं, उसी प्रकार ये भी वृक्षादिरूप होकर आपकी सेवामें उपस्थित हो गये हैं। ये अपनी पुष्पादि-सम्पन्न शाखारूप शिखाओंसे आपके पदतलसंस्पृष्ट पृथिवी- तलका स्पर्श करना चाहते हैं। इसके सिवा एक अन्य प्रसंगमें यह भी कहा है कि ये वृक्ष मानो वेदद्रुम हैं, इनकी जो शाखाएँ हैं, वे मानो माध्यन्दिनी आदि वेदकी शाखाएँ हैं, पल्लव मानो उपनिषदें हैं और उनपर जो पक्षी हैं, वे मानो आत्माराम मुनिगण हैं— 'आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्त्यमीलितदृशो विगतान्यवाचः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।१४) 'जो मनोहर-शोभारूप वृक्षकी भुजाओंपर आरूढ़ होकर अन्य किसी प्रकारका शब्द न करते हुए खुले नेत्रोंसे वंशीध्वनि श्रवण करते रहते हैं।' यहाँ 'अमीलितदृशः' यह पद विशेष रहस्यपूर्ण है। यद्यपि कानोंसे मुरलीध्वनि सुनते समय नेत्रोंका व्यापार रुक जाता है; क्योंकि जिस समय मन एक इन्द्रियके विषयका आस्वादन करनेमें तत्पर है, उस समय वह