भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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२३८ भक्तिसुधा दूसरे इन्द्रियके विषयको किस प्रकार ग्रहण करेगा ? किंतु आपके रूप-लावण्यका तो विलक्षण माधुर्य है; वह उनके नेत्रोंको बन्द ही नहीं होने देता। अतः मालूम होता है कि ये पक्षिगण अवश्य कोई भगवत्कथानुरागी मुनिजन ही हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ भगवत्प्रकाश होता है, वहाँ सभी प्रकारके दोषोंका निराकरण होकर समस्त गुणोंका समावेश हो जाता है। यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। (श्रीमद्भा० ५।१८।१२) अर्थात् जहाँ श्रीहरिकी अनुरक्ति रहती है, वहाँ समस्त गुणोंके सहित सम्पूर्ण देव निवास करते हैं और वहाँ समस्त दोषोंका अभाव हो जाता है। जो पुण्यात्मा लोग श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌के प्रति भक्तिभाव रखनेवाले हैं, उनमें न क्रोध रहता है, न मत्सरता रहती है और न लोभ या अशुभ मति ही रहती है—'न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।' अतः यदि भगवल्लीलाके लिये रची हुई उन दिव्य रात्रियोंमें समस्त गुणोंका विकास हुआ तो आश्चर्य ही क्या है ? इसीसे यहाँ एक दूसरा अर्थ भी किया जाता है— 'यः अगमायामुपाश्रितः'—'न गच्छन्तीति अगाः तत्रत्याः वृक्षाः तेषां या स्वविषयिणी मा मतिः प्रेमवती बुद्धिः मा अगमा तस्याम् उपाश्रितः तन्निमित्तमेव भगवान् ता आहूय रन्तुं मनश्चक्रे। अर्थात् जो विचलित नहीं होते, वे वहाँके वृक्ष ही 'अग' हैं, उनकी जो अपने प्रति प्रेमवती बुद्धि है, वही 'मा' है, उस अगमाका आश्रयकर अर्थात् उसीके लिये भगवान्‌ने उन गोपांगनाओंको बुलाकर रमण करनेकी इच्छा की। इसका सीधा-सादा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि भगवान्‌ने योगमायाका आश्रय लेकर उनके लौकिक-बन्धनोंका विच्छेद करनेके लिये उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। भगवान्‌ने देखा कि ये गोपांगनाएँ जन्म-जन्मान्तरसे मेरी उपासना करनेके कारण मेरे साथ रमण करनेयोग्य हो गयी हैं, ये लोककृत लज्जादि-बन्धनके योग्य नहीं हैं, किंतु दूसरी ओर उन्होंने यह भी देखा कि वे लौकिक बन्धनोंसे बँधी हुई हैं। इस प्रकार उनका दोनों ओर खिंचाव है। तथापि वे हैं कैसी ? 'रात्रीः' अर्थात् अपनेको और अपने सर्वस्वको मेरे ही पादपद्मोंमें समर्पण करनेवाली हैं। इनके धन, रूप और जीवन सब मेरे ही लिये हैं। इनकी दृष्टिमें मेरे बिना जीवनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें इस प्रकार उभयतः पाशरज्जुमें बँधा हुआ देखकर भगवान्‌ने अयोगाय— उनके लोक-कुल-लज्जादिरूप बन्धनके विच्छेदके लिये माया—कृपाका आश्रय लेकर उनके साथ रमणकी इच्छा की। इसीसे उन्होंने वेणुनादके द्वारा उनके लोक एवं कुल आदिके बन्धनोंको विच्छिन्न करके उन्हें प्रेमाकुल कर दिया। अथवा— 'अयस्कान्तमणिं प्रति अयोवद् अच्छति स्वभक्तान् प्रति या सा अयोगा; अयोगा चासौ माया—कृपा अयोगामाया'— जो अपने भक्तोंके प्रति इस प्रकार आकर्षित हो, जैसे लोहा चुम्बककी ओर, उसका नाम अयोगा है, ऐसी जो अयोगा माया—कृपा है, उसे ही अयोगमाया समझना चाहिये; क्योंकि भगवान्‌की कृपा भक्तोंके प्रति उसी प्रकार आकर्षित हो जाती है, जैसे चुम्बकके प्रति लोहा। यद्यपि भगवान्‌की कृपा सर्वदा सर्वत्र है तथापि उसका आकर्षण करनेमें भक्तजन ही समर्थ हैं। अतः भगवान् भी उसी कृपाके अधीन होकर उनके साथ रमण करनेको उद्यत हो गये; क्योंकि भगवान्‌की जो ऐश्वर्यशक्ति और मायाशक्ति हैं, वे भी अपनी नियन्त्री इस कृपाशक्तिके ही अधीन हैं। अथवा परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका जो दिव्य मंगलमय वपु है, वह अयस्कान्तमणिके समान है,